लेख

बसंत, होली, रंगोत्सव…

इस रंगावसर पर उन विभूतियों की संस्मृतियां आत्मा को झंकृत करती हैं, जिन्होंने जीवन को आशा व विश्वास प्रदान किया। जिनके पुरुषार्थ से जीवन का कल्याण हुआ। जिनकी कल्पना-संकल्पना द्वारा जीवन का चहुंमुखी प्राकृतिक विकास हुआ। जिनके विवेक में जीवन परहितैषी रहा। जिन्होंने षड्यंत्र द्वारा प्रस्थापित प्रत्येक पूर्वाग्रह व प्रचलन की बाह्य-आंतरिक अनदेखी की। जिनके होने-जीने से प्रकृति का कुछ न कुछ उद्धार हुआ। जिनकी जीवनावधि में पंचतत्व धन्यधन्य हुए। जिनके व्यक्तित्व ने सूर्य को अधिक तेजस्वी बनाया। जिनके शांत-प्रशांत व्यवहार ने चंद्रमा की रजतप्रभा में वृद्धि की। जिनकी निश्छलता द्वारा तारकों की टिमटिमाहट अत्यधिक आकर्षक हुई…

होली के लिए वातावरण स्वयं को श्रृंगारित कर ही लेता है। पश्चिमी विक्षोभ ने उत्तर भारत के बसंत को आंखों के लिए भले ही कुरूप बना दिया था, किंतु होली के लिए बसंत अपने स्वरूप में प्रकट है। पश्चिम, पूर्व व दक्षिण दिशाओं से हवा चलती रही थी। इससे उत्तर भारत के धूलकण, धुंध, काला प्रदूषण यहां-वहां फैलते रहे थे। किंतु होली से दो दिवस पूर्व वायुमंडल स्वच्छ हो उठा। रात्रि स्वस्थ हो उठी। सूर्योदय पर धुंधीला मौसम हावी नहीं है। सूर्यप्रकाश में प्रदीप्ति है। प्रकाश में पीत रंग की अधिकता है। काया पर गुलाबी शीताभास के साथ घर-बाहर फैले प्रदीप्त व पीत सूर्यप्रकाश को देख मन-मस्तिष्क तथा हृदय-आत्मा स्वत: प्रफुल्लित हो उठते हैं। जीवन सहसा प्राकृतिक हो उठता है। जीवन से स्नेह बंध जाता है। स्वयं से लगाव होने लगता है। स्वयं से लगाव होने के बाद जीवन में विद्यमान प्रत्येक चल-अचल एवं सजीव-निर्जीव अस्तित्व से भी अप्रतिम लगाव होने लगता है। बसंत का प्रात:काल अद्भुत है। ये वही अनुभव कर सकता है, जो प्रात:काल में अनिद्रा त्याग, आंखें खोल भूमि व आकाश को गंभीरतापूर्वक देख सकेगा। बसंत वास्तव में अद्भुत से भी अद्भुत है। सूर्योदय से पहले पर्वतों की घाटियां, वन-वनस्पतियां, खेत-खलिहान, व्योम का रंगरूप तथा आंखों से दिखाई देता प्रत्येक प्राकृतिक अस्तित्व मानव को अलौकिक आनंद प्रदान करते हैं। बसंत के प्रभाव में ये सभी अस्तित्व बहुगुणी सौंदर्य के साथ उपस्थित होते हैं। सूर्य उदित होता है। उदयावधि की प्रकाश किरणें देखने वाले पर वरदान बनकर पड़ती हैं। झिलमिलाते उजाले की रश्मियां जीवन को आनंदशक्ति से संचित कर देती हैं। धरती के जिस-जिस क्षेत्र पर भी सूर्य की किरणें व रश्मियां प्रकाश के पीतास्तित्व के साथ प्रवाहित होती हैं, वो बासंती मधुप बन अपनी शोभा से व्याकुल करता है।

