1800 की ‘घूस’ पर 35 साल केस, असिस्टेंट इंजीनियर लोअर कोर्ट में दोषी, दिल्ली हाईकोर्ट से बरी

नई दिल्लीः बाढ़ नियंत्रण विभाग में असिस्टेंट इंजीनियर वी. के. दत्ता और जूनियर इंजीनियर दिनेश गर्ग पर 1991 में ठेकेदार का भुगतान कराने के बदले 900-900 की रिश्वत लेने का आरोप लगा था। 2002 में ट्रायल कोर्ट ने दोनों को दोषी ठहराते हुए दो साल कैद की सजा सुनाई। अब 35 साल पुराने इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट को गंभीर कमियां मिली हैं। दोनों पूर्व सरकारी कर्मचारियों की सजा रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि उन्हें दोषी ठहराने में निचली अदालत से गलती हुई।
जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने कहा कि उनको संदेह का लाभ मिलना चाहिए। इसी के साथ, तीन दशकों तक कानूनी विवाद में फंसे रहने के बाद दत्ता और गर्ग बरी हो गए। अभियोजन के बताते हुए कोर्ट ने कहा, ‘शक, चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता।’ जस्टिस सुधा ने 2 अप्रैल के फैसले में कहा कि अभियोजन 14 अहम गवाहों की जांच करने में नाकाम रहा। कथित तौर पर जिस तरह से पैसा बरामद किया गया था, उसमें कमियों की अनदेखी हुई।
रिश्वत लेने का मकसद साबित नहीं
कोर्ट ने पाया कि अभियोजन की कहानी में गंभीर गड़बड़ियां हैं। बचाव पक्ष के वकील एडवोकेट समीर चंद्रा ने ऐसे सबूत पेश किए, जिनमें अटेंडेंस रजिस्टर भी था। इससे साबित हुआ कि दत्ता और गर्ग उस समय दफ्तर में नहीं, बल्कि दूर की साइट पर थे, जब रिश्वत मांगने का आरोप लगा था।
कोर्ट ने टाइमलाइन पर भी सवाल उठाए, क्योंकि FIR सुबह 11:15 बजे हुई, ठीक उसी वक्त जब शिकायतकर्ता के मुताबिक वह CBI दफ्तर पहुंच रहा था। रिश्वत लेने का मकसद भी नहीं मिला। एक इइंजीनियर की गवाही से पता चला कि ठेकेदार का कोई भुगतान बकाया नही था।




