स्वास्थ्य

मधुमेह का बढ़ता संकट, चिंताजनक आंकड़े

शुगर (मधुमेह या डायबिटीज) का पूरी तरह से स्थायी इलाज संभव नहीं है, लेकिन मधुमेह से घबराने की नहीं बल्कि उसे गंभीरता से समझने की जरूरत है। सवाल केवल यह नहीं कि आज हमारी शुगर कितनी है, अपितु यह है कि आने वाले वर्षों में हम अपने हृदय, किडनी, आंखों और नसों को कितना सुरक्षित रख पाएंगे…

बीमारी जब दस्तक देती है तो अक्सर शरीर संकेत देने लगता है, लेकिन मधुमेह एक ऐसी खामोश चुनौती है जो बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के शरीर को भीतर से कमजोर करती है। व्यक्ति सामान्य जीवन जीता रहता है, उसे कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती, लेकिन रक्त में बढ़ी हुई शर्करा धीरे-धीरे हृदय, किडनी, आंखों और नसों को नुकसान पहुंचाती रहती है। यही कारण है कि मधुमेह को हल्के में लेना भविष्य के स्वास्थ्य के साथ गंभीर लापरवाही है। इस खामोश खतरे का आकार आंकड़ों में और भी चिंताजनक दिखाई देता है। इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन (आईडीएफ) के 11वें डायबिटीज एटलस के अनुसार, वर्ष 2024 में विश्वभर में 20 से 79 वर्ष की आयु के लगभग 58.9 करोड़ वयस्क मधुमेह से पीडि़त थे। यह इस आयु वर्ग की आबादी का लगभग 11.1 प्रतिशत है, अर्थात हर नौ वयस्कों में करीब एक व्यक्ति मधुमेह के साथ जीवन जी रहा था। इनमें लगभग 25.2 करोड़ लोगों को अपनी बीमारी का पता ही नहीं था।

वर्ष 2050 तक विश्व में मधुमेह पीडि़तों की संख्या बढक़र लगभग 85.3 करोड़ होने का अनुमान है। भारत की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है। वर्ष 2024 में देश के लगभग 8.98 करोड़ वयस्क मधुमेह से पीडि़त थे, जो इसी आयु वर्ग की आबादी का लगभग 10.5 प्रतिशत है। इनमें करीब 42.7 प्रतिशत लोगों को अपनी बीमारी का पता नहीं था। आईडीएफ के अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक भारत में मधुमेह पीडि़तों की संख्या लगभग 15.67 करोड़ पहुंच सकती है। ये आंकड़े बताते हैं कि मधुमेह अब किसी एक परिवार या क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ती वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती है। हिमाचल प्रदेश भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2026 के हालिया स्वास्थ्य आंकड़ों (आईसीएमआर और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के आकलन) के अनुसार, राज्य में मधुमेह (डायबिटीज) का प्रसार एक गंभीर ‘महा बीमारी’ (माइक्रो एपिडेमिक) का रूप ले चुका है, क्योंकि यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के 10 फीसदी के मानक को पार कर चुका है। राज्य में 13.5 प्रतिशत से 14.5 प्रतिशत आबादी मधुमेह से ग्रसित है, जबकि 17 से 18.7 फीसदी आबादी प्री-डायबिटीज (डायबिटीज की पहली स्टेज) की श्रेणी में है। इसका मतलब है कि राज्य के लगभग 29 से 32 प्रतिशत नागरिकों में ब्लड शुगर का स्तर असामान्य है, जो कि 11.4 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। यह भविष्य में बीमारी का जोखिम बढऩे का संकेत है। इन आंकड़ों का संदेश स्पष्ट है कि पहाड़ी परिवेश, स्वच्छ हवा और प्राकृतिक सुंदरता अपने आप मधुमेह से सुरक्षा की गारंटी नहीं देते। जिला कांगड़ा पोषण प्रोफाइल रिपोर्ट में वर्ष 2020 के लिए 15 से 49 वर्ष की आयु की महिलाओं में मधुमेह से संबंधित अनुमानित संख्या 75418 दर्ज की गई थी। मधुमेह को केवल रक्त में शुगर बढऩे की समस्या समझना गंभीर भूल है। लंबे समय तक अनियंत्रित रक्त ग्लूकोज रक्त वाहिकाओं और नसों को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे हृदय रोग, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ता है। किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, जबकि आंखों की रेटिना को नुकसान पहुंचने से दृष्टि कमजोर पड़ सकती है। पैरों में जलन, झुनझुनी, सुन्नपन या छोटे घाव को नजरअंदाज करना भी खतरनाक हो सकता है।

