संपादकीय

डाक्टर : भगवान या दुकानदार

एक जुलाई को ‘डॉक्टर दिवस’ था। ये दिवस कौन तय करता है अथवा यह भी धंधे की एक रणनीति है, हम नहीं जानते, लेकिन भारत में आम धारणा है कि डॉक्टर ‘भगवान का ही रूप’ है। भगवान तो अतिशयोक्ति है, हम ‘जीवनदाता’ तो मान सकते हैं। जब इनसान की आखिरी सांस भी उखडऩे लगती है और सामने मौत की छाया महसूस होने लगती है, तब एक डॉक्टर का जज्बा और जिद उस जिंदगी को बचाते हैं। जिस महिला की कोख नौ बार उजड़ चुकी हो, उस गरीब और असहाय महिला का इलाज डॉक्टर ने अपने संसाधनों के बूते किया और उस महिला के आंगन में बेटी की किलकारियां गूंजीं। एक शिशु जन्म के बाद रोया नहीं और निमोनिया का भी शिकार हो गया। उसकी सांस और आहार नलियों में भी विसंगतियां थीं। सांस धौंकनी की तरह चलने लगती थी। एक डॉक्टर ने ही ऑपरेशन किए और आज ऐसे बच्चे ‘युवा’ हो चुके हैं। नई जिंदगी देने के ऐसे असंख्य उदाहरण हैं। बेशक डॉक्टर की पढ़ाई और प्रशिक्षण ऐसे हैं कि वे ‘जीवनदाता’ साबित होते रहे हैं, लेकिन यह भी कल्पना करें कि जिन जिंदगियों को अस्पताल में उपचार नहीं मिला और न ही ऐसा ‘जीवनदाता’ मिल पाया, उनके लिए तो मौत एक भयानक यथार्थ है। ‘रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया’ ने बीती 10 मई को एक ‘सैंपल रजिस्टे्रशन सिस्टम’ (एसआरएस) के जरिए सर्वेक्षण कराया था। उसके स्वास्थ्य और जनसंख्या संबंधित निष्कर्ष और आंकड़े बेहद डरावने हैं। हालांकि यह सर्वेक्षण 2024 के आंकड़ों पर आधारित था, फिर भी उसके निष्कर्ष भयावह हैं। डॉक्टरी या अस्पताल की सहायता नहीं मिल पाने के कारण मौतों का डाटा दोगुना से अधिक हो गया है। 2020 तक ऐसी मौतों का अनुपात 18 फीसदी था, लेकिन 2024 में यह आंकड़ा बढ़ कर 45.05 फीसदी हो गया है। बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 60 फीसदी को भी पार कर चुका था। केरल में यह आंकड़ा 26.08 फीसदी था, जो पुराने राष्ट्रीय औसत 18 फीसदी से भी अधिक है। यह कैसा देश है? ये मौतें इलाज के बिना हो रही हैं, जो बेहद त्रासद है।

यह स्थिति तब है, जब मोदी सरकार की ‘आयुष्मान भारत’ योजना लगभग देश भर में लागू है और उसे दुनिया की सबसे बड़ी और व्यापक स्वास्थ्य बीमा योजना के तौर पर प्रचारित किया जाता रहा है। दरअसल ‘आयुष्मान भारत’ एक अद्र्धसत्य है, जिसे वे जानते होंगे, जो उस कार्ड के धारक हैं। यह कार्ड सिर्फ ऑपरेशन, शरीर की चीरा-फाड़ी, में ही प्रभावी है। यदि आप रूटीन की, पुरानी बीमारियों के संदर्भ में, किसी डॉक्टर की सलाह लेना चाहते हैं, तो आपको उसकी महंगी फीस अदा करनी पड़ेगी। दवाओं का खर्च अलग…! यहां सवाल है कि भारत में इतनी मौतें क्यों हो रही हैं? क्योंकि अस्पताल और डॉक्टर आम आदमी को उपलब्ध नहीं हैं। वे इतने महंगे, लालची, जेबकाटू और दुकानदार किस्म के हो गए हैं कि औसत गरीब इनका इलाज वहन नहीं कर सकता। अस्पताल में एक बार जाएं, तो वहां एमआरआई, सीटी स्कैन, फेफड़ों और गुर्दों के टेस्ट, दिल के टेस्ट जरूर किए जाएंगे, बेशक उनकी जरूरत हो या न हो। अस्पताल बाहर कराए हुए टेस्ट को मान्यता ही नहीं देते। भारत की व्यवस्था में डॉक्टरों को ‘मोटे वेतन’ दिए जाते हैं और उनके कोटे तय किए जाते हैं कि आप इतने मरीजों को ऑपरेट जरूर करेंगे। कई जगह तो ऐसे डॉक्टरों की तनख्वाह सरकार के कैबिनेट सचिव से भी अधिक होती है। सरकार डॉक्टर की पढ़ाई पर सबसिडी भी देती है। क्या दुकानदार बनने के लिए इतना खर्च किया जाता है? इसमें अपवाद भी हैं, जो वाकई ‘जीवनदाता’ हैं। मप्र के इंदौर में एक न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर हैं, जिनसे मुलाकात की प्रतीक्षा-सूची 3-4 माह की है। उनकी एक बार की, सप्ताह तक लागू, फीस 3500 रुपए है, जबकि औसत विशेषज्ञ डॉक्टर की फीस 1200-1500 रुपए है। राजधानी दिल्ली में भी यही औसत है। दूसरे न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर भी औसतन 1700 रुपए की फीस लेते हैं। सवाल है कि क्या न्यूरो से जुड़ी पुरानी बीमारी का मरीज और आम आदमी ऐसे महंगे डॉक्टरों का इलाज वहन कर सकता है? यदि नहीं कर सकता, तो अकाल मौत का शिकार होगा। क्या भारत के संविधान में यही मौलिक अधिकार दिए गए हैं? गरीब लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं सस्ते में उपलब्ध करवाना सरकार का दायित्व है। सरकार द्वारा संचालित कई अस्पतालों में मरीजों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। गरीब मरीज को कोई परेशानी न हो, सरकार को यह सुनिश्चित बनाना चाहिए। स्वास्थ्य के लिए बजट को भी बढ़ाया जाना चाहिए।

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