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457 साल बाद दुनिया का नक्शा बदलने की तैयारी

दुनिया का नक्शा बदल रहा है, वह नक्शा, जो 457 साल से इस्तेमाल किया जा रहा है। निश्चित रूप से जिस तेजी से दुनिया बदली, विज्ञान बहुत आगे बढ़ा, हर रोज नई तकनीक आ रही है, अब आसमान से धरती का कोना-कोना निहारना नामुमकिन नहीं। ऐसे में भला इतने पुराने नक्शे को लेकर क्यों न आवाज उठे? नक्शा बदलने से वैश्विक भूभाग नहीं बदलेगा लेकिन जो कुछ खामियां थीं, उन्हें सुधारा जाएगा। यह एक तरह से गलत तरीके से दिखाए गए नक्शे को सही करना और सच सामने लाने जैसा है। 

विश्व में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला नक्शा 1569 में बनाया गया ‘मर्केटर मानचित्र’ है। इसे यूरोप के नक्शा बनाने वाले जेराडर््स मर्केटर ने इसलिए बनाया था, ताकि यूरोपीय खोजकत्र्ताओं को वैश्विक यात्रा के दौरान मदद मिल सके। लेकिन तब से अब तक सिवाय नक्शे के बहुत कुछ बदल चुका है। मर्केटर मानचित्र विशेषकर जहाजरानी, समुद्री नेविगेशन (दिशा और कोण सीधे रखने) के उद्देश्य से बनाया गया था, जिसमें एक खामी थी। नक्शे में भूमध्य रेखा से दूर उत्तर और दक्षिण में मौजूद देश आकार में बहुत बड़े दिखते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के पास स्थित देश काफी छोटे दिखते हैं। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड और अफ्रीका एक ही आकार के दिखते हैं। जबकि असलियत में अफ्रीका 3.04 करोड़ वर्ग कि.मी. का है और ग्रीनलैंड 22 लाख वर्ग कि.मी. का, यानी अफ्रीका 14 गुना बड़ा है। अफ्रीका महाद्वीप इतना बड़ा है कि इसके भीतर संयुक्त राज्य अमरीका, चीन, भारत, जापान, मैक्सिको और पूरे पश्चिमी यूरोप को समाहित किया जा सकता है।

यकीनन नक्शे को और भी शुद्ध या अद्यतन किया जाना जरूरी है, जिसके लिए बाकायदा संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी यू.एन.जी.ए. ने मतदान कराया। विभिन्न देशों ने एक ऐसे नए नक्शे को अपनाने के पक्ष में वोट किया, जो धरती के महाद्वीपों का बिल्कुल सही आकार दिखाए। इस मतदान में सिवाय अमरीका के किसी ने भी खिलाफ वोट नहीं किया, जबकि 6 देशों ने भाग नहीं लिया। अमरीका ने इसे एक वैचारिक एजैंडा और जरूरी वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने वाला कदम बताते हुए तर्क दिया कि यह प्रस्ताव इस संस्था के कार्य और उद्देश्य का उपहास करता है। इस प्रयास को भले ही मानचित्र संबंधी मापदंडों को अद्यतन करने की सामान्य कोशिश बताया जा रहा हो, लेकिन अमरीका इसे एक व्यापक और अधिक कट्टरपंथी वैचारिक परियोजना का हिस्सा मानता है। 

दुनिया को वर्षों से एक नक्शे के जरिए देखने का नजरिया बदलने और सटीक करने की कोशिश आखिरकार 4 सितम्बर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के मतदान में कामियाब हुई। भारत सहित 164 देशों ने नए नक्शे के पक्ष में वोट किया, अकेले अमरीका ने विरोध किया। इस नक्शे को ‘इक्वल अर्थकार्टोग्राफिक प्रोजैक्शन’ के नाम से जाना जाता है। इस प्रस्ताव की अगुवाई कई अफ्रीकी देशों ने की थी। टॉगो ने अफ्रीकी संघ के समर्थन से लाए गए इस प्रस्ताव में कहा कि मर्केटर नक्शे की विकृतियों ने सदियों से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह पैदा किए हैं। 
इसे संज्ञानात्मक न्याय और ऐतिहासिक सुधार का मामला बताया। ‘इक्वल अर्थ प्रोजैक्शन’ को 2018 में विकसित किया गया। इससे अन्य ‘इक्वल एरिया’ नक्शे महाद्वीपों के सापेक्ष आकार को बिल्कुल सटीक अनुपात में दिखाते हैं।

भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया लेकिन साफ किया कि अगर कोई नया नक्शा बनेगा तो उसमें भारत का पूरा भूभाग सही तरीके से हो, खासकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे केंद्र शासित प्रदेश भारतीय आधिकारिक नक्शे के मुताबिक हों। इन्हें गलत या भ्रामक दिखाना मंजूर नहीं होगा। मर्केटर प्रोजैक्शन अभी भी शिक्षा, मीडिया, डिजिटल और सरकारी सामग्री में काफी उपयोग किया जाता है। गोल पृथ्वी को सपाट सतह पर दिखाने की कीमत क्षेत्रफल में विकृति के रूप में चुकानी पड़ती है। यह भूमध्य रेखा से दूर उत्तर और दक्षिण के इलाकों के आकार बिगाड़ देता है। इससे अफ्रीका, लैटिन अमरीका और दक्षिण एशिया के आकार छोटे लगते हैं और दुनिया का नक्शा असंतुलित नजर आता है।

भारत ने पक्ष में वोट के साथ व्याख्या भी दी, जिसमें कहा कि प्रस्ताव बराबर क्षेत्रफल वाले मानचित्रण प्रतिनिधित्व सिद्धांत को बढ़ावा देता है लेकिन किसी खास नक्शे या सीमाओं का समर्थन नहीं करता। प्रस्ताव के पक्ष या विपक्ष में एस्टोनिया, जॉॢजया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, साॢबया और यूक्रेन ने मतदान से परहेज किया। भारत ने स्पष्ट किया कि प्रस्ताव का जम्मू-कश्मीर, लद्दाख या किसी अंतर्राष्ट्रीय सीमा के राजनीतिक दर्जे से कोई लेना-देना नहीं है। भारत ने अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर रुख को स्पष्ट, लगातार एक जैसा और अपराक्राम्य बताया, जो नक्शे में भी हो। अगले ही दिन पाकिस्तान ने अपनी आदत के मुताबिक भारत के रुख को निशाना बनाया और जम्मू-कश्मीर पर अपने पुराने दावे दोहरा दिए, जो न कभी स्वीकार्य थे, न होंगे। निश्चित रूप से नए युग और नए समय के मुताबिक गोल पृथ्वी का नया और सही नक्शा जरूरी है।-ऋतुपर्ण दवे

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