पंजाब में कांग्रेस का भविष्य…

पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल यह विवाद सुलझाने आए हैं। लेकिन चरणजीत सिंह चन्नी ने उन्हें मिलने से ही इन्कार कर दिया। राजा वडिंग ने तो यहां तक कह दिया कि पार्टी के लिए मैं किसी के भी जूते सिर पर रखने को तैयार हूं। लेकिन उनकी समस्या है कि जिनके जूते वे सिर पर रखने को तैयार हैं, वे अब अपने जूते भी उनको देने के लिए तैयार नहीं हैं। भूपेश बघेल ने भी चन्नी को राहुल गान्धी का संदेश सुना दिया है। उनका कहना है कि किसी भी हालत में वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाया नहीं जाएगा। जाहिर है कांग्रेस के लिए आने वाले पांच छह महीने संकट के हैं। क्या चन्नी अपने साथियों सहित कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो जाएंगे? क्या वे अपनी अलग क्षेत्रीय पार्टी बनाएंगे? इसका उत्तर कुछ दिनों में ही मिल जाएगा। लेकिन इतना निश्चित है कि कांग्रेस एकजुट होकर चुनाव में नहीं उतरेगी। वह खंड खंड होकर या फिर खंड खंड भाव से चुनाव मैदान में उतरेगी…
पंजाब में कांग्रेस का संकट गहराता जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने लगता है पार्टी के हाईकमान से बगावत ही कर दी है। चन्नी का कहना है कि पंजाब कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष राजा वडिंग को हटा कर उन्हें अध्यक्ष बना दिया जाए। अध्यक्ष बनने की तमन्ना तो दर्जन भर के करीब दूसरे छोटे बड़े नेताओं में भी है, लेकिन फिलहाल वे चन्नी की छाया में छिपे रहने को तैयार हो गए लगते हैं। अलबत्ता राजा वडिंग को हटाने को लेकर अनेक नेताओं में सहमति है। इसको लेकर कांग्रेस पार्टी की हाईकमान (जिसे सुविधा के लिए राहुल गांधी पढ़ा जाए) ने तीन सदस्यों की कमेटी गठित कर दी थी। उस कमेटी ने कई दिन लम्बी लम्बी बैठकों का सिलसिला शुरू किया। पंजाब कांग्रेस के सभी नेताओं, जिनका पंजाब में कोई महत्व था, उनको भी और जिनका महत्व नहीं था उनको भी, दिल्ली बुलाया गया। उनको अलग अलग सुना गया। कांग्रेस हाईकमान मान कर चलती है यदि एक साथ सुना जाए तो यह हाईकमान के खिलाफ षड्यंत्र होता है। इतनी लम्बी कवायद के बाद हाईकमान ने फैसला सुना दिया कि पंजाब में संगठन में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा। वडिंग ही अध्यक्ष रहेंगे और प्रताप सिंह बाजवा ही विधानसभा में विपक्ष के नेता बने रहेंगे। इस फैसले से राजा वडिंग को छोड़ कर लगभग सभी नेता जो किसी तरह की भी अहमियत रखते हैं, नाराज हुए। लेकिन दो लोग सबसे ज्यादा नाराज हुए। एक चरणजीत सिंह चन्नी और दूसरे कभी उनके मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री रह चुके सुखजिन्दर सिंह रन्धावा। अब इसे संयोग ही कहना चाहिए कि राहुल गान्धी ने रन्धावा को राजस्थान में पार्टी का प्रभारी बनाया हुआ है और उनकी अहम ड्यूटी वहां अशोक गहलोत और सचिन पायलट के विरोधी गुटों में तालमेल बिठाना है। चरणजीत सिंह चन्नी ने अपना गुस्सा निकालने का परंपरागत तरीका चुना।
उन्होंने मोरिंडा के अपने घर में पंजाब कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं की बैठक बुला ली। राजा वडिंग को पता चलना ही था। चन्नी ने जिन नेताओं को बुलाया था, कहा जाता है वडिंग ने उन सभी को फोन कर वहां न जाने की चेतावनी दी। जो लोग वडिंग के भाषा प्रयोगों को जानते हैं, उन्होंने अंदाजा लगाया था कि चेतावनी किस प्रकार दी गई होगी। इसलिए राजा वडिंग आश्वस्त थे कि चन्नी के घर कोई नहीं जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिनको चन्नी ने बुलाया था वे तो गए ही, जिनको नहीं बुलाया था वे भी चले गए। सुखजिन्दर सिंह रन्धावा वहां नहीं थे। कुछ लोग कहते हैं उनका मन वहीं भटक रहा था। