राजनीति

केंद्र में भाजपा उत्थान का सफर

6 अप्रैल, 1980 को भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ। फिर धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति का रूप-स्वरूप भी बदलने लगा। फिर एक दिन ऐसा आया कि कांग्रेस के वर्चस्व को धराशायी करते हुए भाजपा के संस्थापक और प्रधान श्री अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री बन गए। पहली बार 13 दिन के लिए, दूसरी बार 13 महीनों के लिए और तीसरी बार पूरे पांच साल तक प्रधानमंत्री बने रहे। सन् 2004 में भाजपा ने अपनी गलतियों के कारण सत्ता गंवा दी। 2014 के आते-आते तो कांग्रेस पूर्णतया: धराशायी ही हो गई। वर्तमान राजनीतिक परिवेश में ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी देश के परमानैंट प्रधानमंत्री हो गए। यह अकस्मात नहीं हुआ।

इस राजनीतिक परिवर्तन में तीन नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्वर्गीय भारत-रत्न अटल बिहारी वाजपेयी, श्रद्धेय लालकृष्ण अडवानी, महान विचारक प्रोफैसर मुरली मनोहर जोशी। अटल जी अमरत्व प्राप्त कर गए और अन्य दोनों अपनी आयु से मात खाकर, हाशिए पर धकेल दिए गए। यह भी सत्य है कि इनके पीछे था भाजपा के कार्यकत्र्ताओं का नि:स्वार्थ समर्पण और भारत के लोगों का अथाह प्यार। भारत की जनता हैरान है कि राजनीति में जहां कोई किसी का मित्र नहीं होता, उस राजनीति में अटल जी और अडवानी जी ने 50 साल तक राजनीतिक मित्रता पूरे विश्वास से निभाई। दोनों राजनीति में एक-दूसरे के पूरक रहे। मैं अधिक नहीं केवल छ: घटनाक्रम जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी के विकास और सत्ता तक पहुंचने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, का उल्लेख करता हूं। 

(क) 11 मई और 13 मई 1998 को अटल बिहारी वाजपेयी का राजस्थान में जैसलमेर के पोखरण में ‘परमाणु विस्फोट’ करना।  पोखरण विस्फोट स्वर्गीय राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जो विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे, की देख-रेख में हुआ। यह विस्फोट किसी भी देश को हानि पहुंचाने के लिए नहीं, अपितु भारत को सुदृढ़, समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र बनाने में एक कदम था। 

(ख) ‘एकता-यात्रा’ :  1991-92 में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने ‘एकता यात्रा’ शुरू की। इस यात्रा का उद्देश्य जम्मू-कश्मीर में फैले आतंकवाद, अलगाववाद के विरुद्ध कश्मीर घाटी में राष्ट्रीय एकता बनाए  रखने, आतंकवाद के विरुद्ध भारत की जनता को सजग करना और यह बताना था कि ‘कश्मीर घाटी’ से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक है। तमिलनाडु के कन्याकुमारी समुद्र तट से यह ‘एकता यात्रा’ 11 दिसम्बर 1991 को शुरू हुई। देश के लगभग 14 प्रांतों से यह गुजरी। 26 जनवरी, 1992 को ‘एकता यात्रा’ के मुखिया मुरली मनोहर जोशी, नरेंद्र मोदी तथा कई कार्यकत्र्ताओं ने श्रीनगर के लाल चौक में तिरंगा फहरा कर इसका समापन किया।  भाजपा को इस यात्रा से काफी लाभ मिला। 

(ग) राम रथ यात्रा : अडवानी जी ने 25 सितम्बर 1990 को गुजरात के सोमनाथ मंदिर से अयोध्या तक की रथयात्रा आरंभ की। इस ‘राम रथ यात्रा’ ने सारे देश को राममय बना दिया। गांव-गांव में राम के नाम पर ‘दीपक यात्राएं’ निकाली जाने लगीं। मंदिरों के पुजारियों ने इसे आस्था का प्रश्र बना दिया। कई स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे भी हुए। सैंकड़ों बेगुनाह ‘राम रथ यात्रा’ के दौरान मारे गए। देश का धु्रुवीकरण हो गया। एक ओर बाबरी मस्जिद बचाने वालों का वर्ग और दूसरी तरफ ‘राम मंदिर’ बनाने वालों का जुनून। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने अडवानी की ‘रथ यात्रा’ को ‘समस्तीपुर’ में रोक कर अडवानी जी को गिरफ्तार कर लिया। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने भी वी.पी. सिंह की केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। देश तब अराजकता की स्थिति में चला गया।

(घ) 11 सितम्बर 1993 को ‘मैसूर’ (दक्षिण भारत) से देश के अन्य भागों में  चार और जनादेश यात्राओं का स्वागत हुआ। उद्देश्य था समर्थन प्राप्त करना। इन यात्राओं का उद्देश्य भारत के मतदाताओं को ‘वोट डालने’ का महत्व समझाना था जिसमें यह भारतीय जनता पार्टी के विकास में सहायक हुई।

(ड.) स्वर्ण-जयंती-रथ यात्रा : मई 1997 से जुलाई 1997 में दिल्ली से शुरू हुई। भारत की स्वतंत्रता के 50 वर्ष पूरे होने पर निकाली गई। नारा था ‘गुड गवर्नैंस’।

(च) भारत उदय यात्रा : इसे ‘भारत सुरक्षा यात्रा’ का नाम भी दिया गया। यह यात्रा कन्याकुमारी (तमिलनाडु) से गुजरात तक आगामी लोकसभा के चुनावों को ध्यान में रख कर की गई थी। मार्च 2004 से अप्रैल-मई, 2006 तक चला। केंद्र सरकार और शीर्ष नेतृत्व को ध्यान में रखना चाहिए कि आज जो भारतीय जनता पार्टी का ‘विशाल ढांचा’ खड़ा हुआ है इसमें जनसंघ से लेकर जनता पार्टी के जन्म तक कार्यकत्र्ताओं की चार पीढिय़ां दफन हो चुकी हैं। नेता तो सत्ता सुख में आनंदमय जीवन जी रहे थे और भाजपा का ‘देवतुल्य’ समॢपत कार्यकत्र्ता आज भी सोच रहा है कि हम सफलता प्राप्त करके केवल वोट बटोरने की मशीन बन कर रह गए हैं। शीर्ष भाजपा नेतृत्व कार्यकत्र्ताओं की सोच पर विचार करें।. मोहन लाल(

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