विनिवेश को रोकना एक सही फैसला…

दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत छह करोड़ महिलाओं को दिए जाने वाले 90 प्रतिशत आजीविका ऋण सार्वजनिक क्षेत्र के और उनके द्वारा प्रायोजित क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा ही उपलब्ध कराए जा रहे हैं। रेहड़ी-पटरी वालों को ऋण देने का काम भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा ही किया जाता है…
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के निजीकरण को लेकर बहस, चाहे वे औद्योगिक हों या सेवा उद्यम, कोई नई बात नहीं है। 1991 में नई आर्थिक नीति की शुरुआत के बाद से, जिसमें तीन मुख्य आयाम शामिल थे : उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण, बैंकों के निजीकरण का मुद्दा हमेशा से ही एक बहुत ही विवादास्पद विषय रहा है। यही कारण है कि सभी सरकारों ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को निजीकरण से दूर रखा है। सार्वजनिक क्षेत्र में विनिवेश दो तरीकों से होता है : रणनीतिक बिक्री और बाजार-आधारित शेयर बिक्री। रणनीतिक बिक्री में अक्सर मूल्यांकन से जुड़ी समस्याएं, बोली लगाने वालों की सीमित संख्या और पारदर्शिता की कमी के आरोप सामने आते हैं। इसके विपरीत, शेयर बाजार के जरिए किया जाने वाला विनिवेश ज्यादा पारदर्शी होता है। इसमें ज्यादा लोगों की भागीदारी होती है और इससे शेयरों का सही मूल्य तय हो पाता है। पिछले 11 वर्षों में, विनिवेश से होने वाली प्राप्ति लगभग 4.5 लाख करोड़ में से ज्यादातर बाजार बिक्री से ही हुई है, और सिर्फ 69000 करोड़ ही रणनीतिक विनिवेश से प्राप्त हुआ, जो इस तरीके की ज्यादा प्रभावशीलता को दर्शाता है। यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि भारत में पब्लिक सेक्टर के बैंकों को निजी संस्थाओं को बेचने का कोई इतिहास नहीं रहा है। फिर भी, अलग-अलग बैंकों के विलय के जरिए बैंकों की कुल संख्या में निश्चित रूप से कमी आई है। असल में, जहां कुछ समय पहले तक 27 पब्लिक सेक्टर बैंक थे, वहीं अब उनकी संख्या घटकर सिर्फ 12 रह गई है।
इसके अलावा एक और बैंक है, जिसका नाम आइडीबीआई बैंक है। इसमें हालांकि केंद्र सरकार की शेयरहोल्डिंग 51 प्रतिशत से कम है, लेकिन लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की भी इसमें बड़ी शेयरहोल्डिंग है, जिससे सरकार का कुल नियंत्रण लगभग 95 प्रतिशत हो जाता है। विशेष रूप से आईडीबीआई बैंक के मामले में, पिछले कुछ सालों से सरकार रणनीतिक विनिवेश की दिशा में कदम बढ़ा रही थी, और इस संबंध में पहले प्रस्ताव आमंत्रित किए गए थे। हाल की रिपोर्टों के अनुसार भारत सरकार ने अब इस बैंक के रणनीतिक विनिवेश को रोक दिया है। इस मुद्दे पर काफी बहस चल रही थी, और शायद यह किसी बैंक के निजीकरण का अपनी तरह का पहला मामला होता, जिसमें भारत सरकार और सरकारी संस्थाओं की शेयरधारिता काफी बड़ी अधिक थी। क्या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण किया जाना चाहिए, एक लंबी बहस है, जिसमें दोनों पक्षों की ओर से महत्वपूर्ण तर्क दिए जाते रहे हैं। लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण के आलोचकों के, खासकर आइडीबीआई के मामले में, अपने मजबूत तर्क हैं। लेकिन इस बहस में आगे बढऩे से पहले, हमें आइडीबीआई बैंक के इतिहास पर नजर डालनी होगी, जो कुछ साल पहले यह एक मुश्किल दौर से गुजर रहा था, वहीं अब यह घाटे से उबर चुका है और एक मुनाफा कमाने वाली संस्था बन गया है। शुरुआत में इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (आइडीबीआई) एक विकास बैंक था, जो एलपीजी नीतियों के प्रभाव में, अन्य विकास वित्तीय संस्थानों की तरह आइडीबीआई को भी बाद में एक वाणिज्यिक बैंक में बदल दिया गया।
