राजनीति

धर्म या मजहब को लेकर अपशब्द कहना क्या ‘हेट स्पीच’ है ? सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के लिए स्वतः संज्ञान से FIR दर्ज करना क्यों जरूरी किया है?

हेट स्पीच यानी नफरत फैलाने वाला भाषण ऐसा वक्तव्य, संदेश या अभिव्यक्ति हो सकती है, जो किसी धर्म, जाति, समुदाय या समूह के खिलाफ वैमनस्य भड़काए या हिंसा को बढ़ावा दे। यह कानूनन जुर्म है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने, हिंसा भड़काने या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के लिए नहीं किया जा सकता। हेट स्पीच के मामलों में अक्सर सवाल उठता है कि क्या पुलिस तभी कार्रवाई करेगी, जब कोई व्यक्ति औपचारिक शिकायत दर्ज कराए, या वह सार्वजनिक भाषण, वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट देखकर खुद भी कार्रवाई कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 और 2023 में इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण निर्देश दिए और पुलिस को कानूनी कार्रवाई में निष्पक्षता बरतने को कहा। लेकिन अप्रैल 2026 के फैसले ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वतः संज्ञान, FIR दर्ज करने की कानूनी शर्तें और अदालत की अवमानना जैसे मुद्दे अलग-अलग हैं।

हेट स्पीच का सामान्य अर्थ ऐसे भाषण या अभिव्यक्ति से है, जो किसी समूह के खिलाफ नफरत, शत्रुता या भेदभाव को बढ़ावा दे सकती है। हालांकि, भारतीय कानून में हेट स्पीच की कोई एक व्यापक और स्वतंत्र वैधानिक परिभाषा नहीं है। किसी बयान का आपत्तिजनक होना अपने-आप में उसे आपराधिक हेट स्पीच नहीं बनाता, बल्कि उसके शब्दों, संदर्भ, उद्देश्य और संभावित प्रभाव को देखना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2026 के फैसले में भी माना कि मौजूदा आपराधिक कानून ऐसे अपराधों से निपटने के प्रावधान रखते हैं, जबकि नए अपराध बनाना मुख्य रूप से विधायिका का काम है।

21 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की पुलिस को हेट स्पीच के मामलों में कानून के अनुसार तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि संबंधित अधिकारी संज्ञेय अपराध सामने आने पर कार्रवाई करने में हिचकिचाएं नहीं। इन निर्देशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषणों पर कार्रवाई राजनीतिक दबाव या वक्ता की पहचान से प्रभावित न हो। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि निर्देशों का पालन नहीं करने वाले अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है।

हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू हो और नफरत फैलाने वाले आपराधिक भाषणों को नजरअंदाज न किया जाए। 2023 के आदेश ने स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई के निर्देश पूरे देश तक पहुंचाए, जबकि 2026 के फैसले ने स्पष्ट किया कि FIR और अवमानना के प्रश्नों पर कानूनी शर्तों तथा उपलब्ध तथ्यों को देखना जरूरी है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिकों की गरिमा और सामाजिक सद्भाव के बीच संवैधानिक संतुलन बनाए रखना ही इस कानूनी व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य है

FIR यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट आपराधिक न्याय प्रक्रिया शुरू करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, इसके बाद ही पुलिस औपचारिक जांच कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में स्थापित सिद्धांत को अप्रैल 2026 के फैसले में भी दोहराया कि सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होने पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है। इसका अर्थ है कि पुलिस केवल इसलिए कार्रवाई से इनकार नहीं कर सकती कि शिकायतकर्ता ने आरोपों को पहले ही साबित नहीं किया है, क्योंकि आरोपों की सत्यता जांच का विषय है।

  • भारतीय न्याय संहिता, BNS 2023 में विभिन्न प्रकार के भाषण और अभिव्यक्ति से जुड़े अपराधों के लिए प्रावधान हैं, जिनमें धारा 196 के तहत समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने से संबंधित अपराध शामिल है।
  • धारा 197 राष्ट्रीय एकता के प्रतिकूल आरोपों और दावों से संबंधित है, जबकि धारा 299 जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से किए गए कृत्यों से संबंधित है।
  • किसी मामले में कौन-सी धारा लागू होगी, यह भाषण की वास्तविक सामग्री, परिस्थितियों और संबंधित अपराध के कानूनी तत्वों पर निर्भर करता है। इसलिए हर आपत्तिजनक बयान पर एक ही धारा लगाना या बिना तथ्यों की जांच के किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करना उचित नहीं है।

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