बंगाल और असम की जीत के अर्थ

पिछले पांच दशकों में असम के अनेक जिलों में इन बांग्लादेशी अवैध मुसलमानों के चलते हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं। बंगाल के बांग्लादेश की सीमा से लगते जिलों में तो मुसलमानों की आबादी 79 फीसदी तक हो गई है। असम और पश्चिमी बंगाल में कांग्रेस और सीपीएम वोटों के लालच में उन्हें भारतीय दस्तावेज मुहैया करवाती हैं। ममता बनर्जी के शासन में यह गति और तेज हो गई। अमरीका की मदद से बांग्लादेश की सत्ता कुछ साल मोहम्मद यूनुस के हवाले कर दी…
पश्चिमी बंगाल विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की सुनामी जीत हुई है, अब अपने आप में यह कोई खबर नहीं है। इस चुनाव और इसके परिणाम को बूझने के लिए तात्कालिक विश्लेषण भी हो रहे हैं और ऐतिहासिक विश्लेषण भी। भाजपा की जीत के तात्कालिक कारण और उसके परिणाम क्या हैं, इसकी चर्चा सब जगह हो रही है। इसलिए यहां उस पर माथापच्ची करने की शायद जरूरत नहीं है। हम यहां केवल ऐतिहासिक संदर्भ में इसका विश्लेषण करेंगे। इसके लिए हमें बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में जाना होगा। 1905 में ब्रिटेन ने बंगाल का विभाजन किया था। इस विभाजन में बंगाल और असम को एक भोगौलिक ईकाई मान कर उसके दो हिस्से किए थे। एक हिस्सा पश्चिमी बंगाल जो मोटे तौर पर आज का पश्चिमी बंगाल ही था और दूसरा हिस्सा पूर्वी बंगाल जिसमें मोटे तौर पर आज का बांग्लादेश और असम की ब्रह्मपुत्र घाटी, सुरमा घाटी के सिलहट और कछार क्षेत्र, मेघालय, त्रिपुरा, नागा व मिजोरम क्षेत्र शामिल था। आज के बांग्लादेश और असम का नाम पूर्वी बंगाल रखा गया था। पूर्वी बंगाल की राजधानी ढाका बनाई गई थी। यह कहने की जरूरत नहीं है कि इस तथाकथित पूर्वी बंगाल में उन लोगों का बहुमत था जिनके पूर्वज सदियों पहले एटीएम (अरब-तुर्क-मुगल) शासन काल में अपनी सनातन परंपराएं त्याग कर विदेशी शासकों के मजहब इस्लाम में ही दीक्षित हो गए थे। अब वे भारत के देसी मुसलमान थे। लार्ड कर्जन इसे मुस्लिम प्रदेश ही कहते थे।
उन्होंने एटीएम के मुस्लिम जमींदारों को समझा दिया था कि मुगल सत्ता खत्म होने के बाद नई राजनीतिक व्यवस्था में उनका अपना एक प्रदेश बन जाएगा। लेकिन अलग मजहब के बावजूद सम्पूर्ण बंगाल में इस विभाजन का सभी ने इतना विरोध किया कि ब्रिटेन को 1911 में इस विभाजन को रद्द करना पड़ा। बंगाल और असम पुन: अपने पुराने स्वरूप में स्थापित हुए। लेकिन क्या ब्रिटिश सरकार ने अपनी विभाजन की योजना त्याग दी? शायद नहीं। अलबत्ता उसे इतना समझ आ गया कि देसी मुसलमानों ने अभी अपने पुरखों से स्वयं को आंतरिक रूप से छोड़ा नहीं है। दूसरा उन्होंने अभी एटीएम मूल के मुसलमानों को सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन में अपना मार्गदर्शक नहीं स्वीकारा है। ये दोनों कारक विभाजन की ब्रिटिश रणनीति के रास्ते के मुख्य अवरोधक थे। इनको किसी तरह रास्ते से हटाना था। इसके लिए उन्होंने बंग-भंग के तुरंत बाद 1905 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना कर दी और विभाजन को समाप्त कर दिया। इससे बंगाल के इतिहास का एक अध्याय तो समाप्त हुआ लेकिन दूसरा शुरू हो गया। बंगाल में 1937 से 1942 तक (6 साल) कृषक प्रजा पार्टी के अबुल कासिम फजलुल्लाह हक और 1943 से 1947 (लगभग चार साल) तक मुस्लिम लीग के ख्वाजा निजामुद्दीन और हुसैन शहीद सुहराबर्दी प्रधानमंत्री रहे। फजलुल्लाह हक और उसकी पार्टी की मोटे तौर पर किसी से तुलना करनी हो तो पंजाब में दीनबंधु छोटू राम की यूनियनिस्ट पार्टी से की जा सकती है। पंजाब में मुस्लिम लीग के खिलाफ यूनियनिस्ट पार्टी की स्थापना सिकन्दर हयात खान, खजिर हयात टिवाना जैसे देसी मुसलमानों ने सर छोटू राम के साथ मिलकर की थी। यूनियनिस्ट पार्टी ने मुस्लिम लीग के खिलाफ मजहब से निरपेक्ष रहकर सभी किसानों का संगठन किया और चुनाव में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों को परास्त किया। यह पार्टी विभाजन के खिलाफ थी। इस पार्टी ने पंजाब में मुस्लिम लीग के प्रभाव को बहुत देर तक रोके रखा था। मुस्लिम लीग के पीछे एटीएम मुसलमान थे। असम में 1937 से 1947 तक के दस साल में से सात साल मुस्लिम लीग के मोहम्मद सादुल्लाह प्रधानमंत्री रहे। सादुल्लाह मुस्लिम लीग के थे।
