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मुफ्त की रेवडिय़ों से कर्ज के अंधकूप में देश

मुफ्त की रेवड़ी बांटने में कोई पीछे नहीं है। केंद्र में बतौर विपक्षी पार्टी आलोचना करने वाली कांग्रेस अपनी सत्ता वाले राज्यों में खुल कर रेवडिय़ां बांटती रही है। उसी तरह केंद्र में खुल कर यह काम करने वाली भाजपा, राज्यों में कांग्रेस व अन्य पार्टियों का इसके लिए विरोध करती है। बीते नौ साल में प्रति व्यक्ति कर्ज तीन गुना बढ़ गया है। इसका एक बड़ा कारण केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा जनता को खुलेआम रेवडिय़ां बांटना भी है। देश में प्रति व्यक्ति कर्ज 186206 रुपए हो जाने का अनुमान है…

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक माओ त्से तुंग ने कहा था कि किसी आदमी को एक मछली दो और तुम उसे एक दिन के लिए खिलाओगे। उसे मछली पकडऩा सिखाओ और तुम उसे जिंदगी भर खिलाओगे। आज के भारतीय शब्दों में यह है कि हर नेता जो मुफ्त चीजों का वादा करता है, असल में यह कह रहा है कि मैं तुम्हें एक अच्छी रोजी-रोटी और रेगुलर इनकम की इज्जत नहीं दे सकता। इसलिए अभी के लिए यह कुछ है, इसी से काम चला लो। चुनाव आते ही मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राजनीतिक दलों में मुफ्त की रेवड़ी बांटने की होड़ लग जाती है। कोई मुफ्त बिजली और पानी देने की बात करता है तो कोई स्मार्टफोन, लैपटॉप, साइकिल और टीवी की बात करता है। सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त सुविधाएं देने की संस्कृति की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि देश के आर्थिक विकास में बाधा डालने वाली ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है। तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने एक याचिका दायर कर उपभोक्ताओं की वित्तीय स्थिति पर गौर किए बिना हर किसी को नि:शुल्क बिजली प्रदान करने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, कोर्ट ने द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) सरकार के नेतृत्व वाली बिजली वितरण कंपनी की मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखने वाली याचिका पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किया है। बिजली वितरण कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में विद्युत संशोधन नियम 2024 के एक नियम को चुनौती दी थी। इस पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि मुफ्त की चीजें देकर राज्य सरकारें लोगों की आदतें खराब कर रही हैं।

कोर्ट ने आगे कहा कि इन लोगों को रोजगार सृजन पर ध्यान देना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कई राज्य सरकारें कर्ज और घाटे से दबी हुई हैं। इसके बावजूद वे मुफ्त योजनाएं बांट रही हैं। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने पूछा कि बिजली शुल्क अधिसूचित होने के बाद तमिलनाडु की कंपनी ने अचानक जेब ढीली करने का फैसला क्यों किया। प्रधान न्यायाधीश ने कहा राज्यों को रोजगार के रास्ते खोलने के लिए काम करना चाहिए। अगर आप सुबह से शाम तक मुफ्त भोजन देना शुरू कर देंगे, फिर मुफ्त साइकिल, मुफ्त बिजली देंगे, तो कौन काम करेगा और फिर कार्य संस्कृति का क्या होगा। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडू सरकार से कहा कि वैलफेयर के तौर पर आप उन लोगों को देना चाहते हैं जो बिजली का चार्ज नहीं दे सकते, लेकिन जो लोग खर्च उठा सकते हैं और जो नहीं उठा सकते, उनके बीच फर्क किए बिना, आप बांटना शुरू कर देते हैं। तमिलनाडु के वित्त मंत्री थंगम थेन्नारसु ने विधानसभा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अंतरिम बजट पेश किया था। इसमें अनुमान के मुताबिक, राज्य का कुल बकाया कर्ज बढक़र 10.71 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। इस बढ़ते कर्ज के लिए वित्त मंत्री थंगम थेन्नारसु ने केंद्र को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र तमिलनाडु में वित्तीय अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहा है। वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की मंजूरी नहीं दे रही है और केंद्र प्रायोजित योजनाओं का फंड रोक रही है। उन्होंने जीएसटी दरों में कटौती और 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट पर भी निराशा जताई। मंत्री थेन्नारसु के अनुसार संघीय ढांचे में राज्यों के साथ ऐसा अनुचित व्यवहार पहले कभी नहीं देखा गया।