इसलिए मधुमेह के मरीजों के लिए केवल शुगर की जांच पर्याप्त नहीं, रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल, किडनी, आंखों और पैरों की नियमित निगरानी भी जरूरी है। बचाव का रास्ता कठिन नहीं, लेकिन अनुशासन मांगता है। पारंपरिक हिमाचली भोजन छोडऩे के बजाय उसकी मात्रा और गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए। दालें, मौसमी सब्जियां, साबुत अनाज और फाइबरयुक्त भोजन अपनाएं तथा अत्यधिक चीनी, मीठे पेय और अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें। नियमित पैदल चलना, अपनी क्षमता के अनुरूप व्यायाम, उचित वजन और पर्याप्त नींद स्वस्थ जीवनशैली के महत्वपूर्ण आधार हैं। मधुमेह की पहचान होने पर एचबीए1सी जांच पिछले लगभग दो से तीन महीनों के औसत रक्त ग्लूकोज का आकलन करने में मदद करती है। बेहतर रिपोर्ट आने पर भी दवा स्वयं बंद नहीं करनी चाहिए। उपचार चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही होना चाहिए। दूरदराज के गांवों में समय पर जांच और उपचार तक पहुंच आसान बनाना भी स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकता होनी चाहिए। केंद्र और हिमाचल प्रदेश सरकारें मधुमेह की रोकथाम एवं उपचार के लिए राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम एनपी-एनसीडीए आयुष्मान आरोग्य मंदिर, आयुष्मान भारत : प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना पीएम-जेएवाई, हिमकेयर योजना, मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना तथा सहारा योजना के माध्यम से जांच, उपचार, दवाओं और आर्थिक सहायता की सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रयास कर रही हैं, जबकि हिमाचल में टाइप-1 मधुमेह से पीडि़त पात्र बच्चों एवं युवाओं के लिए मुफ्त इंसुलिन पंप की पहल भी आशा की किरण है। प्रदेश में 38.7 प्रतिशत लोग मोटापे से और 35.3 प्रतिशत लोग उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) से ग्रस्त हैं। ये संख्याएं डराने के लिए नहीं, बल्कि समय रहते जगाने के लिए हैं।

शुगर (मधुमेह या डायबिटीज) का पूरी तरह से स्थायी इलाज संभव नहीं है, लेकिन मधुमेह से घबराने की नहीं बल्कि उसे गंभीरता से समझने की जरूरत है। सवाल केवल यह नहीं कि आज हमारी शुगर कितनी है, अपितु यह है कि आने वाले वर्षों में हम अपने हृदय, किडनी, आंखों और नसों को कितना सुरक्षित रख पाएंगे। समय पर जांच और नियमित उपचार ही इस चुनौती का व्यावहारिक उत्तर हैं। स्वास्थ्य की रक्षा बीमारी के लक्षण आने के बाद नहीं, बल्कि खतरे को समय रहते पहचानने और जिम्मेदारी से कदम उठाने से शुरू होती है। यह समझना जरूरी है कि मधुमेह अभिशाप नहीं, बल्कि एक ऐसी स्वास्थ्य चुनौती है, जिसे जागरूकता, समय पर उपचार और अनुशासित जीवनशैली से काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।-अनुज आचार्य

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