घुसपैठ का निदान जरूरी…

घुसपैठ वाले इलाकों में सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव बनता जा रहा है। इन घुसपैठियों ने अवैध रूप से आधार कार्ड और राशन कार्ड तक बना लिए हैं। इससे ज्यादा प्रवासी आबादी वाले इलाकों में स्वास्थ्य, शिक्षा, साफ-सफाई और रियायती भोजन व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है…
हाल ही में भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा स्पेशल इंटेंसिव रिलिजन (एसआईआर) की एक प्रक्रिया शुरू की गई, जिसके अंतर्गत अभी तक कई राज्यों में चुनाव से पूर्व इस प्रक्रिया के माध्यम से किसी विदेशी के मतदाता सूची में गलती से शामिल होने, मृत वोटरों के मतदाता सूची से नाम न हटने, किसी वोटर के एक स्थान से ज्यादा स्थानों पर मतदाता सूची में शामिल होने और बार-बार पलायन के कारण मतदाता सूची की कमियों को दुरुस्त करने का काम किया जा रहा है। स्वाभाविक तौर पर विदेशियों के नाम मतदाता सूची में होने की स्थिति में, एसआईआर प्रक्रिया के कारण उनके नाम स्वयंमेव कट जाते हैं, क्योंकि वे अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं कर पाते। गौरतलब है कि एसआईआर प्रक्रिया के माध्यम से उत्तर प्रदेश से 2.9 करोड़, पश्चिम बंगाल से 91 लाख, तमिलनाडु से लगभग 1 करोड़, गुजरात से 68.78 लाख, राजस्थान से 1.7 करोड़, मध्य प्रदेश से 1.7 करोड़, केरल से 1.7 करोड़, छत्तीसगढ़ से 1.7 करोड़, गोवा से 1.7 करोड़ वोट मतदाता सूची से हटाए गए हैं। कुल मिलाकर 12 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में 6.5 करोड़ लोगों को मतदाता सूची से हटाने की सिफारिश हुई और अंत में आपत्तियों के बाद 12 राज्यों और 3 केन्द्रशासित प्रदेशों में कुल मिलाकर 5.2 करोड़ वोटरों को मतदाता सूची से हटाया गया है।
हालांकि विपक्षी दलों द्वारा एसआईआर प्रक्रिया की पुरजोर खिलाफत हुई, लेकिन अंततोगत्वा सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर प्रक्रिया को संवैधानिक ठहराते हुए विपक्ष की आपत्तियों को खारिज कर दिया है। यानी एसआईआर प्रक्रिया पर अब न्यायालय की भी मुहर लग गई है। यह बात सही है कि इस प्रक्रिया के अंतर्गत मतदाता सूची से नाम हटने के कई अन्य कारण हैं, लेकिन विदेशी घुसपैठियों को भी इस प्रक्रिया के अंतर्गत मतदाता सूची से बाहर करने का काम किया गया। एसआईआर के माध्यम से हालांकि बड़ी संख्या में विदेशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची से हटाने का काम तो हुआ है, लेकिन विदेशी घुसपैठियों को देश से बाहर करने का महत्वपूर्ण कार्य अभी बाकी है। पिछले लंबे समय से भारत के विभिन्न भागों में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। दुनिया में कहीं भी अवैध विदेशी घुसपैठ को अनुमति नहीं है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया जाता रहा है। गौरतलब है कि अमरीका और यूरोप जैसे विकसित देश अवैध घुसपैठ के खिलाफ न केवल कड़े कानून बना रहे हैं, बल्कि अवैध घुसपैठ से सख्ती से निपटने का प्रयास भी कर रहे हैं। गौरतलब है कि सामान्यत: बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ में एक विशेष वर्ग का बहुतायत है, इसलिए इस मुद्दे पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भी लगातार राजनीति होती रही है। यह घुसपैठ उन राज्यों में ज्यादा पनपती है, जहां सत्ताधारी पार्टी इस घुसपैठ को वोट बैंक राजनीति के रूप में इस्तेमाल करती है। हाल ही में भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने अवैध घुसपैठ के मामले और जनसांख्यिकी बदलाव (डेमोग्राफिक चेंज) पर उच्च स्तरीय समिति का गठन किया। इसके पीछे की पृष्ठभूमि यह मानी जा रही है कि बांग्लादेश के साथ सांझी सीमा होने और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों को प्रश्रय देने के कारण पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या ने विकराल रूप धारण किया हुआ है।
