राजनीति

पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी लड़ाई, ‘आप’ में बगावती सुर

अब जब पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी का समय आ गया है और पंजाब के लगभग सभी बड़े राजनीतिक दलों ने अंदर ही अंदर इन चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है, तो उन्होंने अब रैलियां करके चुनावी बिगुल बजाना भी शुरू कर दिया है। आम आदमी पार्टी (आप) ने मोगा में रैली की और शिरोमणि अकाली दल हर चुनाव क्षेत्र में रैलियां कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने भी 14 मार्च को मोगा में रैली करके चुनाव अभियान शुरू करने का ऐलान कर दिया है। इसी सिलसिले में कांग्रेस पार्टी ने भी बरनाला में बड़ी रैली करके चुनाव अभियान शुरू किया। वैसे तो सभी राजनीतिक दल रैलियां कर रहे हैं लेकिन कांग्रेस की रैली थोड़ी अलग थी, जब मंच से बोलते हुए पार्टी के बड़े नेता राहुल गांधी ने भरे पंडाल में यह कहकर सबको चौंका दिया कि पंजाब के नेताओं को एक टीम की तरह काम करना होगा, नहीं तो उन्हें रिजर्व मैंबर की लाइन में खड़ा कर दिया जाएगा। राहुल गांधी के इस बयान से लीडरशिप को शॄमदा होना पड़ा और राहुल गांधी ने पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी होने की बात पर मुहर लगा दी।

राजनेताओं द्वारा गुट बनाना और एक-दूसरे को आगे बढ़ाना आम बात है लेकिन जब यह गुटबाजी पार्टी का अनुशासन तोड़ती है और पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित होती है तथा पार्टी की टॉप लीडरशिप के लिए सिरदर्द, शॄमदगी और ङ्क्षचता का कारण बन जाती है, खासकर जब उस राज्य के आम चुनाव पास हों, तो बड़े नेता इस अनचाही हरकत को रोकने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। इसी वजह से, पंजाब की 2 बड़ी और राष्ट्रीय पाॢटयों (कांग्रेस व आप) का हाईकमान इस समय ऐसी ही कोशिशें कर रहा है कि कांग्रेस पार्टी की स्टेट लीडरशिप की अंदरूनी गुटबाजी और आप की स्टेट लीडरशिप में बागी आवाजों को कैसे खत्म किया जाए। यहां तक कि पंजाब की दूसरी पार्टियां, चाहे वह भाजपा हो, अकाली दल हो या नई बनी अकाली दल पुनर सुरजीत हो, इससे बची नहीं हैं। लेकिन इन पाॢटयों की हालत कांग्रेस और आप से काफी अलग है क्योंकि अकाली दल बादल का विरोध करने वाले सभी नेताओं ने उसे छोड़ दिया है, जिससे उसमें विरोध या गुटबाजी लगभग खत्म हो गई है। इस पार्टी के सभी नेता सुखबीर सिंह बादल को पार्टी का सुप्रीम लीडर मान चुके हैं।

हालांकि पंजाब भाजपा में गुटबाजी हमेशा से रही है लेकिन चूंकि भाजपा हाईकमान बहुत मजबूत स्थिति में है, इसलिए कोई भी नेता या गुट पार्टी हाईकमान के बारे में खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं करता, पंजाब के किसी भी नेता के खिलाफ तो दूर की बात है। हाल ही में अस्तित्व में आए अकाली दल पुनर सुरजीत की गुटबाजी भी लगातार सामने आ रही है और कई बड़े नेता सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर करते रहते हैं और कुछ ने तो पार्टी हाईकमान पर आरोप लगाकर पार्टी से दूरी भी बना ली है।कांग्रेस की स्थिति गुटबाजी के मामले में सबसे खराब है। हालांकि इसके बावजूद सभी नेता पब्लिक में गुटबाजी होने से इंकार करते और इसे विचारधारा का मतभेद बताते रहे हैं। चाहे वह राजा वडिंग़ हों, चरणजीत सिंह चन्नी, प्रताप सिंह बाजवा, सुखजिंदर सिंह रंधावा, परगट सिंह, राणा गुरजीत सिंह या भारत भूषण आशु हों। लेकिन बरनाला रैली के दौरान राहुल गांधी की पंजाब कांग्रेस के नेताओं को टीम बनाने की चेतावनी ने साबित कर दिया कि पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी बर्दाश्त की हद पार कर चुकी है। 

आप एक नई पार्टी होने के नाते, कुछ समय पहले तक एक अनुशासित पार्टी के तौर पर जानी जाती थी और पार्टी का कोई भी नेता पार्टी में गुटबाजी करने की हिम्मत नहीं करता था। पार्टी सुप्रीमो केजरीवाल जो भी फैसला लेते थे, वह आखिरी होता था, इसीलिए अगर कोई जरा भी असहमति दिखाता, तो उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था, चाहे वह प्रशांत किशोर हों, कुमार विश्वास या योगेंद्र यादव। इसी तरह पंजाब के नेताओं को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। लेकिन अब दिल्ली चुनाव हारने के बाद इस पार्टी के हालात भी बदल गए हैं। पार्टी हाईकमान में 2 गुटों की बातों के बीच कई नेता बगावत की आड़ में खुलकर बोलने लगे हैं और पार्टी सुप्रीमो कोई एक्शन लेने की हिम्मत नहीं दिखा रहे, चाहे वह मालविंदर सिंह कंग जैसे बड़े नेता हों या पार्टी के सीनियर प्रवक्ता अहबाब सिंह ग्रेवाल या रविंदरपाल सिंह मल्होत्रा, जो खुलेआम पार्टी के अन्य नेताओं पर माइनिंग और भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं।

इसी तरह पंजाब कांग्रेस के नेता उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं और गुटबाजी के कारण वे लंबे समय से पार्टी की हार का कारण बने हुए हैं लेकिन पार्टी हाईकमान इनमें से किसी के भी खिलाफ कोई एक्शन लेने से बच रहा है। हालांकि नवजोत कौर सिद्धू को पार्टी से निकाल दिया गया है लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया। लेकिन राहुल गांधी के घोर विरोध के बाद पंजाब कांग्रेस नेतृत्व एक टीम की तरह काम करने की बजाय चुपचाप बैठ गया है। अगर दोनों पाॢटयों का हाईकमान समय रहते इसे रोकने में कामयाब नहीं होता, तो दोनों पार्टियों को नुकसान होना तय है।-इकबाल सिंह चन्नी

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