राष्ट्रीयव्यापार

अर्थव्यवस्था में सेवा निर्यात की अहमियत

नवाचार और लक्षित नीतियों के संतुलन से भारत को वैश्विक सेवा निर्यात के अहम केंद्र के रूप में स्थापित किया जाना होगा। इस बात की ओर भी ध्यान दिया जाना होगा कि देश में महज 8.25 प्रतिशत युवा ही रोजगारपरक कौशल के आधार पर डिग्रियों के अनुरूप रोजगार प्राप्त कर पा रहे हैं…

इन दिनों सेवा निर्यात पर प्रकाशित हो रही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में सेवा निर्यात को भारत की आर्थिक ताकत के रूप में रेखांकित किया जा रहा है। दुनिया में भारत को श्रेष्ठ सेवा निर्यात प्रदाता देश के रूप में प्रतिष्ठित किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और घटते हुए वैश्विक निर्यात के बीच जहां सेवा निर्यात भारत के कुल निर्यात को नई ऊंचाई दे रहा है, वहीं यह भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता हुआ भी दिखाई दे रहा है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, चालू वित्त वर्ष 2026-27 के तहत अप्रैल-जुलाई 2026 के चार महीनों में कुल सेवा निर्यात 6.38 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 142.64 अरब डॉलर दर्ज किया गया है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि इस वित्तीय वर्ष में सेवा निर्यात पिछले वित्त वर्ष के 421.32 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से भी ऊपर पहुंच जाएगा। उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत से ही भारत के सेवा निर्यात ने वैश्विक सुस्ती के बीच उल्लेखनीय बढ़त दिखाई है। इस अवधि के दौरान पेशेवर परामर्श, वित्तीय सेवाओं और डिजिटल समाधानों की अंतरराष्ट्रीय मांग में लगातार उछाल दर्ज किया गया। भारत में वैश्विक क्षमता केंद्रों के विस्तार और विभिन्न देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों ने भारतीय सेवा प्रदाताओं को विदेशी बाजारों में बेहतर पहुंच प्रदान की है।

नैसकॉम की रिपोर्ट के अनुसार, इस वित्त वर्ष के दौरान भारत के सूचना प्रौद्योगिकी और सॉफ्टवेयर सेवा निर्यात में व्यापक विस्तार हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल परिवर्तन की बढ़ती मांग ने इस निर्यात को नई दिशा दी है। सॉफ्टवेयर उत्पादों के साथ-साथ इंजीनियरिंग, अनुसंधान एवं विकास सेवाओं ने निर्यात राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित अनुकूल कर राहतों और नीतिगत सुधारों से भारतीय कंपनियों को वैश्विक ग्राहकों को आकर्षित करने में सीधी मदद मिली है। इसके अतिरिक्त भारतीय प्रौद्योगिकी कंपनियों ने अपने पारंपरिक बाजारों के अलावा नए भौगोलिक क्षेत्रों में व्यवसाय का विस्तार किया है। विश्व व्यापार संगठन का कहना है कि वैश्विक सेवा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी बढक़र 4.3 प्रतिशत हो गई है, जो पिछले दो दशकों में दोगुनी से अधिक है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार वैश्विक क्षमता केंद्रों और डिजिटल समाधानों की वैश्विक मांग ने भारत को विश्व के शीर्ष सेवा निर्यातक देशों में मजबूती से स्थापित कर दिया है। वैश्विक सेवा निर्यात में भारत ने दुनिया में 7वां स्थान प्राप्त कर लिया है, जबकि वर्ष 2001 में भारत 24वें स्थान पर था। यह भी कोई छोटी बात नहीं है कि हाल ही के महीनों में अमरीका द्वारा कठोर वीजा नियमों, वीजा साक्षात्कार पर अस्थायी रोक और वीजा शुल्क में वृद्धि जैसे सेवा निर्यात की राह में कठोर कदमों के बावजूद, चालू वित्त वर्ष के दौरान अप्रैल से जुलाई की अवधि में भारत से सेवा निर्यात अमरीका को भी बढ़ा है। यदि हम भारत से अमरीका को सेवा निर्यात में वृद्धि के मुख्य कारणों को देखें, तो पाते हैं कि अमरीका की वीजा पाबंदियों (जैसे एच-वन-बी वीजा फीस) में अत्यधिक वृद्धि के कारण अमरीकी कंपनियों ने भारत में वैश्विक क्षमता केंद्रों का विस्तार किया है। इससे भारत में रहते हुए भी काम का रुझान बढ़ा है। टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो जैसे भारतीय दिग्गज आईटी संस्थानों ने अमरीका में स्थानीय निवासियों की भर्ती बढ़ाई है, जिससे नए वीजा प्रायोजन पर निर्भरता कम हुई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग और रिमोट वर्क मॉडल की बढ़ती मांग ने वीजा यात्रा की आवश्यकता को घटाकर डिजिटल सेवा प्रदायगी को नया बल दिया है। नि:संदेह भारत मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के माध्यम से सेवा निर्यात बढ़ाने की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसमें भी कोई दो मत नहीं हैं कि भारत के वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) सेवा निर्यात के लिए गेम चेंजर साबित हो रहे हैं।

