संपादकीय

‘पेपर लीक’ का माफिया कौन?

एक बार फिर ‘पेपरलीक’ और करीब 23 लाख युवा बच्चों का भविष्य अधर में, अंधकारपूर्ण और अनिश्चित…! ‘नीट’ का पेपर लीक हुआ है। अभ्यर्थी युवाओं में कई होनहार, विशेषज्ञ डॉक्टर बन सकते थे! जिंदगियां बचा सकते थे! घर-परिवार की आर्थिक स्थितियां बेहतर कर सकते थे! मां-बाप के कर्ज चुकता कर सकते थे! लेकिन एक माफिया, संगठित गिरोह, पैसे के हवसी, संवेदनहीन साजिशकार इस देश में सक्रिय हैं, जो युवा पीढ़ी को बार-बार निराश, हताश कर रहे हैं। उनकी उम्मीदें छीन रहे हैं। विडंबना यह है कि बीते सालों में 70 बार या अधिक पेपरलीक कराए गए हैं, कुछ ‘काली भेड़ें’ जेल में हो सकती हैं, लेकिन सरगना बेखौफ, बेलगाम षड्यंत्र रच रहे हैं। आज तक न तो सीबीआई और न ही सरकारों की अन्य एजेंसियां इस नापाक नेटवर्क के ‘माफिया’ को तय नहीं कर पाई हैं। बेशक सीबीआई देश की प्रमुख जांच एजेंसी है। कानून में सजा कितनी है-3, 4, 5 अथवा 10 साल तक। किसको सजा दी गई? किस पर 1 करोड़ रुपए का जुर्माना ठोंका गया? किस पर स्थायी पाबंदी लगाई गई? इन सवालों के जवाब तो केंद्रीय शिक्षा मंत्री को देने चाहिए। हकीकत यह है कि यह शर्मनाक, देशद्रोही धंधा आज हजारों करोड़ रुपए का बताया जा रहा है। क्या इन साजिशकारों के घरों में युवा बच्चे नहीं हैं? वे भी डॉक्टर, इंजीनियर बनना चाहते होंगे! शायद उनके साथ ऐसे हादसे नहीं हुए या उनके बच्चे भी पेपरलीक के जरिए पास हो गए होंगे! पेपरलीक का धंधा तो शाश्वत लगता है हमें! भारत जैसे विराट, सम्मानित और विश्व-गुरु की खुशफहमी पाले देश के लिए ये करतूतें, हरकतें, युवा पीढ़ी के सपनों को चकनाचूर करने वाली ‘माफियागीरी’ शर्मनाक ही नहीं, बल्कि इसका दमन भी आतंकवाद, नक्सलवाद की तरह किया जाना चाहिए। दरअसल मौजूदा शिक्षा मंत्री नालायक हैं, शिक्षा मंत्रालय नकारा, भ्रष्ट है और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) बार-बार साबित हो रही है कि वह पारदर्शी, ईमानदार, लीक-मुक्त परीक्षाएं कराने के लायक ही नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी बेहद जागरूक और पारदर्शी नेता हैं, ऐसे निकम्मेपन के खिलाफ माने जाते रहे हैं, लिहाजा मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह बदलें। अंतत: युवा पीढ़ी और जनता को सडक़ों पर बिछ कर जन-आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा।

यह सिर्फ 23 लाख बच्चों के भविष्य का ही नहीं, बल्कि 23 लाख परिवारों के भविष्य पर आघात किया गया है। अधिकांश बच्चे गरीब या निम्न मध्यवर्गीय होते हैं। जिन बच्चों के लिए 10-28 लाख रुपए में लीक वाले प्रश्नपत्र खरीदे जाते हैं, उस जमात को छोड़ दीजिए। दरअसल वे ही पेपरलीक के धंधे के थोक-ग्राहक हैं, लिहाजा इस शर्मनाक धंधे के सह-भागीदार हैं। हमने चार दशक से अधिक की पत्रकारिता के दौरान पेपर और भ्रष्टाचार के मामले देखे हैं, कवर किए हैं। नकदी के बंडलों के लेन-देन देखे हैं। उनमें कुलपति, रजिस्ट्रार से लेकर प्रिंटिंग प्रेस तक की ‘मिलीभगत’ भी देखी है, लिहाजा पेपरलीक के दौर में प्रिंटिंग प्रेस और उसके दल्लों की धंधेबाजी और नतीजतन पेपरलीक कमोबेश हमें नहीं चौंकाता। अब इस नेटवर्क को तोडऩे और मसलने का वक्त आ गया है। अब प्रधानमंत्री मोदी और उनकी कैबिनेट के खास, समझदार मंत्रियों को विमर्श कर यह तय करना पड़ेगा कि परीक्षा का तरीका क्या होना चाहिए? ऑफलाइन परीक्षा क्यों जरूरी है? डिजिटल के दौर में कई परीक्षाएं ऑनलाइन आयोजित की जा रही हैं। अब ‘नीट’ का पेपरलीक हुआ है, तो 400-500 करोड़ रुपए पर पानी फिर गया। यह करदाता का पैसा था। बताया जा रहा है कि एक गैस पेपर बीते 15-30 दिनों से घूम रहा था। वह 150 पन्नों का था, जिसमें 410 प्रश्न संकलित किए गए थे। उनमें 120-140 सवाल हूबहू परीक्षा में पूछे गए। बॉयलोजी के तो 90 प्रश्न और रसायन विज्ञान के 45 प्रश्न परीक्षा में आ गए, मानो गैस पेपर की ‘फोटोप्रति’ की गई हो! सीबीआई जांच करेगी कि यह कैसे और क्यों हो सकता है? अनुमानित पेपर के नाम पर पुस्तिकाएं बाजार में बिकती रही हैं, लेकिन इतना मिलान, हूबहू होना सवालिया और संदेहजनक है। परीक्षा रद्द करना कोई समाधान नहीं है।

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