राष्ट्रीय

14 अगस्त : विभाजन स्मृति दिवस

भारत का ‘स्वाधीनता दिवस’ 15 अगस्त, एक ‘क्रूर त्रासदी’ थी। इस आजादी ने ‘मानवता की आत्मा’ को दो-फाड़ कर दिया था। मानवता लहूलुहान हो गई थी। इस आजादी ने सदियों से चली आ रही सभी सम्प्रदायों की ‘सांझीवालता’ को चूर-चूर कर दिया था। आजादी ने पंजाब की बहादुर-कौम और हिंदुओं को खून के आंसुओं में नख से शिख तक डुबो दिया था। बंगाल के हिंदू राजाओं, महाराजाओं, जमींदारों, साहूकारों, व्यापारियों को राजा से रंक बना कर रख दिया। रविन्द्र नाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, अरविंदघोष, राजा राम मोहन राय और बंकिम चंद्र की आत्मा को छलनी-छलनी कर दिया था। एक सभ्य विरासतवाला प्रांत, पूर्वी बंगाल के विस्थापित, भूखे-नंगे लोगों को शरणार्थी शिविरों में पशुओं की तरह रहना पड़ा। 

किसी भी भारतीय को इस बात का ज्ञान नहीं था कि 15 अगस्त, 1947 की आजादी उन्हें घर से बेघर कर जाएगी। यह अंग्रेजी हकूमत का एक संवेदनाहीन षड्यंत्र था। फूट डालो और राज करो की घृणित नीति का परिणाम था। विभाजन का कारण था तत्कालीन वायसराय लार्ड माऊंटबैटन और ‘मुस्लिम लीग’ के एकमात्र नेता मोहम्मद अली जिन्ना के बीच की गहरी दोस्ती। यह षड्यंत्र था उन कतिपय नेताओं का, जिन्हें प्रधानमंत्री बनना था, उन नेताओं की महत्वाकांक्षाओं का, जिन्हें स्वतंत्र भारत की सरकार में मंत्री पद चाहिए था। इन्हीं कुचालों से देश बंट गया। 

कल तक जो ङ्क्षहदू-जमींदारों के नौकर थे, वही नौकर तलवारों से अपने मालिक  की गर्दन काट रहे थे। उन्हीं मालिकों की युवा बहू-बेटियों को छीन कर ले गए। 75,000 युवा महिलाओं से बलात्कार कर उनकी हत्या कर दी गई। जो युवा बहू-बेटियां बच गईं, उन्हें उनके माता-पिता ने या तो कुओं में धक्का दे दिया या अगस्त की बरसात में दरियाओं में आई बाढ़ में धकेल दिया। कइयों ने अपनी ही बेटियोंका गला दबा कर हत्या कर दी। कई परिवारों के परिवार उफनती नदियों के पानी में डूब गए। फिर हारे-थके विस्थापित लोग अंतहीन रास्तों पर चल कर भारत की सीमाओं में दाखिल हुए। ऐसे शरणाॢथयों के लिए धरती ही बिछौना थी और आकाश ही ओढऩथा। 

मानवता आजादी पर आंसू बहा रही थी। मानव ही मानव का दुश्मन बन गया था। कानून नाम की कोई चीज नहीं रही। चारों तरफ अराजकता, चारों तरफ लोगों को अंधेरा ही अंधेरा नजर आता था। मुस्लिम सेना ने ङ्क्षहदुओं के काफिलों पर गोलियां चला कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। कोई किसी की आवाज सुनने वाला नहीं था। दोनों देशों की सरकारों को शायद 1947 में लकवा मार गया था। देश के दुश्मन आजादी पर मुस्करा रहे थे, जबकि देशभक्त जनता खून के आंसू रो रही थी। आज की युवा पीढ़ी को तो ‘विभाजन की विभीषिका’ का पता ही नहीं। इन सब परिस्थितियों में भी मानव ने जीने की चाह नहीं छोड़ी। धीरे-धीरे पाकिस्तान से उजड़ कर आए लोगों ने शर्म छोड़ जीने के साधन-जुटाए, थके-मांदे शरणार्थी लोगों ने फिर साहस जुटाकर अपने आपको समाज में खड़ा किया। इन आजाद-भारत में उजड़ कर आए लोगों के हौसलों को ‘सैल्यूट’। आज की पीढ़ी को आजादी के पीछे का इतिहास तो पढऩा ही चाहिए। यह आजादी लार्ड माऊंटबैटन के षड्यंत्र, महात्मा गांधी को छोड़ कांग्रेस नेताओं की मुस्लिम लीग की सोच का परिणाम थी। महात्मा गांधी ने मोहम्मद अली जिन्ना को कांग्रेसी नेताओं की इच्छाके विरुद्ध जाकर पाकिस्तान की मांग छोडऩे का अनुरोध भी किया। जिन्ना को सारे भारत का प्रधानमंत्री बनने का प्रलोभन भी दिया, परन्तु वह ‘टू-नेशन थ्योरी’ से टस से मस न हुए। वह पाकिस्तान लेकर ही रहे।

आजादी प्राप्ति ने 1.5 करोड़ लोगों को विस्थापित कर दिया। 10 से 20 लाख लोगों की मृत्यु हो गई। अरबों रुपयों की सम्पत्ति नष्ट हुई। लाखों करोड़ों की संख्या में पशु धन बर्बाद हो गया। पश्चिम बंगाल में 83 लाख विस्थापित पूर्वी बंगाल से उजड़ कर आ गए। 96 लाख लोग शरणार्थी बन कर पंजाब में आ गए। सरकार इतने विस्थापित लोगों के लिए टैंटों तक का प्रबंध न कर सकी। दिल्ली का हर चौक, हर सड़क उजड़कर आए लोगों की भीड़ से खचाखच भरे हुए थे। इतना जरखेज, सुंदर हिंदू-सिखों के मंदिरों-गुरुद्वारों वाला इलाका पाकिस्तान ले गया। ऐसे हालातों के मद्देनजर आज की युवा पीढ़ी को चेतावनी और आह्वान भी है कि वह भारत के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी समझें। यह देश सब का है, सभी को इसे आगे की ओर ले जाना है।-मा. मोहन लाल

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