इस समय भारत 2177 वैश्विक क्षमता केंद्रों के साथ दुनिया के सबसे बड़े और प्रमुख केंद्र के रूप में उभरकर सामने आया है। दुनिया के करीब 55 प्रतिशत से अधिक वैश्विक क्षमता केंद्र अकेले भारत में हैं। भारत में ये केंद्र सीधे तौर पर 23 लाख से अधिक पेशेवरों को रोजगार दे रहे हैं और यह क्षेत्र सालाना लगभग 100 अरब डॉलर का राजस्व पैदा कर रहा है। भारत में वैश्विक क्षमता केंद्रों की रफ्तार में तेजी की स्थिति यह है कि दो साल पहले (साल 2024 में) जहां भारत में हर हफ्ते औसतन 1 नया केंद्र खुल रहा था, वहीं अब यह रफ्तार बढक़र प्रतिदिन 1 नए केंद्र की स्थापना के रूप में बदल चुकी है। नि:संदेह सेवा निर्यात की इन विभिन्न अनुकूलताओं के बावजूद भारत से सेवा निर्यात को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए कई ढांचागत और नीतिगत चुनौतियों को दूर करना आवश्यक है। हाल ही में नीति आयोग ने ‘भारत का सेवा क्षेत्र : पेशेवर सेवाओं में नियामक व्यवस्था संबंधी अंतर्दृष्टि’ शीर्षक से एक व्यापक रिपोर्ट जारी की है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के सेवा क्षेत्र में मौजूद नियामक बाधाओं को समाप्त कर भारतीय पेशेवरों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करना है। रिपोर्ट के तहत सेवा निर्यात को तेजी से बढ़ाने की राह में जो चुनौतियां बताई गई हैं, उनमें कानूनी, लेखा, वास्तुकला और स्वास्थ्य क्षेत्रों में असमान नियम व नियामक बिखराव प्रमुख बाधाएं हैं, जिससे सेवा निर्यात से जुड़े पेशेवरों की वैश्विक गतिशीलता प्रभावित होती है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए जो नई रणनीतियां बताई गई हैं, उनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल साधनों जैसे उभरते रुझानों को अपनाना, सेवा मूल्य-श्रृंखला में सुधार लाना, वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं व मानकों को लागू करना, पेशेवरों के निरंतर विकास हेतु सतत प्रशिक्षण को बढ़ावा देना भारतीय योग्यताओं को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए अन्य देशों के साथ पारस्परिक मान्यता समझौतों को बढ़ावा देना और कारोबार सुगमता में सुधार करना शामिल हैं। इनके अलावा देश से सेवा निर्यात को ऊंचाई देने के लिए कई और बातों पर ध्यान देना होगा। आईटी के अतिरिक्त अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, लॉजिस्टिक्स और चिकित्सा पर्यटन जैसे क्षेत्रों को वैश्विक बाजार में बढ़ावा दिया जाना होगा। सार्वजनिक और निजी भागीदारी के माध्यम से कार्यबल को उभरती तकनीकों में तेजी से दक्ष बनाने के प्रयास किए जाने होंगे। नए अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में भारतीय पेशेवरों की सुगम आवाजाही के प्रावधानों पर विशेष जोर दिया जाना होगा।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम सेवा निर्यातकों को वित्तीय सहायता देकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी भागीदारी बढ़ाई जानी होगी। नवाचार और लक्षित नीतियों के संतुलन से भारत को वैश्विक सेवा निर्यात के अहम केंद्र के रूप में स्थापित किया जाना होगा। इस बात की ओर भी ध्यान दिया जाना होगा कि देश में महज 8.25 प्रतिशत युवा ही रोजगारपरक कौशल के आधार पर डिग्रियों के अनुरूप रोजगार प्राप्त कर पा रहे हैं। ऐसे में स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई के साथ नई पीढ़ी को रोजगारपरक कौशल से सुसज्जित करना होगा। ऐसी रोजगार कौशल से सुसज्जित नई पीढ़ी सेवा निर्यात को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगी। उम्मीद करें कि पश्चिम एशियाई संकट तथा वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भारत के मुक्त व्यापार समझौते तथा वैश्विक क्षमता केंद्र सेवा निर्यात बढ़ाने के मद्देनजर गेम चेंजर भूमिका निभाएंगे। ऐसे में देश सेवा निर्यात की राह पर रफ्तार से बढ़ते हुए वर्ष 2030 तक एक ट्रिलियन डॉलर के सेवा निर्यात का लक्ष्य प्राप्त करने में सफल होगा। साथ ही इससे देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलते हुए दिखाई देगी।-डा. जयंती लाल भंडारी

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