मोदी सरकार के सामने जातिगत आरक्षण की राजनीति का सबसे कठिन इम्तिहान

विरोध -प्रदर्शनों का दौर है। ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ नया राजनीतिक आकर्षण बनता दिख रहा है। इसी बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल के 2 मंत्रियों के बीच एक-दूसरे के इस्तीफे की मांग को लेकर हुआ सार्वजनिक टकराव यह बताने के लिए काफी है कि जाति का जिन्न अब कितना विस्फोटक हो चुका है। विडंबना यह है कि सामाजिक न्याय तक पहुंचने के लिए जिस आरक्षण को एक सेतु की तरह देखा गया था, वही आज राजनीतिक बारूदी सुरंगों के ऊपर बने पुल में तबदील होता दिखाई दे रहा है।
भारत में जाति-आधारित आरक्षण दशकों से ऐसा मुद्दा रहा है, जिसे छूना सरकारों के लिए राजनीतिक जोखिम मोल लेने जैसा रहा है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। असंतोष केवल उन लोगों तक सीमित नहीं, जो आरक्षण से बाहर हैं। आरक्षण पाने वाले समुदाय भी अधिक हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं, जबकि गैर-लाभार्थी वर्ग निष्पक्षता का सवाल उठा रहा है। आरक्षित वर्गों के भीतर ही अलग-अलग समुदाय पूछ रहे हैं-हमें हमारा हिस्सा कब मिलेगा? वहीं सामान्य वर्ग का सवाल है-आरक्षण सामाजिक न्याय के अस्थायी उपाय से स्थायी अधिकार कब बन गया? यही वह मोड़ है जहां मोदी सरकार के सामने जातिगत आरक्षण की राजनीति का सबसे कठिन इम्तिहान खड़ा है। एक ओर यह मांग जोर पकड़ रही है कि सरकारी सहायता का आधार जाति नहीं, बल्कि आॢथक वंचना हो। दूसरी ओर दलित समुदाय के 2 प्रमुख नेताओं, लोजपा के पशुपति कुमार पारस और ङ्क्षहदुस्तानी अवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी, के बीच आरक्षण को लेकर टकराव ने भाजपा-एन.डी.ए. के लिए जातिगत समीकरणों की नई जटिलता उजागर कर दी है।
मूल विवाद है ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ का। सवाल यह है कि क्या अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के मौजूदा कोटे को भी उप-वर्गों में बांटा जाए, ताकि इन वर्गों के सबसे वंचित समुदायों को आरक्षण का सुनिश्चित हिस्सा मिल सके? पारस इसका विरोध करते हैं। उनका तर्क है कि एस.सी. आरक्षण की बुनियाद गरीबी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता है। आरक्षण को उपजातियों में बांटने से दलित समुदाय की राजनीतिक और सामाजिक एकता कमजोर हो सकती है। उनका सवाल सीधा है-जब आरक्षण का उद्देश्य जातिगत भेदभाव का मुकाबला करना है, तो आर्थिक कसौटी को इसमें क्यों जोड़ा जाए? मांझी का तर्क इसके विपरीत है। उनके अनुसार मौजूदा एस.सी. आरक्षण का लाभ सबसे वंचित दलित समुदायों तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा। अपेक्षाकृत मजबूत और बेहतर प्रतिनिधित्व वाले समूह आरक्षण के लाभ का बड़ा हिस्सा हासिल कर रहे हैं, जबकि सबसे पिछड़े समुदाय पीछे छूट रहे हैं। यहीं से आरक्षण की बहस एक नई राजनीतिक आग पकड़ती है।
दोनों पक्षों के तर्कों में दम है और दोनों के पीछे एक असुविधाजनक सच्चाई भी। गरीबी जातिगत भेदभाव को मिटा नहीं देती लेकिन जाति अपने आप में गरीबी का प्रमाण भी नहीं है। ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय का कोई व्यक्ति आॢथक रूप से संपन्न हो सकता है, जबकि आरक्षित श्रेणी से बाहर का व्यक्ति बेहद गरीब हो सकता है। आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं था। इसे ऐतिहासिक बहिष्कार और सामाजिक भेदभाव के समाधान के लिए बनाया गया था। लेकिन दूसरी ओर, अवसरों के लिए लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी एक नई बेचैनी पैदा कर रही है। विश्वविद्यालयों, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों और सरकारी नौकरियों में सीमित सीटों के लिए संघर्ष कर रही युवा पीढ़ी के एक हिस्से को आरक्षण सामाजिक न्याय की सीढ़ी की बजाय अवसर के रास्ते में खड़ी बाधा दिखाई दे सकता है। यही सरकार की असली दुविधा है। वह उस विशाल मतदाता वर्ग को नाराज नहीं कर सकती, जो आरक्षण को संविधान प्रदत्त सुरक्षा-कवच मानता है। लेकिन वह उस बढ़ते वर्ग की बेचैनी को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती, जो व्यवस्था को अनुचित, अपारदर्शी या राजनीतिक हितों से प्रभावित मानता है।
भाजपा ने वर्षों तक पुराने जातिगत समीकरणों को तोड़कर अपना सामाजिक आधार विस्तार दिया। सवर्णों से आगे बढ़कर ओ.बी.सी., दलित, अति पिछड़े और छोटे जातीय समूह उसके व्यापक राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा बने। लेकिन अब जाति की राजनीति नए रूप में लौट आई है और पहले से कहीं अधिक खंडित रूप में। आज मुकाबला केवल सवर्ण बनाम दलित-ओ.बी.सी. नहीं, मुकाबला है सवर्ण बनाम आरक्षित समुदाय, आरक्षित समुदाय बनाम उपजाति और उपजाति बनाम उपजाति। और इस पूरी लड़ाई के केंद्र में हैं सरकारी नौकरियों और शिक्षा के अवसरों का सीमित होता दायरा। सवर्ण समुदाय का सवाल है-‘हमारे लिए जगह कहां है?’ इसके साथ आरक्षण-विरोधी मतदाता वर्ग का उभरना सरकार के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती है।
यही कारण है कि आरक्षण धीरे-धीरे ‘चुनावी मुद्रा’ में बदलता जा रहा है। नागरिक प्रतिस्पर्धी वोट-बैंकों में बदल जाते हैं और सरकार जानती है कि आरक्षण को हटाने या उसमें आमूलचूल परिवर्तन की राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। नतीजा सामने है-एक दुष्चक्र। आरक्षण का अंतिम लक्ष्य ऐसा भारत बनाना नहीं हो सकता, जो हमेशा के लिए ‘आरक्षित’ और ‘अनारक्षित’ नागरिकों में बंटा रहे। लक्ष्य होना चाहिए ऐसा भारत, जहां आरक्षण की आवश्यकता धीरे-धीरे कम हो, क्योंकि उन असमानताओं को कम किया जा चुका हो जिनके कारण इसकी जरूरत पड़ी थी।-पूनम आई. कौशिश




