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महिलाओं को समान अवसर मिलने चाहिएं, न कि दिखावा

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को एक वार्षिक अनुष्ठान के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया गया। सोशल मीडिया महिलाओं की प्रशंसा से भरे संदेशों से भर गया, जबकि अखबारों ने इस दिन का जश्न मनाते हुए पूरे पेज के विज्ञापन प्रकाशित किए। नेताओं ने, हमेशा की तरह, भाषण दिए और महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए बयान जारी किए। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारी आबादी का लगभग आधा हिस्सा महिलाएं, उन सभी प्रशंसाओं और उससे भी अधिक की हकदार हैं।

हालांकि, कड़वी सच्चाई यह है कि हम उनकी क्षमता के एक अंश का भी उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। कार्यबल में केवल 21 प्रतिशत भागीदारी के साथ, महिला भागीदारी और सशक्तिकरण के मामले में हमारा देश, मुस्लिम देशों को छोड़कर, सबसे निचले पायदान पर है। हमारे राजनेता अब महिला मतदाताओं के महत्व को समझते हैं और उन्हें सशक्त बनाने के लिए सच्चे प्रयास करने की बजाय मुफ्त उपहार और यहां तक कि नकद देने में भी उदार हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ‘पात्र महिलाओं’ के लिए 1000 रुपए का मासिक अनुदान देने वाले नवीनतम व्यक्ति हैं, जबकि असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने बिहार विधानसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर महिलाओं को दिए गए नकद की तर्ज पर महिलाओं के लिए 10,000 रुपए की नकद राशि देने की घोषणा की है। फिर भी, जब पार्टी टिकटों के वितरण की बात आती है, तो राजनीतिक दल पीछे हट जाते हैं और ‘सक्षम’ महिला उम्मीदवार नहीं ढूंढ पाते। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि संसद और राज्य विधानसभाओं में केवल 14 प्रतिशत महिलाएं हैं। अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत असंगत है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, स्वास्थ्य क्षेत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 29 प्रतिशत है। हालांकि, इस प्रतिनिधित्व का 80 प्रतिशत से अधिक नर्सिंग और अन्य कम वेतन वाली सेवाओं में है। शिक्षा क्षेत्र में, जबकि 53 प्रतिशत स्कूल शिक्षक महिलाएं हैं, प्रतिष्ठित उच्च स्तरीय संस्थानों में उनका प्रतिनिधित्व केवल 13 प्रतिशत है। इन आंकड़ों के अनुसार, बैंकिंग क्षेत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल 17 प्रतिशत है, जबकि कानूनी पेशे में यह सिर्फ 14 प्रतिशत है। विनिर्माण, रक्षा और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में यह प्रतिशत और भी कम है। दुर्भाग्य से, सामाजिक जागरूकता अभियानों और इस तथ्य के बावजूद कि महिलाओं ने कई रूढिय़ों को तोड़ा है और विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण रूप से अच्छा प्रदर्शन किया है, देश के कई हिस्सों में बालिकाओं के साथ भेदभाव जारी है। यह भेदभाव कई राज्यों में, विशेषकर उत्तरी भारत में, बालिकाओं के कम अनुपात में परिलक्षित होता है। यह एक ज्ञात तथ्य है कि लिंग निर्धारण परीक्षणों पर प्रतिबंध के बावजूद अवैध अल्ट्रासाऊंड केंद्र फल-फूल रहे हैं। यह भी ज्ञात है कि कई मादा शिशुओं को माता-पिता द्वारा मार दिया जाता है, जो नर संतान चाहते हैं।

यूनेस्को इंस्टीच्यूट फॉर स्टैटिस्टिक्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में 40 प्रतिशत लड़कियां कक्षा 10 तक पहुंचने से पहले ही स्कूल छोड़ देती हैं। नकद राशि देने की बजाय, जैसा कई राज्यों द्वारा किया जा रहा है, सरकारों को उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए उत्पादक सुविधाएं और कौशल प्रदान करके सशक्त बनाना चाहिए। मुफ्त उपहार देना न तो राष्ट्र के लिए अच्छा है और न ही स्वयं महिलाओं के लिए। यह उनके आत्मसम्मान में वृद्धि नहीं करता और न ही राष्ट्र निर्माण में योगदान देता है लेकिन राजनेता अन्य निहितार्थों के बारे में सोचने की बजाय उचित और अनुचित साधनों से सत्ता में आने के लिए अधिक उत्सुक हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि बढ़ती संख्या में महिलाएं खेल से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही हैं और अपनी उपलब्धियों से देश को गौरवान्वित कर रही हैं। हालांकि, हम राष्ट्र निर्माण में उनकी पूरी क्षमता का उपयोग करने से बहुत दूर हैं। कोई भी देश सही मायने में प्रगति नहीं कर सकता, जहां उसकी आधी आबादी अवसरों से वंचित रहे। हमें दूरदर्शी नेताओं की आवश्यकता है, जो उन्हें केवल चुनावी लाभ के चश्मे से न देखें। महिलाएं समान अवसरों की हकदार हैं, न कि केवल खोखली प्रतीकात्मकता की।-विपिन पब्बी 

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