निजीकरण के पक्ष में तर्क : निजीकरण के समर्थक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण की भी वकालत करते हैं। उनका पहला तर्क यह है कि आईडीबीआई के निजीकरण से बाजार अनुशासन को बढ़ावा मिलेगा और पूंजी का कुशल आवंटन होगा। दूसरा, यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को नौकरशाही की देरी और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करेगा। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी। तीसरा, निजीकरण से परिसंपत्ति की गुणवत्ता और एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) के प्रबंधन में सुधार हो सकता है। आइडीबीआई बैंक लंबे समय तक एनपीए की समस्याओं से जूझता रहा है। चौथा, निजीकरण बैंकिंग सेवाओं में नवाचार, ग्राहक केंद्रित उत्पादों और डिजिटल बदलाव के माध्यम से प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ा सकता है। पांचवां, निजीकरण प्रबंधन बोर्ड की अधिक मजबूत जवाबदेही, पारदर्शिता और बेहतर अनुपालन मानकों के जरिए कॉर्पोरेट प्रशासन में सुधार कर सकता है। छठा, भारत सरकार ने आइडीबीआई बैंक को चालू रखने के लिए उसमें बार-बार पूंजी डाली है। निजीकरण करदाताओं के पैसे पर बार-बार होने वाले पूंजीकरण को कम करने में मदद कर सकता है।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की क्यों है जरूरत : हम समझते हैं कि भारत और दुनिया भर में निजी क्षेत्र के बैंकों के दिवालिया होने का एक इतिहास रहा है। लेकिन, ऐसा एक भी मामला नहीं है जहां कोई सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक दिवालिया हुआ हो और जमाकर्ताओं का पैसा डूब गया हो। इसके अलावा, अगर कोई सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक फेल भी हो जाता है, जिसकी संभावना बहुत कम है, तो भी जमा राशि की पूरी गारंटी सरकार देती है, क्योंकि ये सरकारी बैंक होते हैं। इन बैंकों की यह अनोखी खासियत इन्हें सबसे भरोसेमंद बनाती है, और यहां कभी भी पैसे निकालने की होड़ नहीं मचती। दूसरी बात, पब्लिक सेक्टर के बैंकों पर लोगों का भरोसा आम जनता को अपनी बचत इन बैंकों में जमा करने के लिए प्रोत्साहित करता है। देश में घरेलू बचत के महत्व को लेकर कोई संदेह नहीं हो सकता, क्योंकि इससे देश में विदेशी संसाधनों की जरूरत कम हो जाती है। जब 1969 में पहली बार 14 प्राइवेट बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया और 1980 में छह और बैंकों का, तो सरकार का मुख्य उद्देश्य समावेशी विकास को बढ़ावा देना था। यह देखते हुए कि कृषि, छोटे पैमाने के उद्योग, शिक्षा, निर्यात को बढ़ावा देना आदि प्राथमिक महत्व के क्षेत्र हैं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के माध्यम से इन प्राथमिक क्षेत्रों के लिए ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित की गई। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बहुत छोटे कर्जदारों को बहुत कम ब्याज दरों पर छोटे ऋणों की उपलब्धता भी सुनिश्चित की। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के तमाम नियमों, उप-नियमों और निर्देशों के बावजूद, प्राइवेट सेक्टर के बैंक उस तरह से वित्तीय समावेशन का काम नहीं कर पा रहे हैं, जैसा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद, प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) के तहत ‘जीरो बैलेंस’ वाले जन धन खाते खोले गए, जिससे वित्तीय समावेशन सुनिश्चित हुआ।
अब तक, ऐसे 51 करोड़ जन धन खाते खोले जा चुके हैं, जिनके माध्यम से न केवल गरीबों और आम लोगों की बैंकों तक पहुंच बनी है, बल्कि वे अपनी छोटी-छोटी बचत भी इनमें जमा कर सकते हैं। इन जन धन खातों के जरिए सरकार द्वारा प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण भी संभव हो पाया है, जो आधार और मोबाइल फोन से जुड़े हुए हैं। इन 51 करोड़ खातों में से केवल 1.4 करोड़ खाते ही निजी बैंकों ने खोले हैं। लेकिन, हमें यह समझना होगा कि आज जब जमा और कर्ज देने में निजी बैंकों का हिस्सा लगभग 36 प्रतिशत है, तब भी जन धन खातों में से 3 प्रतिशत से भी कम खाते ही निजी बैंकों ने खोले हैं। यह तथ्य वित्तीय समावेशन में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका के बारे में बहुत कुछ कहता है। यही नहीं, दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत छह करोड़ महिलाओं को दिए जाने वाले 90 प्रतिशत आजीविका ऋण सार्वजनिक क्षेत्र के और उनके द्वारा प्रायोजित क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा ही उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसी तरह रेहड़ी-पटरी वालों को ऋण देने का काम भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा ही किया जाता है। ऐसी स्थिति में, स्वाभाविक रूप से, निजी क्षेत्र के बैंकों का मुनाफा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तुलना में अधिक होता है, क्योंकि ये बैंक वित्तीय समावेशन के दायित्व से मुक्त होते हैं।-डा. अश्वनी महाजन




