ज्योतिष

चैत्र नवरात्रि 2026: महानवमी के दिन जरूर करें इस कथा का पाठ, मां सिद्धिदात्री का मिलेगा आशीर्वाद

Chaitra Navratri 2026: आज यानी 27 मार्च 2026, शुक्रवार को देशभर में महानवमी का त्योहार बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाएगा. नवरात्रि का नौवां दिन देवी दुर्गा के मां सिद्धिदात्री स्वरूप को समर्पित है. मां सिद्धिदात्री का स्वरूप अत्यंत सौम्य और दिव्य है. वे कमल के पुष्प पर विराजमान रहती हैं और सिंह की सवारी करती हैं. उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें वे शंख, चक्र, गदा और कमल धारण करती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और व्रत कथा का पाठ करने से माता रानी अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं.

मां सिद्धिदात्री की व्रत कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में जब चारों ओर अंधकार था, तब भगवान शिव ने शक्ति की सर्वोच्च देवी आदि शक्ति की कठोर तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आदि शक्ति मां सिद्धिदात्री के रूप में प्रकट हुईं. माना जाता है कि मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव को अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठ सिद्धियां प्राप्त हुई थीं. मां की अनुकंपा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हो गया और वे संसार में ‘अर्धनारीश्वर’ के नाम से प्रसिद्ध हुए.

एक अन्य कथा के अनुसार, बहुत समय पहले महिषासुर नामक शक्तिशाली राक्षस ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया और देवताओं को वहां से निकाल दिया. इससे चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई. सभी देवता मदद के लिए त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे.

तब त्रिदेवों और सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई, जो मां सिद्धिदात्री कहलाईं. मां ने अपनी असीम शक्तियों से असुरों की विशाल सेना को पराजित किया और अंत में महिषासुर का वध कर दिया. उनके इस पराक्रम से देवताओं को उनका खोया हुआ सम्मान और स्वर्ग वापस मिला.

मां सिद्धिदात्री के मंत्र

ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।

ॐ ह्रीं सः सर्वार्थसिद्धिदात्र्यै स्वाहा।

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।
वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तुते॥

मां का प्रिय भोग

मां सिद्धिदात्री को हलवा, पूरी और काले चने का भोग अत्यंत प्रिय है. इसके अलावा मौसमी फल और नारियल अर्पित करने से भी माता शीघ्र प्रसन्न होती हैं.

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