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क्या पूरी तरह एथेनॉल से ही दौड़ेंगी गाड़ियां? जानें किन चुनौतियों का करना पड़ेगा सामना

नई दिल्ली: भारत अब पेट्रोल-डीजल के बाद वाले नए दौर में प्रवेश करने जा रहा है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने गाड़ियों के प्रदूषण से जुड़े नियमों में बदलाव का प्रस्ताव दिया है। इन बदलावों का उद्देश्य E85 और E100 (पूरी तरह एथेनॉल) जैसे ईंधनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। इसके अलावा, इसमें B100 बायो-डीजल और हाइड्रोजन-सीएनजी (H-CNG) के इस्तेमाल का भी प्रावधान किया गया है। भारत ने 2025 तक पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने (E20) का लक्ष्य हासिल कर लिया है।

क्यों है यह अहम?

देश अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से खरीदता है, जिस पर हर साल लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। गन्ना, अनाज और खेती के कचरे से बनने वाला एथेनॉल भारत के उस बड़े लक्ष्य में फिट बैठता है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो और ग्रामीण इलाकों में आमदनी बढ़े।
क्या है चुनौतियां?

  • सबसे बड़ी चिंता माइलेज को लेकर है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एथेनॉल वाली गाड़ियों में माइलेज थोड़ा कम हो सकता है, जो समय के साथ ग्राहकों की जेब पर भारी पड़ सकता है।
  • इसके अलावा, इतनी बड़ी मात्रा में एथेनॉल बनाने के लिए खेती, जमीन और पानी की जरूरत होगी। इससे खाद-पानी और फूड सिक्योरिटी पर असर पड़ सकता है। गन्ना, जिससे सबसे ज्यादा एथेनॉल बनता है, उसे बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है।
  • पुराने वाहनों के साथ तालमेल बिठाना भी मुश्किल होगा। पुरानी गाड़ियां नए ईंधन के लिए शायद फिट न हों, जिससे बाजार दो हिस्सों में बंट सकता है। पेट्रोल पंपों पर ईंधन के विकल्प बढ़ जाएंगे और ग्राहकों को गाड़ी खरीदते समय इस बात का ध्यान रखना होगा कि उनकी गाड़ी कौन से ईंधन पर चलेगी।

क्या है E85 और E100 ईंधन?

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने E85 और E100 जैसे उच्च एथेनॉल-मिश्रित ईंधन को पेश करने का प्रस्ताव दिया है। इसके लिए 27 अप्रैल 2026 को एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया गया है, जिसमें केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन के सुझाव दिए गए हैं।
E85 ईंधन: इसमें 85% एथेनॉल और 15% पेट्रोल का मिश्रण होगा।
E100 ईंधन: यह लगभग पूरी तरह से शुद्ध एथेनॉल होगा।

क्यों जरूरी है यह कदम?

भारत ने साल 2025 में पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है। अब सरकार का उद्देश्य एथेनॉल के उपयोग को और भी अधिक बढ़ाना है। इसके निम्न कारण हैं:

  • कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हो सके।
  • पश्चिमी एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों के बीच विदेशी मुद्रा की बचत हो सके।
  • पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में मदद मिले।

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