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में ही संकेत दिया कि वहां जाने-न जाने का प्रश्न नहीं है, हम सब मिल कर पार्टी को मजबूत कर रहे हैं। पार्टी को मजबूत करने की यह ‘चन्नी शैली’ कांग्रेस में नया चलन नहीं है। इससे पहले भी यह प्रयोग किया जा चुका है। तब पंजाब में कांग्रेस सरकार थी और महाराजा अमरेन्द्र सिंह मुख्यमंत्री थे और सुनील जाखड़ पार्टी अध्यक्ष थे। राहुल गान्धी ने सुनील जाखड़ को हटा कर नवजोत सिंह सिद्धु को पार्टी अध्यक्ष बना दिया था। नवजोत सिंह सिद्धु ने अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री को हटाने का अभियान छेड़ दिया था। उसका कहना था कि इससे पार्टी और भी मजबूत होगी। तब राहुल गान्धी ने प्रदेश कांग्रेस के सभी नेताओं, जिनकी अहमियत थी, उनको और जिनकी अहमियत नहीं थी उनकी भी, सलाह ली। कहा जाता है पार्टी के अधिकांश नेताओं जिनकी अहमियत थी, की यह सलाह थी कि सुनील जाखड़ को मुख्यमंत्री बनाया जाए। उस समय कांग्रेस की परंपरा को याद करते हुए एक ऐसी औरत की सलाह सार्वजनिक की गई जिसकी अहमियत उस समय पंजाब की राजनीति में बिल्कुल ही नहीं थी। उसकी सलाह थी कि पंजाब में किसी हिंदू को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता। यह औरत अम्बिका सोनी थी। नई पीढ़ी के बहुत से कांग्रेसियों ने शायद उसका नाम भी नहीं सुना था। राहुल गान्धी ने अम्बिका सोनी की सलाह का सम्मान करते हुए चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया। कहा जाता है निर्णय इतना अचानक था कि चन्नी को भी तभी विश्वास हुआ कि उनको राहुल गान्धी ने मुख्यमंत्री बना दिया है जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। वैसे सुखजिन्दर सिंह रन्धावा घर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने निकल चुके थे, लेकिन जब वे राजभवन पहुंचे तो उन्हें पता चला कि राहुल गान्धी ने किसी दूसरे से सलाह ले ली है। उन्हें उप मुख्यमंत्री की शपथ से संतोष करना पड़ा। अलबत्ता राहुल गान्धी के इस सारे श्रम का एक ही परिणाम निकला। पंजाब में कांग्रेस की सरकार समाप्त हो गई। आम आदमी पार्टी की सरकार बन गई। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह और सुनील जाखड़ दोनों भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। लगता है समय का चक्र एक बार फिर पूरा हो गया है। पंजाब विधानसभा के चुनाव को मात्र छह सात महीने रह गए हैं।
कांग्रेस में एक बार फिर 2021-22 की पुरानी कवायद शुरू हो गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को हटाने की मांग है। तब राहुल गान्धी ने प्रदेश अध्यक्ष को हटा दिया था और उसी क्षण कांग्रेस सरकार के पतन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। इस बार राहुल गान्धी ने प्रदेश अध्यक्ष को हटाने से इन्कार कर दिया है। पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल यह विवाद सुलझाने आए हैं। लेकिन चरणजीत सिंह चन्नी ने उन्हें मिलने से ही इन्कार कर दिया। राजा वडिंग ने तो यहां तक कह दिया कि पार्टी के लिए मैं किसी के भी जूते सिर पर रखने को तैयार हूं। लेकिन उनकी समस्या है कि जिनके जूते वे सिर पर रखने को तैयार हैं, वे अब अपने जूते भी उनको देने के लिए तैयार नहीं हैं। भूपेश बघेल ने भी चन्नी को राहुल गान्धी का संदेश सुना दिया है। उनका कहना है कि किसी भी हालत में वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाया नहीं जाएगा। जाहिर है कांग्रेस के लिए आने वाले पांच छह महीने संकट के हैं। क्या चन्नी अपने साथियों सहित कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो जाएंगे? क्या वे अपनी अलग क्षेत्रीय पार्टी बनाएंगे? इसका उत्तर कुछ दिनों में ही मिल जाएगा। लेकिन इतना निश्चित है कि कांग्रेस एकजुट होकर चुनाव में नहीं उतरेगी। वह खंड खंड होकर या फिर खंड खंड भाव से चुनाव मैदान में उतरेगी। इस तरह कांग्रेस के सामने फिर से संकट की स्थिति है।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री