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का शासन स्थापित होने के तुरंत बाद इस समिति के गठन के बाद यह स्पष्ट है कि अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ अब सरकार सख्त रुख अपनाने वाली है। विपक्षी दल, जब वे सत्ता में थे, तब भी वे इस समस्या का जिक्र तो करते थे, लेकिन समाधान के नाम पर उन्होंने कोई प्रकट प्रयास नहीं किया। वर्तमान सरकार के प्रयासों से वे कभी सहमत नहीं हुए, और आज भी इस मुद्दे के बारे में सरकार के साथ एक राय नहीं रखते। इस मुद्दे को राजनीति के चश्में से न देखकर, देश और समाज के हित के साथ जोडक़र देखने की जरूरत है। हालांकि बांग्लादेशी घुसपैठ की संख्या का कोई निश्चित आधिकारिक अनुमान नहीं है, वर्ष 2004 में यूपीए सरकार ने संसद में यह कहा था कि देश में 1.2 करोड़ बांग्लादेशी अवैध रूप से रह रहे हैं, लेकिन उसके बाद आनन-फानन में इससे पल्ला झाड़ते हुए सरकार ने यह बयान दिया कि यह सुनी-सुनाई और कुछ संबंधित पक्षों की बताई हुई संख्या है। लेकिन 2016 में एनडीए सरकार के मंत्री किरण रिजिजु ने बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या 2 करोड़ बताई, जो 2004 में यूपीए सरकार द्वारा बताई गई संख्या से 70 प्रतिशत ज्यादा थी। लेकिन 2017 में सरकार ने कहा कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या की पुख्ता जानकारी संभव नहीं है।
बांग्लादेशी घुसपैठ का समाधान है जरूरी : समझना होगा कि विदेशी घुसपैठ के मुद्दे के कई पहलू हैं। यह विषय मात्र जनसंख्या परिवर्तन का ही नहीं है। इसके कई दूरगामाी आयाम हैं, जिन्हें समझने की जरूरत है। बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और कानून-व्यवस्था से जुड़े प्रभावों से देश आज जूझ रहा है। हालांकि इसके प्रभाव पूरे देश में एक जैसे नहीं हैं। सीमावर्ती और सघन शहरी इलाकों जैसे असम, पश्चिम बंगाल और दिल्ली व मुंबई में अवैध घुसपैठ का परिणाम ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे रहा है। यदि घुसपैठ के आर्थिक परिणामों की बात करें, तो सबसे पहले तो घुसपैठ भारत के नागरिकों के रोजगार पर प्रहार करती है। भारत पहले से ही एक विशाल जनसंख्या और युवा आबादी वाला देश है। देश के लोगों, खासतौर पर युवाओं को रोजगार मिलने में कठिनाई हो रही है, लेकिन ऐसे में जब बांग्लादेशी घुसपैठिए रोजगार पाने की कवायद में सस्ती से सस्ती मजदूरी पर काम करने के लिए तैयार रहते हैं, ऐसे में भारतीय मजदूर रोजगार से बाहर हो जाते हैं। घरेलू काम हो अथवा औद्योगिक रोजगार, सभी में बांग्लादेशी घुसपैठिए भारत के नागरिकों को रोजगार से बाहर कर रहे हैं। यही नहीं भारत में रोजगार में असंगठित क्षेत्र जिसमें छोटे दुकानदार, रेहड़ी पटरी, खोमचा, कबाड़, निर्माण और बाजारों और मंडियों में भारी मात्रा में रोजगार सृजन होता है। इन सभी स्थानों पर बांग्लादेशी घुसपैठिए रोजगार पर कब्जा कर रहे हैं और कई बार तो पूरा सिंडिकेट बनाकर वे काम करते हैं। छोटे दुकानदार और व्यापारियों को इससे भारी नुकसान हो रहा है। यही नहीं चूंकि बांग्लादेशी घुसपैठिए असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जिससे सरकार को कोई राजस्व नहीं मिलता। इसके साथ ही वे भारत से पैसा कमाकर अवैध तरीके से बांग्लादेश में भी भेजते हैं, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है।
इसके अलावा भारत सरकार देश के गरीब नागरिकों के लिए जो कल्याणकारी योजनाएं चलाती है, जिसके तहत मुफ्त रशन, बिजली, पानी और वित्तीय समावेशन (जैसे बैंक खाते) जैसी सुविधाएं दी जाती हैं, फर्जी दस्तावेजों के दम पर ये घुसपैठिए इन योजनाओं का अनुचित लाभ उठा रहे हैं, जिससे देश के खजाने को हर साल करोड़ों का नुकसान हो रहा है। यही नहीं घुसपैठ वाले इलाकों में सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव बनता जा रहा है। इन घुसपैठियों ने अवैध रूप से आधार कार्ड और राशन कार्ड तक बना लिए हैं। इससे ज्यादा प्रवासी आबादी वाले इलाकों में स्वास्थ्य, शिक्षा, साफ-सफाई और रियायती भोजन व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। घुसपैठ के कारण योजना विहीन शहरीकरण, आवास और बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ाता है। नकली आधार, राशन कार्ड और वोटरकार्ड के मामले शासन-प्रशासन और आंतरिक सुरक्षा के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। घुसपैठ को रोकना जरूरी है।-डा. अश्वनी महाजन