हरे पौधों के शीर्ष पर खिले सरसों के पीत पुष्प मद्दिम वायु में दायें-बायें झुककर देखने वाले को हर्षित करते हैं। सरसों का हरा-पीत अस्तित्व विचित्र रंगाकर्षण है। असंख्य पक्षी चहुंओर हैं। कोई उड़ रहा है, कोई बैठा हुआ है। सभी अपनी-अपनी चहचहाहट से वातावरण को जागृत करते हैं। आम्र वृक्षों पर मंजरियां निकल आई हैं। इनकी मनहर सुगंध रास्तों को झुमाती है। रास्तों से आने-जाने वाले सुगंधित वातावरण में जीवन के लिए एक नई मंजुलदृष्टि महसूस करते हैं। गेहूं की वनस्पतियां अन्न से भर रही हैं। चैत्र तक ये स्वर्णिम रंग से भरकर पूर्ण खाद्यान्न में परिवर्तित हो जाएंगी। गोरैया, कबूतर, कोयल, तोता तथा अन्य रंगरूप व कलरव वाणी वाले पक्षी दिनभर बसंत को जीते हैं। भांति-भांति के वृक्ष, लताएं, वनस्पतियां नवीन कोंपलों से लदे हैं। लेखक को यदि प्राकृतिक गतिविधि के साथ निरंतर रहने दिया जाए, तो वह सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक कितने ही अमूल्य बासंती रत्न संस्मृतियों में बांध ले। इन रत्नों की तुलना में भौतिक दुनिया व जीवन का कोई रत्न नहीं है, और न कभी हो सकता है। आधुनिक विश्व में मनुष्य के ज्ञात-अज्ञात कायारोगों, मनोरोगों की श्रेष्ठ चिकित्सा है प्रकृति, विशेषकर बासंती मौसम की प्रकृति। मानव के आत्मिक असंतोष, गुप्त दु:खों व शोकों तथा अपरिभाषित-अव्यक्त पीड़ाओं की आनंदपूर्ण चिकित्सा है बसंत की प्राकृतिक छटा। होली इस छटा का चरमोत्कर्ष है। फाल्गुन माह जीवन जीने का सर्वाधिक मधुरिम अवसर है। फाल्गुन में होली तो स्वर्ण पर हीरक की शोभना है। रंगों का उत्सव जीवन को प्रतिक्षण उमंग, उल्लास, हर्षातिरेक व काल्पनिक सुख में प्रवाहित करता है। फाल्गुन पूर्णिमा का चंद्रमा धरती पर रात्रि का आश्चर्य होता है। पूर्णिमा पर तारकों के प्रतिनिधि, रजनी के सहयात्री तथा प्रेमियों के मित्र शशि की कांति अवर्णनीय होती है। तारों से भरा हुआ नभ चंद्रज्योति में एक स्वप्नझूला होता है, जिस पर बैठ धरती का संवेदनशील मानव जीवनभर बसंत में झूलना चाहता है। इस ऋतु में दिवस अथवा रात्रि, बस धरती के अंश-अंश को घूम-घूम कर आत्मसात करने की इच्छा होती है। एक ओर दिवसीय आभा मन, हृदय एवं आत्मा को प्रेमाकुल करती रहती है, तो दूसरी ओर रात्रि प्रभा चंद्र व तारकों की रजतज्योति के साथ प्रीति की श्वासें भरने-छोडऩे को विवश करती हैं। काया एवं मन, दोनों ही मधुर पीड़ा से भरे होते हैं। जीवन पर होली के रंगों तथा प्रकृति के सुरभित रंगरूप के माध्यम से आनंद अमृत बरस रहा होता है। लेखक तो अपने जीवनानुभवों के साथ भौतिक जीवन, समाज, परिवार, धर्म, ईश्वर, राजकाज नीति, ज्ञान-विज्ञान सभी कुछ त्याग केवल और केवल प्रकृति के बासंती रंग में डूबा हुआ है। इसके लिए जीवन की सभी बातें, गतिविधियां तथा रीतियां विस्मृत हैं। मात्र बसंत है, रंग हैं, आधुनिक होने से बची हुई प्रकृति है, जो इस प्राणी को अस्तित्व प्रतीत होती है।

शेष सब कुछ इसकी दृष्टि-अंतर्दृष्टि में एक निकृष्ट भ्रम है। इस रंगावसर पर उन विभूतियों की संस्मृतियां आत्मा को झंकृत करती हैं, जिन्होंने जीवन को आशा व विश्वास प्रदान किया। जिनके पुरुषार्थ से जीवन का कल्याण हुआ। जिनकी कल्पना-संकल्पना द्वारा जीवन का चहुंमुखी प्राकृतिक विकास हुआ। जिनके विवेक में जीवन परहितैषी रहा। जिन्होंने षड्यंत्र द्वारा प्रस्थापित प्रत्येक पूर्वाग्रह व प्रचलन की बाह्य-आंतरिक अनदेखी की। जिनके होने-जीने से प्रकृति का कुछ न कुछ उद्धार हुआ। जिनकी जीवनावधि में पंचतत्व धन्यधन्य हुए। जिनके व्यक्तित्व ने सूर्य को अधिक तेजस्वी बनाया। जिनके शांत-प्रशांत व्यवहार ने चंद्रमा की रजतप्रभा में वृद्धि की। जिनकी निश्छलता द्वारा तारकों की टिमटिमाहट अत्यधिक आकर्षक हुई। जिनकी उदारता ने व्योम को समृद्ध किया। जिनके वात्सल्य ने भूमि को अति संवेदनशील व सहनशील बनाया। जिनकी परोपकारी भावना ने वायु के स्पर्श को मधुरतम बनाया। जिनके निष्कलंक व उदार हृदय ने नीर को पवित्रतम बनाया। आइये बासंती चरमोत्कर्ष के शुभावसर होली पर उन्हें भी रंगकामनाएं प्रदान करें। ‘पंचतत्त्वों में से एक अग्नि का सुविवेक/हुआ था जीवंत-जाग्रत जग कल्याण हेतु/हुई भस्म होलिका चमका प्रह्लाद धूमकेतु/ प्रह्लाद की भक्ति तले दब गया जगांधकार/नरसिंह ईश ने हिरण्यकश्यप का किया संहार/फाल्गुन पूर्णिमा रात्रि में घटी ये घटना विशेष/बुराइयों-पापों का रहा न तब किंचित अवशेष/होली आनंदोत्सव तब से अविराम चल रहा/प्रतिवर्ष रंगोत्सव, मनुज मधुरस में घुल रहा/ऋतुश्रेष्ठा बसंत के आंचल में सुरभित-पल्लवित/फाल्गुनी रंगीली होली, रंगरंग में स्नेहा कुसुमित/निर्मल नि:स्वार्थ निष्कपट मनुष्य-हृदय संजीव होता/चहुंदिश फागरीत फागप्रीत का चित्रदर्श सजीव होता।’-विकेश कुमार बडोला

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