मोदी को मिले पुरस्कारों पर गार्जियन की हताशा

जिला स्तर, वार्ड स्तर, राज्य स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर सरकारी और निजी क्षेत्र में पुरस्कार के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, इन्हें पाने के लिए लोग अपनी पूरी उम्र खपा देते हैं। उसमें भी जबरदस्त प्रतिस्पर्धा होती है, तब कहीं जाकर किसी एक का चयन किया जाता है। ऐसे में देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले पुरस्कार का मापदंड कितना कठोर होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। इन पुरस्कारों में पुरस्कार देने वाली सरकार के साथ उन देशों के करोड़ों लोगों की भावनाएं भी जुड़ी होती हैं…
दि गार्जियन अखबार ने मोदी और भारत की छवि धूमिल करने के लिए अंग्रेजी में एक लेख लिखा, जिसका सारांश यह है कि कोई झूठे भी पुरस्कार देने के लिए बुलाए तो प्रधानमंत्री मोदी दौड़े दौड़े चले जाते हैं। मतलब यह अखबार कहना चाह रहा है कि मोदी पुरस्कार के भूखे हैं, साथ ही यह भी जताने की कोशिश कर रहा है, जिन देशों ने मोदी को उनकी विदेश यात्रा के दौरान पुरस्कार दिए, उनकी कोई प्रतिष्ठा नहीं है। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी को इन देशों ने फिजूल में पुरस्कार दिए हैं। गार्जियन ने यह लेख लिख कर मोदी सहित भारत का तो अपमान किया ही है, साथ ही मोदी को पुरस्कार देने वाले उन देशों के नागरिकों, पुरस्कारों और उन देशों के राष्ट्रप्रमुखों का भी अपमान किया है। इस लेख की भड़ास के बावजूद पीएम मोदी को पुरस्कारों का सिलसिला थम नहीं रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इंडोनेशिया के सर्वोच्च सम्मान ‘बिंतांग आदिपूर्णा ऑफ द रिपब्लिक ऑफ इंडोनेशिया’ मेडल ऑफ ऑनर से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पीएम मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने प्रदान किया। वर्ष 2016 से अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एशिया, यूरोप, अफ्रीका और अमरीका के देशों से ऐसे 34 सम्मान मिल चुके हैं। यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री को मिले सम्मानों में सबसे अधिक हैं। इनमें से कुछ सम्मान सदियों पुराने हैं, जबकि कुछ सम्मान संबंधित देशों की सम्मान प्रणाली में हाल ही में शामिल किए गए हैं। गार्जियन का यह लेख भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने का कुत्सित प्रयास है।
विश्व का बड़ा और प्रभावशाली शायद ही कोई देश बचा होगा, जिसके प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ने मोदी और भारत की तारीफ नहीं की होगी। दरअसल यह तारीफ पाश्चात्य मीडिया पचा नहीं पा रहा है। पचा इसलिए भी नहीं पा रहा है कि भारत न सिर्फ घरेलू स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तरक्की के झंडे गाड़ रहा है। चंद्रयान और मंगलयान मिशन की कामयाबी इसके बड़े उदाहरण हैं, जो विकसित देश भी हासिल नहीं कर सके। यह अखबार यह भी भूल गया कि जब कोरोना काल में पूरी दुनिया में हाहाकार मचा हुआ था, तब भारत ने ही कोरोना वैक्सीन दर्जनों देशों को निशुल्क भेज कर करोड़ों लोगों की जानें बचाने का काम किया था। क्या ऐसे परोपकारी कार्यों के लिए उन्हें विदेशी पुरस्कार नहीं दिया जा सकता। गार्जियन ने इसका जिक्र कभी नहीं किया कि विश्व को मोदी नेतृत्व में भारत ने क्या-क्या दिया है। भारत की यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस जैसी सस्ती और सुलभ डिजिटल पेमेंट प्रणाली को नेपाल, भूटान, सिंगापुर, यूएई और मॉरीशस ने अपना लिया है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की बात करें तो भारत की प्राचीन धरोहर योग को मोदी सरकार के प्रयासों से वैश्विक मान्यता मिली। संयुक्त राष्ट्र द्वारा हर वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाता है। मोदी सरकार के प्रयासों से ही अफ्रीकी संघ को जी-20 का स्थायी सदस्य बनाया गया। भारत प्राकृतिक आपदा के दौरान विश्व के देशों के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ा रहा है। तुर्किये और सीरिया में आए भूकंप के दौरान मिशन सागर और ऑपरेशन दोस्त के जरिए विश्व स्तर पर मानवीय सहायता पहुंचाई