रेगिस्तान का ‘अमृत’ है पीलू: भीषण लू में भी शरीर को रखता है कूल, पीलिया और दांतों के रोगों में है रामबाण औषधि

Desert Fruit Pilu: जहाँ सूरज की तपिश पत्थर पिघलाने पर उतारू हो, जहाँ लू के थपेड़े आसमान को झुलसा रहे हों और पारा 50 डिग्री को छूने लगे. ऐसी भीषण परिस्थितियों में भी प्रकृति अपना करिश्मा दिखाना नहीं भूलती. राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र के अंदर इन दिनों ‘जाल’ के पेड़ों पर एक छोटा-सा फल लद गया है, जिसे स्थानीय लोग बड़े चाव से ‘पीलू’ कहते हैं. पीलू को स्थानीय भाषा में ‘रेगिस्तान का अंगूर’ या ‘मावा’ कहा जाता है. यह फल मुख्य रूप से ‘जाल’ के पेड़ पर उगता है. इस फल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि रेगिस्तान में गर्मी जितनी प्रचंड होती है, पीलू का स्वाद उतना ही मीठा और रसीला होता जाता है. जब लू के कारण अन्य वनस्पतियां कुम्हलाने लगती हैं, तब पीलू जीवन का रस बनकर खिलता है और तपते मारवाड़ को राहत पहुँचाता है.
आयुर्वेद में पीलू को एक अत्यंत शीतल फल माना गया है. इसके औषधीय गुणों के कारण इसे ‘प्रकृति का अपना AC’ भी कहा जाता है. पीलू के फायदों की सूची काफी लंबी है. रेगिस्तान के इस मेवे के बारे में यह प्रसिद्ध है कि यह पौष्टिकता से भरपूर होता है और इसे खाने से लू नहीं लगती. साथ ही इसमें कई प्रकार के औषधीय गुण भी होते हैं. इसी कारण मारवाड़ की महिलाएं पीलू को एकत्र कर सुखा लेती हैं और इसे प्रिजर्व (Preserve) कर लेती हैं, ताकि ऑफ-सीजन में भी जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल किया जा सके. यह फल न केवल स्वाद में मीठा होता है, बल्कि यह शरीर को भीतर से इतना ठंडा रखता है कि इसे ‘रेगिस्तान का अमृत’ भी कहा जाता है.
सेहत के लिए रामबाण और पानी की कमी का समाधान
पीलू (जिसे कई जगह डूंगर भी कहा जाता है) एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है. इसका वनस्पतिक नाम ‘डाइओरपाइरोस कांडीफोलिया’ है. यह फल शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के साथ-साथ पीलिया जैसे गंभीर रोगों में रामबाण का काम करता है. इसकी छाल का काढ़ा लीवर से संबंधित विकारों में भी बेहद फायदेमंद पाया गया है. इसके पत्ते खट्टे-मीठे होते हैं और यह एक शुद्ध कुदरती पौधा है जो बिना किसी विशेष देखभाल के रेगिस्तान की आग में पनपता है. न केवल इंसान, बल्कि पक्षी भी इस फल को काफी पसंद करते हैं और भीषण गर्मी में इससे अपनी प्यास और भूख मिटाते हैं.
हैरान कर देने वाले औषधीय और प्राकृतिक गुण
पीलू के फल की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो आधुनिक तकनीक को भी पीछे छोड़ देती हैं:
- दातुन (Miswak): पीलू की टहनियों का उपयोग ‘मिसवाक’ के रूप में किया जाता है. यह दांतों के रोगों से बचाव करने और मुंह की दुर्गंध को जड़ से खत्म करने में बहुत असरदार है.
- रेगिस्तानी संजीवनी: यह तपती गर्मी में अपने नीचे के तापमान को सामान्य से 5-8 डिग्री तक कम करने की क्षमता रखता है.
- सर्दी-खांसी में राहत: इसके पत्तों का काढ़ा श्वसन संबंधी समस्याओं जैसे सर्दी और खांसी में औषधि की तरह काम करता है.
- पशु-पक्षियों का आधार: अकाल और भीषण सूखे के समय भी यह पेड़ हरा-भरा रहकर रेगिस्तान के पशु-पक्षियों के लिए जीवन का एकमात्र सहारा बनता है.
- सुख-समृद्धि और कुदरती ठंडक का प्रतीक
- स्थानीय अनुभवों के आधार पर यह माना जाता है कि जेठ की तपती दोपहर में यदि कोई व्यक्ति पीलू के फल का सेवन कर ले, तो उसे भयंकर लू के थपेड़े भी बीमार नहीं कर सकती. यही कारण है कि अब लोग इन पौधों को अपने घरों के आंगन या बगीचों में लगाने के प्रति उत्साहित रहते हैं, ताकि बिना बिजली के कुदरती ठंडक का आनंद लिया जा सके. इन पेड़ों का घर के पास होना मारवाड़ में सुख-समृद्धि और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है. यह पेड़ जलते आसमान के नीचे भी जीवन की मिठास को बरकरार रखने की अद्भुत शक्ति रखता है.




