आज नक्शे पर नहीं होता पाकिस्तान, ट्रंप के चेले के बाप ने भेजे थे फाइटर जेट, जानिए ईरान के गद्दारी की कहानी

India-Pakistan War: भारत और पाकिस्तान के बीच अभी तक 4 युद्ध हो चुके हैं. साल 1965 और 1971 के युद्ध में ईरान और अमेरिका की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही थी. यदि ईरान के तत्कालीन शाह ने पाकिस्तान का साथ नहीं दिया होता तो आज के दिन पड़ोसी देश का अस्तित्व शायद न होता है. शाह को मदद के लिए अमेरिका ने तैयार किया था.
India-Pakistan War: अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर व्यापक पैमाने पर तबाही मचाई है. ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई इस अटैक में मारे गए हैं. तेहरान की तरफ से भी कार्रवाई की गई है. क्या आपको मालूम है कि यही अमेरिका किसी समय ईरान के साथ मिलकर काम करता था. अमेरिका के कहने पर ही ईरान के तत्कालीन शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने साल 1965 और 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की हर तरीके से मदद की थी. फाइटर जेट से लेकर मिसाइल, आर्टिलरी, बम-गोला समेत अन्य तरीके से मदद की गई थी. उस वक्त यदि ईरान ने पाकिस्तानी शासक याह्या खान की मदद नहीं की होती तो संभवत: आज पड़ोसी देश का अस्तित्व नहीं होता और यदि होता तो उसका स्वरूप कुछ और होता. अमेरिका के गोपनीय दस्तावेजों से इसका खुलासा हुआ है.
पश्चिम एशिया के ताजा घटनाक्रमों के बीच इतिहास के पन्ने भी फिर से चर्चा में हैं. खासकर भारत के संदर्भ में जहां ईरान के साथ 1979 की क्रांति के बाद अपेक्षाकृत स्थिर और सहयोगपूर्ण संबंध रहे हैं. लेकिन इससे पहले जब ईरान पर मोहम्मद रजा पहलवी यानी शाह का शासन था, तब तेहरान का झुकाव पाकिस्तान की ओर स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी. मोहम्मद रजा पहलवी निर्वासित जीवन बिता रहे रजा पहलवी के पिता थे. रजा पहलवी अमेरिका के करीबी माने जाते हैं. 1941 से 1979 तक शासन करने वाले शाह पहलवी ने 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों के दौरान इस्लामाबाद को महत्वपूर्ण सैन्य सहायता दी थी. यह सहायता काफी हद तक अमेरिकी प्रशासन की इच्छानुसार थी.
1965 का युद्ध और ईरान की ‘हथियार एजेंट’ भूमिका
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पाकिस्तान को पश्चिमी देशों से सैन्य साजोसामान हासिल करने में कठिनाई हो रही थी. ऐसे में ईरान ने एक मध्यस्थ या आर्म्स परचेजिंग एजेंट की भूमिका निभाई. अमेरिकी विदेश विभाग के शुरुआती 1970 के दशक के खुफिया डॉक्यूमेंट्स के अनुसार, ईरान ने एक पश्चिम जर्मन हथियार डीलर से लगभग 90 F-86 जेट लड़ाकू विमान, हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, तोपखाना, गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स खरीदे. इन विमानों को पहले ईरान लाया गया और फिर पाकिस्तान भेजा गया. अन्य सैन्य उपकरणों की खेप सीधे कराची पहुंचाई गई. इस तरह ईरान ने न केवल पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को बनाए रखने में मदद की, बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबावों के बीच उसके लिए वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग भी तैयार किया.
