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धरती के गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देती है यह रहस्यमयी नदी, ऊपर बहता है पानी, वैज्ञानिकों ने सुलझाई गुत्थी!

दुनियाभर में कई ऐसी रहस्यमयी जगहें हैं, जो किसी अजूबे कम नहीं हैं. इनमें कुछ चीजें तो प्रकृति के नियमों को भी चुनौती देती नजर आती हैं. अमेरिका की ग्रीन रिवर भी एक ऐसा ही अजूबा रही है, जिसके बारे में पिछले 150 सालों से यह माना जाता था कि यह नदी गुरुत्वाकर्षण को मात देकर ऊपर की ओर (Uphill) बहती है. पहाड़ के को चीरकर निकलने वाली इस नदी ने महान खोजकर्ता जॉन वेस्ले पॉवेल से लेकर आधुनिक वैज्ञानिकों तक को चक्कर में डाल रखा था. लेकिन अब ग्लासगो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस रहस्य की गुत्थी सुलझा ली है. इससे जुड़ा शोध जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च में प्रकाशित हुआ है. बता दें कि यह रहस्य तब शुरू हुआ जब 1869 में खोजकर्ता जॉन वेस्ले पॉवेल ने अपनी यात्रा के दौरान देखा कि ग्रीन रिवर (जो व्योमिंग से निकलकर यूटा के पहाड़ों को पार करती है.) एक बहुत ही अजीब रास्ता चुनती है.

पॉवेल हैरान थे कि यह नदी पहाड़ों के बगल से आसान रास्ता लेने के बजाय सीधे ऊंचे पहाड़ों के बीच से 700 मीटर गहरे खाइयों को चीरती हुई निकलती है. कुछ जगहों पर तो ऐसा लगता था मानो नदी ढलान के बजाय ऊंचाई की ओर चढ़ रही हो. पॉवेल ने अपनी 1875 की किताब में इसे अजीब बताया था, लेकिन तब उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था. इसके बाद दशकों तक वैज्ञानिकों ने कई अलग-अलग तर्क दिए. कुछ का कहना था कि नदी पहाड़ों के बनने से पहले ही वहां मौजूद थी, लेकिन नई डेटिंग ने इस थ्योरी को फेल कर दिया. यूइन्टा पहाड़ करीब 5 करोड़ साल पहले बने थे, जबकि ग्रीन रिवर सिर्फ 20 से 50 लाख साल पुरानी है. यानी पहाड़ पहले आए और नदी बाद में. फिर सवाल वही था कि अगर पहाड़ पहले से थे, तो नदी ने उनके ऊपर चढ़ने या उन्हें काटने की हिम्मत कैसे की? क्या मिट्टी के जमाव ने नदी को इतना ऊंचा उठा दिया था कि वह पहाड़ पार कर सके? इसका भी कोई ठोस सबूत नहीं मिला.

लिथोस्फेरिक ड्रिप का अनोखा सिद्धांत
ग्लासगो यूनिवर्सिटी के 28 वर्षीय शोधकर्ता एडम स्मिथ ने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए एक नया मॉडल पेश किया है, जिसे लिथोस्फेरिक ड्रिप कहा जाता है. स्मिथ के अनुसार, यह सब धरती के बहुत गहरे नीचे होने वाली एक हलचल का नतीजा है. जब पहाड़ बनते हैं, तो धरती की ऊपरी परत (Lithosphere) के निचले हिस्से पर जबरदस्त दबाव और तापमान पड़ता है. इससे वहां गार्नेट जैसे बहुत भारी और सघन खनिज बनने लगते हैं. समय के साथ ये खनिज इतने भारी हो जाते हैं कि वे नीचे मौजूद मेंटल (Mantle) से भी वजनी हो जाते हैं. एडम स्मिथ ने समझाया कि एक समय ऐसा आता है जब यह भारी परत नीचे की ओर टपकने लगती है. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी चम्मच से शहद या गाढ़ा गुड़ नीचे की ओर टपकता है. जब धरती का यह हिस्सा नीचे की ओर टपका, तो ऊपर की जमीन का एक हिस्सा नीचे धंस गया. इसी धंसे हुए निचले बिंदु से ग्रीन रिवर ने अपना रास्ता बनाना शुरू किया, क्योंकि वह उस समय सबसे आसान ढलान वाला रास्ता था.

पहाड़ उठे पर नदी ने नहीं बदला रास्ता
नदी ने पहाड़ों के उस निचले हिस्से को काटना शुरू किया और अपना रास्ता फिक्स कर लिया. जैसे-जैसे समय बीतता गया और भूगर्भीय हलचल के कारण पहाड़ दोबारा ऊंचे उठने लगे, ग्रीन रिवर ने अपना रास्ता नहीं बदला. नदी अपनी गति से पहाड़ों को नीचे की ओर काटती रही. नतीजा यह हुआ कि आज हमें पहाड़ तो ऊंचे दिखते हैं, लेकिन नदी उनके बीच से गहराई में बहती नजर आती है. इसी वजह से देखने वालों को ऐसा भ्रम होता है कि नदी गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ जाकर पहाड़ों पर चढ़ रही है, जबकि हकीकत में वह अपने पुराने ढलान वाले रास्ते को ही काट-काटकर गहरा कर रही है. एडम स्मिथ का कहना है कि आज के दौर में हम केवल चट्टानों को देखकर अंदाजा नहीं लगाते, बल्कि सीस्मिक टोमोग्राफी और न्यूमेरिकल मॉडलिंग जैसी गणितीय तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं. स्विट्जरलैंड के प्रतिष्ठित भूवैज्ञानिक सीन विलेट ने भी इस शोध को विश्वसनीय बताया है और कहा है कि इसके प्रमाण बहुत ठोस हैं.

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