संपादकीय

अमरीका में ‘मेड इन इंडिया’

अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप ने न तो टैरिफ 50 फीसदी से घटा कर 18 फीसदी करने का निर्णय अचानक लिया और न ही भारत के साथ व्यापार समझौते की घोषणा एकदम की। टं्रप प्रशासन तब से विमर्श और मंथन कर रहा था, जब भारत ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ ‘मुक्त व्यापार समझौते’ करने में सफल रहा। राष्ट्रपति टं्रप अपने कुछ नीतिगत फैसलों और ‘दादागीरी’ के कारण भी घरेलू स्तर पर और वैश्विक संदर्भों में विरोध झेल रहे थे, लिहाजा अकेले पड़ते जा रहे थे। भारत-अमरीका के रणनीतिक संबंध किसी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के मोहताज नहीं हैं। वे निरंतर और स्वाभाविक हैं, क्योंकि वैश्विक समीकरण ही ऐसे हैं। राष्ट्रपति टं्रप ने व्यापार समझौते की घोषणा की और फोन पर प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत की। दोनों नेताओं के संबंध ‘प्यारे दोस्त’ वाले भी हैं, दोनों एक-दूसरे को ‘ताकतवर’ भी मानते हैं, लेकिन परस्पर-विरोधी फैसले भी लेते हैं, अंतत: रणनीतिक साझेदार मानने लगते हैं। बहरहाल भारत-अमरीका के बीच व्यापार समझौता हुआ है। इसकी बातचीत बड़ी लंबी चली है, समझौता खटाई में भी पड़ता गया है, तीखे विरोधाभास रहे हैं, अंतत: समझौते की घोषणा की गई है। हालांकि समझौते का पूरा मसविदा, तमाम ब्यौरे अभी तक सार्वजनिक नहीं हैं, क्योंकि समझौते पर अभी हस्ताक्षर किए जाने हैं और दोनों देशों का ‘साझा बयान’ भी प्रतीक्षित है। संभवत: इसी सप्ताह यह औपचारिकता भी निपटा ली जाएगी, भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने ऐसा बयान दिया है। व्यापार समझौता हुआ है, तो जाहिर है कि अब 30 ट्रिलियन डॉलर वाली दुनिया की सबसे बड़ी, ताकतवर अर्थव्यवस्था के बाजार में ‘मेड इन इंडिया’ सामान और उत्पादों के बिकने का रास्ता साफ हो गया है। भारत को वस्त्र, रेडिमेड कपड़े, रसायन, ऑटो, कालीन, आईटी हार्डवेयर, फार्मा, रत्न-आभूषण, पेट्रो उत्पाद, लोहा-इस्पात, प्लास्टिक, एल्यूमीनियम, तांबा, चमड़ा-जूते और फर्नीचर आदि के क्षेत्र में फायदा होगा। ‘व्यापार समझौता’ कितना सकारात्मक और फलदायक है, वह इसी से स्पष्ट है कि 8 सालों में ‘रुपया’ पहली बार 122 पैसे चढ़ा है और अब एक डॉलर 90.27 रुपए तक लुढक़ आया है। शेयर बाजार में निवेशकों ने एक ही दिन में 12 लाख करोड़ रुपए कमाए हैं। विदेशी निवेशक और एफआईआई एक बार फिर भारत में अपने निवेश बढ़ाएंगे।

राष्ट्रपति टं्रप के निर्णय और घोषणा का हम भी स्वागत करते हैं, लेकिन उन्हें ‘वाचाल दावों’ से परहेज करना चाहिए। मसलन-उन्होंने दावा किया है कि भारत ने 500 अरब डॉलर (करीब 45.15 लाख करोड़ रुपए) के अमरीकी उत्पादों की खरीद का संकल्प लिया है। इनमें ऊर्जा, अत्याधुनिक तकनीक-प्रौद्योगिकी, कृषि, कोयला और अन्य उत्पाद शामिल हैं। दरअसल भारत का कुल वैश्विक आयात 721 अरब डॉलर का है। भारत का आम बजट भी 53.47 लाख करोड़ रुपए का है। उसमें से 45 लाख करोड़ रुपए अकेले अमरीकी उत्पादों पर कैसे खर्च किए जा सकते हैं? राष्ट्रपति टं्रप ने यह भी दावा किया है कि भारत टैरिफ, नॉन टैरिफ बाधाओं को दूर करते हुए अमरीकी उत्पादों पर ‘शून्य’ टैरिफ को भी सहमत हो गया है। यदि भारत ‘शून्य’ टैरिफ लगाएगा, तो उसकी कंपनियों का तो भ_ा ही बैठ जाएगा। हकीकत यह है कि भारत ने ‘शून्य’ टैरिफ पर सहमति ही नहीं दी है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी ‘धन्यवाद’ की जो पोस्ट लिखी है, उसमें भी सहमति का जिक्र नहीं है। सबसे संवेदनशील यह है कि भारत ने गेहूं, मक्का, सोयाबीन और डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार नहीं खोला है। फिर अमरीका की कृषि मंत्री ब्रूक रोलिन्स क्यों उछल रही हैं कि अब अमरीका के कृषि उत्पाद भी भारत जैसे विशाल बाजार में बिकेंगे? रूसी तेल के मुद्दे पर भी टं्रप ने गलतबयानी की है। बेशक भारत ने रूसी तेल खरीदना कम किया है, क्योंकि वह उतना सस्ता नहीं पड़ रहा है, लेकिन फिर भी भारत ने 13 जनवरी, 2026 तक 11.4 लाख बैरल तेल प्रतिदिन रूस से खरीदा है। मार्च में भी यह मात्रा 8-9 लाख बैरल प्रतिदिन की रहेगी। बहरहाल भारत-अमरीका के बीच एक नया अध्याय शुरू हो रहा है, लेकिन अभी यह जश्न मनाने का वक्त नहीं है।

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