पर्यटन : भारत की अगली बड़ी छलांग सांझेदारी पर क्यों आधारित होनी चाहिए?

भारत में गंतव्य स्थलों की कभी कोई कमी नहीं रही। कमी अगर रही है, तो बस उस संस्थागत परिकल्पना की, जिसके जरिए दुनिया इन स्थलों को जानने में सक्षम हो सके, वहां पहुंच सके, उन्हें अनुभव कर सके और सबसे जरूरी बात, वहां बार-बार जा सके। हमारी सांस्कृतिक विरासत बेमिसाल है, यहां सब कुछ है-लेकिन कोई स्मारक अपने-आप में गंतव्य स्थल नहीं होता, एक गंतव्य स्थल असल में एक पूरा ईकोसिस्टम होता है। इसमें शामिल हैं-वहां तक ले जाने वाली सड़क, यात्रा से जुड़ी कहानी, यात्रियों का स्वागत करने वाला आतिथ्य, उसे असली पहचान देने वाले कारीगर, उसे खोजने में मदद करने वाली तकनीक और वह समुदाय, जिसकी भागीदारी यह तय करती है कि पर्यटन एक आॢथक अवसर बनेगा या बस एक अनुचित प्रवेश रह जाएगा। इसीलिए भारतीय पर्यटन के अगले अध्याय को सिर्फ पर्यटन स्थलों के नजरिए से नहीं, बल्कि सांझेदारी के नजरिए से भी तय किया जाना चाहिए। नई संरचना सबकी बराबर भागीदारी वाली होनी चाहिए। सरकार, उद्योग जगत, प्रौद्योगिकी कंपनियां, रचनाकार, निवेशक, राज्य, स्थानीय निकाय और समुदायों को मिलकर पर्यटन के अनुभव का निर्माण करना चाहिए।
आज पर्यटन का मतलब विचारों, कहानियों, उम्मीदों, पूंजी और सांस्कृतिक प्रभाव का आवागमन है। यात्री अब सिर्फ भारत को देखना नहीं चाहते, बल्कि उसे अनुभव करना चाहते हैं, लोग खान-पान का स्वाद लेना, परंपराओं को समझना, घरों में जाना, कारीगरों से मिलना और यहां की जीवंत संस्कृति में, चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही, भाग लेना चाहते हैं। यह बदलाव भारत के लिए एक शानदार अवसर लेकर आया है। लेकिन बिना तालमेल के अवसर का लाभ शायद ही मिल पाता है। इसलिए सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, भले ही यह बदलती रहती हो। इसकी जिम्मेदारी सब कुछ खुद करने की नहीं है, बल्कि ज्यादा चीजों को संभव बनाने की है।
सड़कों, हवाई अड्डों, रेलवे, स्वच्छता, डिजिटल अवसंरचना, विरासत संरक्षण और नागरिक सुविधाओं में सरकारी निवेश वह आधार तैयार करता है, जिस पर निजी क्षेत्र नवाचार और निवेश कर सकता है। राजनीतिक इच्छाशक्ति निरंतरता और दिशा देती है। उद्योग जगत पूंजी, प्रबंधन विशेषज्ञता, तकनीक और बाजार तक पहुंच में योगदान देता है। समुदाय वह चीज देते हैं, जिसे कोई सरकार या निगम नहीं बना सकता-प्रामाणिकता। असली चुनौती इन क्षमताओं को एक साथ लाने की है। उद्योग जगत के साथ पर्यटन मंत्रालय का बढ़ता जुड़ाव इसी दिशा में एक प्रयास है। 11 रणनीतिक समझौता ज्ञापनों को अंतिम रूप दिया गया है, जिनमें से 5 का विश्व पर्यटन दिवस 2026 को आदान-प्रदान हुआ। उनका महत्व उन क्षमताओं में है, जिन्हें वे जोडऩा चाहते हैं-प्रौद्योगिकी, आवागमन, आतिथ्य, कंटैंट, डिजिटल आऊटरीच और स्थानीय उद्यम।
आज, एक गंतव्य स्थल एक फिल्म, एक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, एक रचनाकार की कहानी या मोबाइल फोन में सामने आई एक छवि के माध्यम से वैश्विक परिकल्पना में प्रवेश कर सकता है। नैटफ्लिक्स के साथ सहयोग गंतव्य प्रचार की इस नई व्यवस्था को प्रदॢशत करता है, जो भारत की संस्कृति, वन्य जीवन और पहाड़ी परिदृश्यों को अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों के सामने दिखाती है। लेकिन कहानी सुनाने से अंतत: यात्रा करने का कारण अवश्य मिलना चाहिए। यहीं पर अगली पीढ़ी की सांझेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है। मास्टरकार्ड के साथ विकसित परियोजना वाराणसी बहुमूल्य, विज्ञापन से परे एक ऐसे अनुभव की ओर बढ़ता है, जिसे वास्तव में खोजा और आरक्षित किया जा सकता है-सूर्योदय के समय गंगा, शास्त्रीय संगीत, साहित्य पर बातचीत, बनारसी बुनकर समुदाय और विरासत स्थल। इस तरह की पहल का महत्व यह है कि वाराणसी को फोटो ङ्क्षखचवाने वाले स्मारक के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव की जाने वाली सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस अंतर की जानकारी हमारी संपूर्ण पर्यटन रणनीति को दी जानी चाहिए।
भविष्य की पर्यटन प्रणाली को तेजी से समझना होगा कि कौन यात्रा कर रहा है, यात्री क्या चाहते हैं, मांग कहां उभर रही है और प्राथमिकताएं कैसे बदल रही हैं। गूगल इंडिया के साथ सहयोग, जिसमें क्षमता निर्माण और वैश्विक यात्रा मांग व यात्री व्यवहार को समझने से जुड़े कार्य शामिल हैं, एक पर्यटन नीति की ओर इशारा करता है, जो उत्तरोत्तर अधिक साक्ष्य-आधारित बन सकती है। फिर भी, यदि पर्यटन को वास्तव में समावेशी बनाना है, तो गांव को पर्यटन नीति के लिए उतना ही महत्वपूर्ण बनाना होगा जितना कि महानगरीय प्रवेश द्वार। होमस्टे, होटल जैसा ही महत्वपूर्ण हो सकता है। कारीगर उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है जितना आकर्षण। स्थानीय उद्यमी बड़े संचालकों के समान ही महत्वपूर्ण बन सकते हैं। यही पर्यटन से होने वाले विकास की असली कसौटी है।-गजेंद्र्र सिंह शेखावत (केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री)