1971 का युद्ध और भी निर्णायक था. पूर्वी पाकिस्तान में गृहयुद्ध और भारत के हस्तक्षेप के बाद हालात तेजी से पाकिस्तान के खिलाफ जाते दिखे. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, 1971 में ईरान ने पाकिस्तान को लगभग एक दर्जन हेलीकॉप्टर और अन्य सैन्य उपकरण उधार दिए, ताकि तत्कालीन दपश्चिमी पाकिस्तान को सुरक्षित रखा जा सके. जब दिसंबर 1971 में भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में निर्णायक बढ़त हासिल की और कराची बंदरगाह पर हमलों से ईंधन भंडार नष्ट हो गए, तब पाकिस्तान की स्थिति बेहद कमजोर हो गई थी. इससे अमेरिका की चिंताएं बढ़ गई थीं. 4 दिसंबर 1971 की सुबह 10:50 बजे की एक टेलीफोन बातचीत के खुफिया रिकॉर्ड में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Henry Kissinger ने राष्ट्रपति Richard Nixon को बताया कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान की ओर से तत्काल मदद की अपील आई है. किसिंजर ने कहा, ‘याह्या ने कहा है कि उनकी सैन्य आपूर्ति कट गई है, स्थिति बहुत खराब है. क्या हम ईरान के जरिये मदद कर सकते हैं?’ इस पर निक्सन ने पूछा, ‘क्या हम मदद कर सकते हैं?’ किसिंजर ने जवाब दिया कि यदि ईरान को आश्वस्त किया जाए कि अमेरिका उसकी भरपाई करेगा, तो यह संभव है. निक्सन ने इस पर सहमति जता दी थी. 6 दिसंबर को निक्सन ने इस योजना को औपचारिक स्वीकृति दी. समझौता यह था कि ईरान यदि पाकिस्तान को गुप्त रूप से सैन्य सहायता देता है, तो अमेरिका ईरान को सैन्य सहायता उपलब्ध कराएगा.
वॉशिंगटन के निर्देश पर 5 दिसंबर 1971 को तेहरान में एक अमेरिकी अधिकारी ने शाह से मुलाकात की और पाकिस्तान को सैन्य उपकरण तथा गोला-बारूद देने का आग्रह किया. शाह ने मदद की इच्छा जताई, लेकिन शर्त रखी कि अमेरिका जल्द से जल्द उसकी भरपाई करे. हालांकि, 8 दिसंबर को हुई एक और बैठक में शाह ने साफ किया कि वह सीधे तौर पर अपने विमान और पायलट पाकिस्तान नहीं भेज सकते. उस समय भारत और पूर्व सोवियत संघ के बीच मैत्री संधि पर हस्ताक्षर हो चुके थे. शाह सोवियत संघ से टकराव का जोखिम उठाने को तैयार नहीं थे.
फिर शाह की रणनीतिक चाल
सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचते हुए शाह ने एक वैकल्पिक योजना सुझाई. उन्होंने प्रस्ताव रखा कि अमेरिका किंग हुसैन पर दबाव डाले कि वे जॉर्डन के F-104 लड़ाकू विमान पाकिस्तान भेजें. बदले में ईरान दो स्क्वाड्रन अपने विमानों के जॉर्डन भेज देगा, ताकि वहां की सुरक्षा बनी रहे. 1970 के दशक के अमेरिकी दस्तावेज बताते हैं कि ईरान, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच लंबे समय से घनिष्ठ संबंध थे. ये तीनों देश 1955 से पश्चिम समर्थित सेंटो (CENTO) गठबंधन के सदस्य थे. बाद में इन्होंने क्षेत्रीय सहयोग संगठन (RCD) भी बनाया, ताकि पश्चिमी मार्गदर्शन पर निर्भरता कम करते हुए आपसी विकास परियोजनाओं पर काम किया जा सके. जहां पाकिस्तान और तुर्किये के साथ ईरान के संबंध बेहद करीबी थे, वहीं अफगानिस्तान के साथ रिश्ते अपेक्षाकृत ठंडे लेकिन स्थिर रहे. सीमा और हेलमंद नदी के जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर मतभेद जरूर थे, पर वे बड़े टकराव का कारण नहीं बने.
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद बदलाव
आज जब अमेरिका और इजरायल ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे हैं, तब यह इतिहास याद दिलाता है कि एक समय यही ईरान पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा साबित हुआ था. वह भी अमेरिकी रणनीति के हिस्से के रूप में. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान की विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया और भारत के साथ उसके संबंध अपेक्षाकृत संतुलित रहे. लेकिन मौजूदा सैन्य टकराव और रेजीम चेंज की चर्चा के बीच यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि यदि ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है, तो क्या क्षेत्रीय समीकरण एक बार फिर बदलेंगे? क्या दक्षिण एशिया में पुराने गठजोड़ पुनर्जीवित हो सकते हैं? इतिहास बताता है कि पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की राजनीति आपस में गहराई से जुड़ी रही है




