इच्छा मृत्यु : पीड़ा से मुक्ति का मानवीय रास्ता

हरीश राणा हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के जयसिंहपुर उपमंडल की सरी पंचायत के पलेटा गांव से संबंध रखते थे। वे 13 वर्षों से कोमा और वेजिटेटिव अवस्था में थे। वर्ष 2013 में एक दुर्घटना में चौथी मंजिल से गिरने के कारण उन्हें गंभीर मस्तिष्क चोट लगी थी, जिसके बाद से वे न तो बोल सकते थे, न ही चल सकते थे और न ही सामान्य जीवन जीने की कोई संभावना बची थी। डॉक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार उनके ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी थी। दो अलग-अलग मेडिकल बोर्डों ने भी यह निष्कर्ष दिया कि उनकी स्थिति अपरिवर्तनीय (इरिवर्सिबल) है और आगे चिकित्सा उपचार से सुधार संभव नहीं है। ऐसी परिस्थिति में उनके माता-पिता ने अदालत से अपील की कि उनके बेटे को इस लंबी पीड़ा से मुक्ति दी जाए…
भारतीय समाज में जीवन को ईश्वर का अमूल्य उपहार माना जाता है, लेकिन जब वही जीवन असहनीय पीड़ा, बेहोशी और पूर्ण असहायता में बदल जाए, तब मानवता एक कठिन प्रश्न के सामने खड़ी हो जाती है- क्या ऐसी स्थिति में व्यक्ति को सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए? हाल ही में हरीश राणा के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई इच्छा मृत्यु (पैसिव यूथेनेसिया) की अनुमति ने इसी प्रश्न को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। यह घटना न केवल भावनात्मक रूप से अत्यंत पीड़ादायक है, बल्कि यह मानवाधिकार, चिकित्सा नैतिकता और न्यायिक संवेदनशीलता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण
13 वर्षों की पीड़ा की कहानी
हरीश राणा हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के जयसिंहपुर उपमंडल की सरी पंचायत के पलेटा गांव से संबंध रखते थे। वे 13 वर्षों से कोमा और वेजिटेटिव अवस्था में थे। वर्ष 2013 में एक दुर्घटना में चौथी मंजिल से गिरने के कारण उन्हें गंभीर मस्तिष्क चोट लगी थी, जिसके बाद से वे न तो बोल सकते थे, न ही चल सकते थे और न ही सामान्य जीवन जीने की कोई संभावना बची थी। डॉक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार उनके ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी थी। दो अलग-अलग मेडिकल बोर्डों ने भी यह निष्कर्ष दिया कि उनकी स्थिति अपरिवर्तनीय (इरिवर्सिबल) है और आगे चिकित्सा उपचार से सुधार संभव नहीं है। ऐसी परिस्थिति में उनके माता-पिता ने अदालत से अपील की कि उनके बेटे को इस लंबी पीड़ा से मुक्ति दी जाए। अंतत: सर्वोच्च न्यायालय ने जीवन रक्षक चिकित्सा उपचार हटाने की अनुमति दी, जिसे ‘पैसिव यूथेनेसिया’ कहा जाता है।
भारत में इच्छामृत्यु का कानूनी परिप्रेक्ष्य
भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु (एक्टिव यूथेनेसिया) अभी भी अवैध है, लेकिन पैसिव यूथेनेसिया को सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी गई है। 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘कॉमन कॉज बनाम भारत सरकार’ मामले में यह माना कि सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। हरीश राणा का मामला इसलिए ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि यह उन शुरुआती मामलों में से है जिसमें अदालत ने स्पष्ट रूप से जीवन-रक्षक उपचार हटाने की अनुमति दी।
चिकित्सा और मानवीय दृष्टिकोण
चिकित्सा विज्ञान का मूल उद्देश्य जीवन बचाना है, लेकिन जब चिकित्सा केवल शरीर को मशीनों और कृत्रिम साधनों से जीवित रखे और व्यक्ति की चेतना, भावनाएं और जीवन की गुणवत्ता समाप्त हो जाए, तब डॉक्टरों के सामने नैतिक दुविधा पैदा होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनिया में हर वर्ष लगभग 4 करोड़ से अधिक लोग जीवन के अंतिम चरण में पालीएटिव केयर की आवश्यकता महसूस करते हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे रोगियों की होती है जिनकी बीमारी लाइलाज होती है और जो लंबे समय तक असहनीय पीड़ा में रहते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो इच्छामृत्यु केवल मृत्यु का प्रश्न नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा और पीड़ा से मुक्ति का प्रश्न भी है।
परिवार की पीड़ा और त्याग
हरीश राणा का मामला केवल कानून या चिकित्सा का विषय नहीं था, बल्कि यह एक परिवार के 13 वर्षों के संघर्ष और पीड़ा की कहानी भी है। उनके माता-पिता ने अपने बेटे की देखभाल में अपना घर तक बेच दिया और वर्षों तक उम्मीद बनाए रखी। जब सभी चिकित्सकीय संभावनाएं समाप्त हो गईं, तब उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि उनके बेटे को गरिमापूर्ण विदाई दी जाए। यह निर्णय उनके लिए भावनात्मक रूप से बेहद कठिन था, लेकिन उन्होंने इसे अपने बेटे की पीड़ा को समाप्त करने का एक मानवीय कदम माना।
समाज के लिए संदेश
हरीश राणा का मामला भारतीय समाज के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ता है : क्या जीवन केवल सांस लेने का नाम है या उसकी गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है?
क्या किसी व्यक्ति को असहनीय पीड़ा से मुक्ति का अधिकार होना चाहिए?
क्या भारत को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट और व्यापक कानून बनाने की आवश्यकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में एंड ऑफ लाइफ केयर और इच्छामृत्यु से संबंधित स्पष्ट नीतियों की आवश्यकता है, ताकि ऐसे मामलों में परिवारों और डॉक्टरों को अनिश्चितता का सामना न करना पड़े। हरीश राणा को इच्छामृत्यु मिलना निस्संदेह एक अत्यंत दुखद घटना है, क्योंकि हर जीवन मूल्यवान होता है। परंतु जब जीवन असहनीय पीड़ा और निराशा का पर्याय बन जाए, तब सम्मानजनक मृत्यु भी एक मानवीय विकल्प बन सकती है। यह घटना हमें यह सिखाती है कि मानवता केवल जीवन बचाने में ही नहीं, बल्कि दुख और पीड़ा को समझने और उसे समाप्त करने के साहसिक निर्णय में भी निहित है। जब किसी व्यक्ति के अंग ठीक ढंग से काम न कर रहे हों, तो उसके लिए इच्छा मृत्यु ही मार्ग है, पीड़ा से मुक्ति का यही एक मार्ग है। हो सकता है, कुछ लोग इससे सहमत न हों, परंतु विश्व के कई देशों में इच्छा मृत्यु की व्यवस्था की गई है।




