संपादकीय

फिलहाल आर्थिक मंदी नहीं…

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का मानना है कि ईरान युद्ध के कारण विश्व खतरनाक ऊर्जा-संकट की दहलीज पर है। युद्ध के दौरान मिसाइल हमलों से तेल-गैस ठिकानों को इतना तबाह, बर्बाद किया गया है कि उनकी भरपाई में सालों का वक्त लगेगा। ऊर्जा-संकट के साथ खाद्य-संकट भी जुड़ा है। इस समय करीब 32 करोड़ लोग दुनिया में खाद्य-सुरक्षा के लिए जूझ रहे हैं। इसी दौरान ‘मूडीज’ जैसी अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी का आकलन सामने आया है कि वैश्विक आर्थिक मंदी के आसार पुख्ता होते जा रहे हैं। जिस अमरीका ने इजरायल के साथ मिल कर ईरान पर हमलों की शुरुआत की थी, उसी देश में, 12 माह की अवधि में, करीब 49 फीसदी आर्थिक मंदी की संभावनाएं हैं। अमरीका की जीडीपी 2934 लाख करोड़ रुपए (करीब 30.6 ट्रिलियन डॉलर) की है, जबकि कर्ज 3640 लाख करोड़ रुपए (करीब 39 ट्रिलियन डॉलर) हो गया है। अमरीका में पेट्रोल-डीजल के दाम भी 17-20 फीसदी तक बढ़ गए हैं, जबकि अमरीका खुद तेल-गैस का उत्पादक देश है। नतीजतन अब अमरीका की जनता और विपक्ष राष्ट्रपति टं्रप को गरियाते हुए सवाल करने लगे हैं कि ईरान के खिलाफ युद्ध क्यों छेड़ा गया? यह सरासर अवैध, अनैतिक और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ यौद्धिक कार्रवाई है। ‘ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी’ की एक रपट के मुताबिक, इस साल के अंत तक वैश्विक आर्थिक विकास दर में 0.7 फीसदी की कमी हो सकती है। यह अरबों रुपए की राशि बनती है। कुछ विशेषज्ञों के आकलन हैं कि यदि ईरान युद्ध लंबा चला, तो 1929 वाली महामंदी का दौर भी आ सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमत 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो भारत में भी महंगाई दर 5-6 फीसदी तक बढ़ सकती है। यदि ईरान के दावों के मुताबिक, कच्चा तेल 200 डॉलर तक उछलता है, तो भारत में महंगाई दर 7-8 फीसदी तक पहुंच सकती है। फिलहाल महंगाई दर 3 फीसदी से कुछ अधिक है।

वैसे भारत 12-14 फीसदी तक की मुद्रास्फीति झेल चुका है। भारत की जीडीपी भी 1-2 फीसदी कम हो सकती है, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था ‘क्रैश’ होने की स्थिति में नहीं है और न ही मंदी के पुख्ता आसार हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि युद्ध के बाद भी भारत की विकास दर 6.6 फीसदी रह सकती है, जो विश्व में सर्वाधिक होगी। यदि विकास दर 7 फीसदी से अधिक से लुढक़ कर 3 फीसदी पर आती है, तो हमें आर्थिक मंदी की चिंता करनी होगी। अर्थशास्त्री भारत सरकार से यह आग्रह भी कर रहे हैं कि सरकार तेल से करीब 7 लाख करोड़ रुपए सालाना कमाती है। ईरान युद्ध हमारे लिए एक ‘झटका’ है, फिलहाल ‘संकट’ की स्थिति नहीं है। झटके के असर को कम करने के लिए सरकार तेल की कमाई में से कुछ खर्च कर उपभोक्ताओं को राहत दे सकती है। अभी हमें प्रतीक्षा करनी होगी कि युद्ध के बाद कच्चे तेल के दाम कहां स्थिर होते हैं-80 या 90 डॉलर प्रति बैरल! उसके मुताबिक ही नई नीतियां बनानी होंगी। फिलहाल डॉलर के मुकाबले हमारी मुद्रा ‘रुपया’ सार्वकालिक निचले स्तर पर है। यह भी हमारी अर्थव्यवस्था, विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय खरीद और भुगतान आदि को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। ईरान ने अभी तक 9 देशों के 39 ऊर्जा ठिकानों पर हमले किए हैं, नतीजतन तेल-गैस की आपूर्ति बाधित है, क्योंकि उन्होंने या तो उत्पादन बंद कर दिए हैं अथवा बहुत कम कर दिए हैं। भारत में तेल की किल्लत नहीं है। बहरहाल समस्याएं और सवाल तो हैं, लेकिन मंदी की भयावह स्थिति नहीं है।

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