द्रमुक (डीएमके) सरकार ने अपनी फ्लैगशिप योजनाओं के लिए फंड की कमी नहीं होने दी। महिलाओं के लिए ‘विदियाल पयानम’ योजना (मुफ्त बस यात्रा) के लिए 4000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। इसके अलावा छात्रों के लिए बस किराए की योजना हेतु 1782 करोड़ रुपए और डीजल सब्सिडी के लिए 1857 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। कुल मिलाकर परिवहन विभाग को 13062 करोड़ रुपए मिले। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए भी सरकार ने 5463 करोड़ रुपए का बड़ा हिस्सा अलग रखा है। तमिलनाडु में पिछले 4 वर्षों में प्रति परिवार कर्ज तेजी से बढक़र लगभग 3.7 लाख रुपए तक पहुंच गया है, जो राज्य की गंभीर वित्तीय स्थिति को दर्शाता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार तमिलनाडु पर देश में सर्वाधिक 8.34 लाख करोड़ रुपए कर्ज है। दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है। इस पर 7.69 लाख करोड़ रुपए कर्जा है। इसी तरह महाराष्ट्र पर 7.22 लाख करोड़, पश्चिम बंगाल पर 6.58 लाख करोड़, कर्नाटक पर 5.97 लाख करोड़, राजस्थान पर 5.62 लाख करोड़, आंध्र प्रदेश पर 4.85 लाख करोड़ रुपए का कर्जा है। गुजरात पर 4.67 लाख करोड़, केरल पर 4.29 लाख करोड़, मध्य प्रदेश पर 4.18 लाख करोड़, तेलंगाना पर 3.89 लाख करोड़, पंजाब पर 3.51 लाख करोड़, हरियाणा पर 3.36 लाख करोड़, बिहार पर 3.19 लाख करोड़ और असम पर 1.51 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। वर्ष 2016-17 के बाद कर्ज पर निर्भरता लगातार बढ़ती गई। वोट बैंक की राजनीति के कारण ऐसी लोकलुभावन मुफ्त की योजनाओं के कारण छोटा पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश डेब्ट ट्रैप में फंस गया है। आलम यह है कि हिमाचल सरकार के पास लिए गए कर्ज की मूल रकम व उस पर लगने वाले ब्याज को चुकाने के लिए भी पर्याप्त पैसा नहीं है। वहीं, कर्ज लेने की लिमिट सिर्फ 10 हजार करोड़ रुपए है। अगले वित्तीय वर्ष में कर्ज व ब्याज चुकाने के लिए 13 हजार करोड़ चाहिए।

अब लोन को चुकाने के लिए मार्केट से कर्ज लेकर भी बात नहीं बन रही और तीन हजार करोड़ रुपए अपने बजट से चुकाने होंगे। सोलहवें फाइनेंस कमीशन की रिपोर्ट में हिमाचल सहित अन्य कुछ राज्यों की रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट (आरडीजी) खत्म कर दी है। इससे हिमाचल सरकार के खजाने पर भारी चोट लगी है। हिमाचल प्रदेश पर कुल देनदारियां 1 लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को पार कर गई हैं, जिससे यह पहाड़ी राज्य कर्ज लेने वाले भारतीय राज्यों में 5वें स्थान पर पहुंच गया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने स्टेट फाइनेंस रिपोर्ट (2025-26) में कहा है कि मुफ्त की ऐसी योजनाओं के चलते राज्यों के बजट पर दबाव बढ़ रहा है। हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में बुनियादी ढांचे पर खर्च कुल बजट का 10 फीसदी से भी कम रह गया है। मुफ्त की रेवड़ी बांटने में कोई पीछे नहीं है। केंद्र में बतौर विपक्षी पार्टी आलोचना करने वाली कांग्रेस अपनी सत्ता वाले राज्यों में खुल कर रेवडिय़ां बांटती रही है। उसी तरह केंद्र में खुल कर यह काम करने वाली भाजपा, राज्यों में कांग्रेस व अन्य पार्टियों का इसके लिए विरोध करती है। बीते नौ साल में प्रति व्यक्ति कर्ज तीन गुना बढ़ गया है। इसका एक बड़ा कारण केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा जनता को खुलेआम रेवडिय़ां बांटना भी है। देश में प्रति व्यक्ति कर्ज 186206 रुपए हो जाने का अनुमान है। अहम बात यह है कि राजनीतिक दलों को यह भी बताना चाहिए कि इन मुफ्त की योजनाओं के लिए धन कहां से आएगा। अब हमारी फाइनेंशियल पॉलिटिक्स में ईमानदारी और जवाबदेही वापस लाने का समय आ गया है।-योगेंद्र योगी

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