संपादकीय

और कितनी जांचें शेष

अब उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राम मंदिर चोरी-डकैती कांड की सीबीआई से भी जांच कराने पर विचार कर रहे हैं। ऐसा सूत्रों ने खुलासा किया है। जांच के दायरे में वे जमीनें भी आएंगी, जो चंपत राय बंसल और अनिल मिश्रा के सौजन्य से खरीदी गईं। जमीनें राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र के मद्देनजर खरीदी गई थीं। चंपत राय तब राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव थे और अनिल मिश्रा ने ट्रस्ट के सदस्य के तौर पर, उन सौदों में गवाह की भूमिका में, हस्ताक्षर किए थे। दोनों चेहरे आज भी ट्रस्ट में हैं। संभवत: आजीवन रहेंगे, यदि कुछ अनिष्ट नहीं हुआ। पुलिस और विशेष जांच टीम दोनों से लंबी पूछताछ कर चुकी हैं। कुछ खुलासे लीक हुए हैं, लेकिन उन्होंने चोरी कांड में संलिप्तता से साफ इंकार किया है। गुनहगार कब अपना गुनाह कबूल करता है? पूछताछ के बाद भी दोनों के खिलाफ न तो प्राथमिकी दर्ज की गई है और न ही उन्हें आरोपित करार दिया गया है। ट्रस्ट के विशेष आमंत्रित सदस्य गोपाल राव और कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि भी इसी जमात में हैं। चूंकि अब यह चोरी-डकैती कांड सियासी-चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है और विशेषज्ञ अधिकारी और वरिष्ठ अधिवक्ता लगातार सवाल कर रहे हैं कि चंपत राय, अनिल मिश्रा आदि पर प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई? ट्रस्ट ‘चोरी का माल’ लॉकर में रखने का भी दोषी है। बीती 5 जून को जो लाखों की नकदी बरामद की गई थी, उसे ‘मालिक’ (ट्रस्ट) को ही क्यों लौटा दिया गया? फिर बरामदगी के माल को 25 जून तक ट्रस्ट ने लॉकर में क्यों रखा? यह कानूनन अपराध है। और 26 जून को पुलिस को लॉकर से ही चोरी का वह माल बरामद करा दिया गया। यह कैसा खेल चल रहा है, भाई? विशेषज्ञ इसे ‘अस्थायी गबन’ करार दे रहे हैं और ट्रस्ट पर भी प्राथमिकी दर्ज करने की दलीलें दे रहे हैं। यदि उप्र सरकार सीबीआई जांच का भी निर्णय लेती है, तो कितनी जांचें जारी रहेंगी और कितनी जांचें अब भी शेष हैं! जांच तब सार्थक हो सकती है, किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंच सकती है, जब आरोपितों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई हो और जांच उसी लाइन पर काम करती हो। अब प्रथमद्रष्ट्या पुष्टि हो चुकी है कि राम मंदिर में चोरी-डकैती की जानकारी चंपत राय बंसल और उनके ट्रस्ट-साथियों को थी। बरामदगी भी चंपत राय के निर्देशन में की गई।

चंपत ने चोरी के सच को ‘उल्लेखनीय’ नहीं माना, तो जाहिर है कि परदेदारी की गई। कुछ छिपाया गया। विशेष जांच टीम को भी जानकारी नहीं दी गई। तो फिर सीबीआई जांच में कौन-सा पारदर्शी सच सामने आ सकता है? कोई माने या न माने, केंद्र और उप्र की डबल इंजन सरकारें ‘आरोपित ट्रस्टियों’ को बचा रही हैं, जांचें लीपापोती साबित हो सकती हैं, क्योंकि कुछ माह बाद उप्र में विधानसभा चुनाव हैं और भाजपा हर कीमत पर वह चुनाव जीतना चाहती है। अब विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी एक टीवी चैनल पर कहा है कि यदि चंपत राय को विहिप उपाध्यक्ष के पद से हटाने की नौबत आई, तो विचार किया जाएगा। सोच-विचार करेंगे, हटाना तय नहीं है। बेशक विशेष जांच टीम और पुलिस की कथित जांच और सवाल-जवाब में कई झोल सामने आए हैं। यह विशेषज्ञों का मानना है। दोनों की जांचें भाजपा सरकार के अधीन हैं। उन्हें ‘अघोषित निर्देश’ दिए गए होंगे! सीबीआई जांच भी पूरी तरह ‘निर्लिप्त’ नहीं होती, क्योंकि वह एजेंसी सीधे प्रधानमंत्री के तहत काम करती है। सीबीआई जांच की सजा-दर भी बहुत कम है और उस पर भी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन वह ही देश की सबसे प्रमुख विशेषज्ञ जांच एजेंसी है। राम मंदिर ट्रस्ट भी ‘सार्वजनिक’ है, निजी मंदिर का बनाया हुआ नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के आदेश पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 5 फरवरी, 2020 को राम मंदिर ट्रस्ट का गठन किया था और अधिसूचना जारी की थी। अब वही ट्रस्ट, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी के पूर्व प्रधान सचिव भी शामिल हैं, चोरी-डकैती के कलंक से दागदार हुआ है, लिहाजा आराम से हार कैसे मानी जा सकती है? सीबीआई जांच भी एक अभेद्य आड़ है, जिसके पीछे छिप कर ‘चोरी कांड’ को धुंधला होते देख सकते हैं। उधर सरकार की ओर से यह आश्वासन भी दिए जा रहे हैं कि इस धांधली में जो भी दोषी पाए जाएंगे, उन पर सख्त से सख्त कार्रवाई होगी। बुलडोजर एक्शन की भी बात हो रही है। सरकार की छवि के लिए यह अति जरूरी है।

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