उन्होंने सात साल असम में ग्रोव मोर फूड अभियान की छाया में ग्रोव मोर मुस्लिम चलाया। इसके तहत बंगाल से मुसलमानों को लाकर असम में बसाया गया। 1946 तक आते आते असम में बहुत से जिले खासकर सिलहट मुस्लिम बहुल हो गए। 1947 में विश्व युद्ध के चलते ब्रिटेन के लिए यहां रहना मुश्किल हो गया। जाने से पहले वे बंगाल के पुराने काम को निपटा लेना चाहते थे। उनकी मंशा पूरा बंगाल और असम पाकिस्तान के हवाले करना था। उधर कांग्रेस को सत्ता पा लेने की जल्दी थी। मुस्लिम लीग कांग्रेस की इस कमजोरी को समझ गई थी। 1947 में असम में मुख्यमंत्री मुस्लिम लीग के ही थे। ब्रिटेन की योजना असम पाकिस्तान को देने की थी। कांग्रेस इससे निरपेक्ष थी। तब असम के कांग्रेसी नेता गोपीनाथ बरदोलाइ के प्रयास से असम पाकिस्तान जाने से बच गया। बंगाल में मुख्यमंत्री मुस्लिम लीग के सुहारबर्दी थे। उनकी सरकार ने बंगाल से हिंदुओं को निकालने के लिए डायरेक्ट एक्शन चलाया जिसमें सरकारी सहायता से कुछ दिनों में ही हजारों हिंदू मारे गए। अलबत्ता जब विभाजन की बात चली तो मुस्लिम लीग पूरा बंगाल पाकिस्तान में लाने के लिए कटिबद्ध थी। मुस्लिम के कुछ लोगों ने बंगला अस्मिता के नाम पर बंगाल को अलग देश बना दिए जाने का राग अलापना शुरू कर दिया। ताज्जुब तो तब हुआ जब कांग्रेस का एक धड़ा भी इस राग में शामिल हो गया। योजना यही थी कि अलग बंगाल बन जाएगा तो कुछ अरसे बाद मजहब के नाम पर पाकिस्तान में शामिल हो जाएगा। यह श्रेय डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जाता है कि उन्होंने कहा कि बंगाल को जनसंख्या के लिहाज से विभाजित किया जाना चाहिए। इसी कारण बंगाल का पश्चिमी भाग भारत में रह गया। लेकिन क्या इस विभाजन के बाद एटीएम ने अपनी योजना त्याग दी? इसका उत्तर न में है। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद इस योजना को पुन: चालू किया गया। एटीएम को पूर्वी बंगाल का पाकिस्तान के कब्जे से निकल जाना पच नहीं रहा था। 1971 में पुरानी योजना नए रूप में चालू हुई। बांग्लादेशी मुसलमानों को अवैध रूप से पश्चिमी बंगाल और असम में भेजा जाने लगा। यह काम जमायते इस्लामी के एजेंट करते थे।
यह संगठन सरहद के दोनों ओर है। पिछले पांच दशकों में असम के अनेक जिलों में इन बांग्लादेशी अवैध मुसलमानों के चलते हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं। बंगाल के बांग्लादेश की सीमा से लगते जिलों में तो मुसलमानों की आबादी 79 फीसदी तक हो गई है। असम और पश्चिमी बंगाल में कांग्रेस और सीपीएम वोटों के लालच में उन्हें भारतीय दस्तावेज मुहैया करवाती हैं। ममता बनर्जी के शासन में यह गति और तेज हो गई। अमरीका की मदद से बांग्लादेश की सत्ता कुछ साल मोहम्मद युनूस के हवाले कर दी। उसने परोक्ष रूप से सत्ता जमायते इस्लामी को दे रखी थी। वहां हिंदुओं को या तो मारा जाने लगा या फिर मतांतरित किया जाने लगा। अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की बाढ़ सी आ गई। इधर ममता की सरकार ममता से उनको संभालने का काम करती रही। नारे लगने लगे कि असम और पश्चिमी बंगाल अब बांग्लादेश के साथ मिल कर ग्रेटर बंगाल बनाएंगे और यह ग्रेटर बंगाल एक नया इस्लामी देश बनेगा। लेकिन असम और बंगाल के चुनाव परिणामों ने इस अश्वमेध को रास्ते में रोक लिया। रोकने वाले लव और कुश शुभेंदु अधिकारी और हेमंत विश्व शर्मा हैं। जय मां काली। जय मां कामाख्या देवी।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री