गई। वेनेजुएला में विनाशकारी भूकंप के बाद ऑपरेशन अमिस्ताद के तहत बचाव दल और पोर्टेबल अस्पताल भेजे गए। म्यांमार में ऑपरेशन ब्रह्मा (2025) और ऑपरेशन सहायता (2008) के तहत भूकंप व चक्रवात के दौरान भारी राहत सामग्री व चिकित्सा सुविधाएं दी गईं। श्रीलंका में सुनामी (2004) में ऑपरेशन रेनबो और चक्रवात (2025) में ऑपरेशन सागर बंधु के माध्यम से सहायता प्रदान की गई। भारतीय नौसेना ने हालिया समुद्री सुरक्षा अभियानों (मुख्य रूप से अरब सागर और अदन की खाड़ी) में 520 से अधिक लोगों की जान बचाई है और ईरान, लाइबेरिया, माल्टा और सेंट विंसेंट एंड द ग्रेनाडाइन्स जैसे विभिन्न देशों के झंडे वाले जहाजों को समुद्री लुटेरों से सुरक्षित मुक्त कराया है।
इन अभियानों की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि नौसेना ने बिना किसी राष्ट्रीय भेदभाव के, पाकिस्तानी और ईरानी नागरिकों सहित कई देशों के नाविकों को भी बचाया है। गार्जियन खासकर विदेशी मीडिया को कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन पर भारी परेशानी है। भारत में उन्हें यह उल्लंघन नजर आता है। अंग्रेजों ने भारत पर 200 साल राज किया। अंग्रेज शासकों ने इस अवधि में भारतीयों पर अत्याचारों के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। अंग्रेज व्यापारी बन कर आए और तानाशाह बन बैठे, खूब लूट खसूट की और भारत से सारा मालमत्ता समेट कर चंपत हो गए। आज भी कोहिनूर का हीरा इन्हीं अंग्रेजों के पास है, जो यह बताता है कि किस तरह इन्होंने भारत में लूटपाट मचाई थी। ऐसे मानवाधिकारों के उल्लंघन गार्जियन जैसे अखबारों को दिखाई नहीं देते। मानवाधिकारों के इन विदेशी पैरोकारों को जलियांवाला बाग दिखाई नहीं देता, जहां निहत्थे प्रदर्शकारियों को चारों तरफ से घेर कर एक अंग्रेज अधिकारी डायर ने गोलियों से भून डाला था। गार्जियन को यह कभी दिखाई नहीं दिया कि किस तरह केंद्र सरकार ने मुसलमानों की भलाई का एक ऐतिहासिक काम किया, जिसे करने से पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री डरते रहे। देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद मिलने वाला कानूनी हक दिलवाया है, जिन्हें पहले पति तीन बार तलाक तलाक बोल कर धक्के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था। कांग्रेस ने मुसलमानों के वोट के डर से सुप्रीम कोर्ट के शाहबानो के फैसले को ही पलट दिया था, जिसमें कोर्ट ने गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ तत्कालीन कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कानून बना दिया था। विदेशी अखबारों को तकलीफ हो रही है कि मोदी राज में कैसे मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, जब भारत ने ऐसे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया तब खीझ उतारने के लिए कह दिया कि मोदी पुरस्कार के लिए दौड़े चले आते हैं।
जिला स्तर, वार्ड स्तर, राज्य स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर सरकारी और निजी क्षेत्र में पुरस्कार के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, इन्हें पाने के लिए लोग अपनी पूरी उम्र खपा देते हैं। उसमें भी जबरदस्त प्रतिस्पर्धा होती है, तब कहीं जाकर किसी एक का चयन किया जाता है। ऐसे में देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले पुरस्कार का मापदंड कितना कठोर होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। इन पुरस्कारों में पुरस्कार देने वाली सरकार के साथ उन देशों के करोड़ों लोगों की भावनाएं भी जुड़ी होती हैं। चलो मान भी लिया जाए कि किसी एक देश ने भारत से कुछ फायदा लेने के लिए कोई पुरस्कार दे दिया होगा, पर मोदी को तो दर्जनों देशों के सर्वोच्च पुरस्कार मिले हैं, तो क्या इन सब देशों को मोदी सरकार फायदा पहुंचाएगी, वो भी सिर्फ एक पुरस्कार के कारण, यदि ऐसा हुआ होता तो अब तक देश में तूफान आ जाता, कांग्रेस और विपक्षी दलों ने आसमान सिर पर उठा लिया होता। गार्जियन का यह लेख सिर्फ हताशा ही प्रकट करता है। इससे पहले भी इसी तरह के विदेशी अखबारों में लेखों के जरिए भारत की छवि और विकास की तरफ बढ़ते कदमों को रोकने का असफल प्रयास किया जाता रहा है।-योगेंद्र योगी




