अंतर्राष्ट्रीय

अब खत्म होगी मिडिल-ईस्ट में जंग? ट्रंप के प्रस्ताव के बाद ईरान ने अमेरिका के सामने रखीं शर्तें

 नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में चल रही अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जंग ने दुनिया में हाहाकार मचा रखा है। ऐसे में इस जंग का खत्म करने की मांग की जा रही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने बीते दिनों ईरान पर हमले से ब्रेक लेने की बात कही और दावा किया कि बातचीत चल रही है। ट्रंप ने कहा कि वॉशिंगटन और तेहरान इस पूरे हफ्ते बातचीत करेंगे, लेकिन उन्होंने उन प्रतिनिधियों के नाम नहीं बताए जो ईरानी सरकार की ओर से बातचीत कर रहे हैं। इन सब के बीच ईरान ने भी जंग खत्म करने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं।

ईरान ने अमेरिका के सामने रखीं ये शर्तें 

वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के प्रस्ताव के जवाब के तौर पर ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को बंद करने, सभी प्रतिबंधों को समाप्त करने, हिज्बुल्लाह के खिलाफ इजरायली अभियान को रोकने और एक ऐसे ढांचे की मांग की है, जिसके तहत उसे होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने की अनुमति मिल सके।

  • सुरक्षा की गारंटी कि वह फिर कभी ईरान पर हमला नहीं करेगा।
  • एक नई समुद्री व्यवस्था की स्थापना, जिसके तहत भविष्य में होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) ईरान के नियंत्रण में आ जाएगा।
  • पूरे पश्चिम एशिया में अमेरिका के सभी सैन्य ठिकानों को बंद करना।
  • युद्ध के दौरान ईरान को हुए नुकसान के अनुपात में वित्तीय मुआवजा।
  • पांच वर्षों के लिए बैलिस्टिक मिसाइल विकास रोकने और यूरेनियम संवर्धन को कम करने की तत्परता।
  • 60 प्रतिशत अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम के अपने भंडार को समायोजित करने पर होने वाली चर्चाओं में भागीदारी।
  • अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को अपने सेंट्रीफ्यूज का निरीक्षण करने की अनुमति देना।
  • पूरे पश्चिम एशिया में प्रॉक्सी ताकतों को दी जाने वाली फंडिंग को रोकने पर सहमति।

पहले रखी थीं तीन शर्तें

इससे पहले 12 मार्च को ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने रूस और पाकिस्तान के नेताओं से बात करने के बाद कहा था कि युद्ध तभी खत्म होगा जब तीन शर्तें पूरी होंगी। वो शर्तें- इस्लामिक गणराज्य के वैध अधिकारों को मान्यता, हर्जाने का भुगतान और भविष्य में होने वाले किसी भी हमले के खिलाफ पक्की अंतरराष्ट्रीय गारंटी।

पेजेश्कियन का यह बयान अपनी तरह का पहला बयान था, क्योंकि विदेश मंत्री अब्बास अराघची सहित कई ईरानी राजनयिकों ने अमेरिकियों के साथ बातचीत की किसी भी संभावना से इनकार कर दिया था। उनका कहना था कि ईरान के साथ धोखा हुआ है, क्योंकि अमेरिका के साथ चल रही परमाणु वार्ताओं के बीच ही यह हमला किया गया।

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