विपक्ष अब इंतजार करे

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ‘अवधारणा’ का आंदोलन चला कर राजनीति में पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बार-बार देश को संबोधित कर रहे हैं और इसे ‘भविष्य’ और पूरे देश की लड़ाई करार दे रहे हैं। संविधान और लोकतंत्र बचाने का उनका मुद्दा 2024 के लोकसभा चुनाव से चल रहा है, लेकिन अब उन्होंने ‘मताधिकार’ से जोड़ दिया है। बेशक देश के औसत नागरिक का ‘संवैधानिक मताधिकार’, किसी भी स्थिति में, छीना नहीं जा सकता। वह लोकतंत्र का बुनियादी अधिकार है। नेता प्रतिपक्ष बार-बार आह्वान कर रहे हैं कि आओ दिल्ली! चलो दिल्ली!! यह आंदोलन नहीं, ‘शिव जी की बारात’ है, ‘शिव जी का तांडव’ है। इस आंदोलन में कुत्ता, बिल्ली, बंदर कोई भी शामिल हो सकता है। यदि भाजपावाले भी आना चाहें, तो कोई आपत्ति नहीं। उनका मन्तव्य और लक्ष्य है कि इस तांडव से ही परिवर्तन होगा, न्याय देना पड़ेगा। एक तरफ आंदोलनकारी हैं, तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री, सीईसी, संघ-प्रमुख मोहन भागवत हैं। इस सूची में अब राहुल गांधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल का नाम भी जोड़ लिया है। नेता प्रतिपक्ष का विश्वास है कि यह विभाजन एक दिन खत्म होगा। आंदोलन कई दिन, कई महीने और साल भी चलाना पड़ सकता है, लेकिन देश को रुकना, थकना, डरना नहीं है। वह देश को यह भरोसा भी दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि जिनके खिलाफ आज देश आंदोलित है, उन्हें जाना ही पड़ेगा। नेता विपक्ष ने सीईसी ज्ञानेश कुमार गुप्ता को ‘सरकारी गवाह’ बनने की पेशकश की है, ताकि साजिश के सूत्रधार बेनकाब हो सकें।
राहुल गांधी ने यह भी चौंकाने वाला दावा किया है कि मोदी सरकार के 200 अफसर लगातार उनके संपर्क में हैं, हरेक ‘सूचना’ देते हैं। ये अफसर ईडी (प्रवर्तन निदेशालय), सीबीआई और विदेश मंत्रालय में हैं। प्रधानमंत्री मोदी को जो करना है, वह कर लें, सरकार का ‘ब्लूप्रिंट’ हमारे पास है। नेता प्रतिपक्ष यह अवधारणा भी फैला रहे हैं कि 50 फीसदी पुलिस आंदोलन की समर्थक है। पुलिसवाले सोचते रहते हैं कि वे ‘वोट चोरों’ और ‘देश-विरोधियों’ को क्यों बचा रहे हैं? बहरहाल राहुल गांधी अवधारणा की राजनीति के जरिए देश में ऐसी ‘हवा’ बनाने की कोशिश में हैं, जो ‘इंडी’ ब्लॉक के पक्ष में ‘लहर’ पैदा कर दे। हम नहीं जानते कि यह अवधारणा कितनी बदलेगी और कितनी कारगर साबित होगी, लेकिन राहुल गांधी इस बार अपेक्षाकृत आक्रामक और निरंतर लग रहे हैं। यह भी संवैधानिक यथार्थ है कि देश के मतदाता ही देश, लोकतंत्र और सरकार को चलाते हैं, चुनते हैं, लिहाजा मताधिकार बेशकीमती है। फिलहाल यह मतदाता राहुल गांधी और कांग्रेस के पक्ष में नहीं हैं। ‘वोट चोरी’ का अध्याय शुरू होने और विवादास्पद सीईसी ज्ञानेश से पहले ही कांग्रेस लगातार तीन लोकसभा चुनाव हार चुकी थी। कई राज्यों में कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही है। उप्र, बंगाल, बिहार सरीखे राज्यों में उसका लगभग सूपड़ा साफ है। अब राहुल गांधी को लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को ‘वोट चोरी’ के जरिए चुनाव जितवाए जाते रहे हैं। अब वह समूचे विपक्ष के साथ सडक़ों पर उतर आए हैं, लिहाजा अवधारणा की राजनीति का मॉडल अराजक भी लगता है और अनिश्चित भी है, क्योंकि ऐसा कोई रुझान, संकेत, सर्वेक्षण सामने नहीं हैं, जो स्पष्ट कर सकें कि अवधारणा किन स्तरों पर, कितने फीसदी बदल रही है। राजधानी दिल्ली में फिलहाल जन-सैलाब मौजूद है, जाहिर है कि उससे जन-जीवन, जन-व्यवस्था प्रभावित हो रहे हैं। राहुल और प्रियंका गांधी ने सोमवार को मात्र एक किलोमीटर पैदल मार्च का नेतृत्व किया था।
अप्रत्याशित भीड़ के कारण भगदड़ के आसार बनते रहे। कुछ पत्रकार, वकील और कार्यकर्ता संभावित भगदड़ में पिसते रहे। शुक्र है कि कोई अनहोनी नहीं हुई। बहरहाल अब राहुल गांधी समेत विपक्षी गठबंधन के 11 बड़े नेताओं ने सर्वोच्च अदालत में याचिका दे दी है, कुछ याचिकाएं पहले से ही विचाराधीन हैं, लिहाजा अब सडक़ों पर हुजूम थमना चाहिए। त्योहारों का मौसम फीका न चला जाए, लिहाजा आंदोलन को विश्राम देना चाहिए और शीर्ष अदालत के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए। सीईसी को फिर भी बर्खास्त नहीं किया जा सकता, अलबत्ता अदालत विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को रद्द कर सकती है अथवा उच्च स्तर की जांच (अपनी निगरानी में भी) बिठा सकती है। यदि सर्वोच्च अदालत पर भरोसा है, तो इंतजार करें। बेशक मतदाताओं से अवैध ढंग से उनका मताधिकार नहीं छीना जाना चाहिए। अगर बड़े स्तर पर ऐसा हुआ है, तो कार्रवाई होनी ही चाहिए तथा अवैध ढंग से जिनका मताधिकार छीना गया है, उसे बहाल किया जाना चाहिए।




