‘माता-पिता और बहन को दूसरी शादी की जानकारी, सिर्फ इसलिए उन पर केस नहीं कस सकते’, बाईगेमी में SC का बड़ा फैसला

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पति की दूसरी शादी की केवल जानकारी होने भर से उसके रिश्तेदारों को बाईगेमी यानी पत्नी के रहते दूसरी शादी के अपराध में आरोपी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो कि रिश्तेदारों ने दूसरी शादी को संपन्न कराने में सक्रिय भूमिका निभाई, उसे बढ़ावा दिया या उसमें सहायता की, तब तक उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 494 (बाईगेमी) के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।
परिवार के खिलाफ कार्यवाही रद्द
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने पति के पिता, मां और बहन के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। शिकायतकर्ता पत्नी ने आरोप लगाया था कि ससुराल पक्ष ने उसे क्रूरता का शिकार बनाया और पति को दूसरी शादी करने के लिए प्रोत्साहित किया। हालांकि, अदालत ने पाया कि पति के खिलाफ जहां मारपीट, दहेज मांग, आर्थिक उत्पीड़न और धोखे जैसे विस्तृत आरोप लगाए गए थे, वहीं रिश्तेदार ों के खिलाफ आरोप सामान्य, अस्पष्ट और ठोस सामग्री से रहित थे। ट्रायल कोर्ट ने मामले को आगे बढ़ाया था और केरल हाईकोर्ट ने भी हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था। इसके बाद पति के रिश्तेदार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और कार्यवाही रद्द करने की मांग की।
केस की बड़ी बातें
- रिश्तेदारों के खिलाफ आरोप सामान्य और अस्पष्ट पाए गए
- अभियोजन पक्ष ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा
- सुप्रीम कोर्ट ने रिश्तेदारों के खिलाफ कार्यवाही रद्द की
परिजनों की मुसीबतें हो सकती हैं कम
यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां वैवाहिक विवादों में पति के साथ-साथ पूरे परिवार को सामान्य आरोपों के आधार पर आरोपी बना दिया जाता है। अदालत ने संकेत दिया है कि आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए स्पष्ट, विशिष्ट और सक्रिय भूमिका का प्रमाण जरूरी है।




