लेख

उच्च शिक्षा पर हावी होती महंगाई…

समाज के वर्किंग क्लास और निम्न मध्यवर्ग में यह अहसास मजबूत हुआ है कि उनके बच्चे जीवन की दौड़ में तभी टिक सकते हैं जब वे शिक्षा प्राप्त करें। इसलिए यह समूह अब अपने बच्चों की शिक्षा के लिए हर तरह का संघर्ष कर रहा है। वह पेट काटकर, जमीन गिरवी रखकर, कर्ज लेकर भी बच्चों को पढ़ा रहा है। इसके कारण पिछले डेढ़-दो दशकों में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा में दाखिला बढ़ा है, लैंगिक अंतर कम हुआ है। यह एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन अगर फीस इसी तरह बढ़ती रही तो गरीब तबके को मन मारकर इस दौड़ से बाहर निकल जाना होगा। निश्चय ही उच्च शिक्षा से एक बड़े वर्ग का वंचित होना ठीक नहीं है…

हाल ही में संसदीय स्थायी समिति ने कहा है कि उच्च शिक्षा के लिए मौजूदा बजट आवंटन पर्याप्त नहीं है और शिक्षा पर खर्च बढ़ाकर जीडीपी का 6 प्रतिशत किया जाना चाहिए। समिति के अनुसार 2021-22 में भारत का शिक्षा व्यय केवल 4.12 प्रतिशत था, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के लक्ष्य से कम है। रिपोर्ट में महंगाई, नामांकन वृद्धि और शिक्षा की गुणवत्ता को देखते हुए अधिक निवेश की जरूरत बताई गई है। समिति ने चिंता जताई कि 2021-22 में भारत का कुल शिक्षा व्यय जीडीपी का केवल 4.12 प्रतिशत था। यह आंकड़ा एनईपी के लक्ष्य से काफी कम है। समिति का मानना है कि यदि भारत को वैश्विक स्तर की शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी है तो शिक्षा पर निवेश जरूर बढ़ाना होगा। समिति ने 2018 से 2023 के बीच पुरुष और महिला छात्रों के सकल नामांकन अनुपात (ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो) का भी अध्ययन किया। रिपोर्ट में कहा गया कि इस अवधि में नामांकन अनुपात में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं देखी गई। समिति का मानना है कि मानव संसाधनों के बेहतर विकास और रोजगारोन्मुख शिक्षा के लिए उच्च शिक्षा में अधिक छात्रों को जोडऩा जरूरी है। इसी कारण उसने 2035 तक एनईपी-2020 के लक्ष्यों के अनुरूप शिक्षा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की सिफारिश की है। आज उच्च शिक्षा में बढ़ती महंगाई एक बड़ी चुनौती है, जो सामान्य मुद्रास्फीति की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है। शिक्षा का खर्च 10 से 12 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रहा है जिससे उच्च शिक्षा की लागत हर 6-7 साल में दोगुनी हो जाती है। बढ़ते खर्च के कारण और इससे निपटने के तरीकों पर मंथन जरूरी है। उच्च शिक्षा इतनी महंगी क्यों हो रही है? मांग और आपूर्ति में असंतुलन : उच्च शिक्षा की भारी मांग (लगभग 20 फीसदी वार्षिक वृद्धि) और अच्छे गुणवत्ता वाले संस्थानों की सीमित आपूर्ति के कारण निजी संस्थान इसका फायदा उठाते हैं।

आधुनिक तकनीकों (लैब, सॉफ्टवेयर), अनुसंधान और बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करने में आने वाली भारी लागत, शिक्षकों का वेतन और अनुपालन : उत्कृष्ट प्राध्यापकों का वेतन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे नियामक मानकों को पूरा करने का खर्च सीधे तौर पर ट्यूशन फीस में जुड़ जाता है। महंगी शिक्षा के कारण अधिकांश छात्रों को भारी मात्रा में एजुकेशन लोन लेना पड़ता है, जिसकी अदायगी के लिए वे करियर की शुरुआत में ही कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। मध्यम और गरीब परिवारों पर दबाव : मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों को बच्चों को पढ़ाने के लिए अपनी संपत्ति गिरवी रखनी पड़ती है या अपनी बचत खत्म करनी पड़ती है। उच्च फीस और जीवनयापन के भारी खर्चों (हॉस्टल, यात्रा, कोचिंग) के कारण कई मेधावी छात्र बीच में ही पढ़ाई छोडऩे को मजबूर हो जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों से देश में उच्च शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है। गरीब, मेहनतकश वर्ग ही नहीं, मध्यवर्ग के लिए भी हायर एजुकेशन हासिल करना आसान नहीं रह गया है। हाल तक यह माना जाता था कि कम से कम सरकारी संस्थानों में तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पढ़ाई कर ही लेगा, पर उन संस्थानों की भी बढ़ती फीस ने इस तबके की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। इस वर्ग के लिए तो प्राथमिक शिक्षा का खर्च उठाना भी कठिन होता जा रहा है। यह भारत के लिए एक बड़ी त्रासदी ही कही जाएगी, जहां दुनिया की सबसे युवा आबादी रहती है। आईआईएम (अहमदाबाद) की फीस वर्ष 2007 से 2022 के बीच 15 सालों में 4 लाख रुपए सालाना से बढक़र 27 लाख रुपए सालाना पहुंच गई है जो कि 575 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। देश के प्रमुख चार आईआईएम की सालाना औसत फीस 25 लाख रुपए से ज्यादा है। जब सरकारी संस्थानों का यह हाल है तो निजी संस्थानों के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है। एक तो केंद्रीय विश्वविद्यालयों और आईआईटी-आईआईएम जैसी संस्थाओं की संख्या इतनी कम है कि कुछ चुनिंदा छात्र ही इन तक पहुंच पाते हैं। यानी उच्च शिक्षा तक पहुंचे छात्रों के एक छोटे से हिस्से का भी एक छोटा हिस्सा।

एक बड़ा हिस्सा इन संस्थानों की दौड़ से पहले ही बाहर हो जाता है। कुछ साल पहले तक फीस इत्यादि कम होने की वजह से कुछेक ग्रामीण और कस्बाई छात्र अपनी प्रतिभा और संघर्ष के बल पर ऐसे संस्थानों में किसी न किसी तरह पहुंच ही जाते थे। लेकिन अब तो इसकी संभावना बेहद कम होती जा रही है। हमारी उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम, परीक्षा और परिणामों का स्वरूप कुछ ऐसा हो गया है कि अनेक छात्रों का इन पर से भरोसा उठ चुका है। यह धारणा बन गई है कि सरकारी कॉलेजों से बस डिग्री ले लेनी है, ताकि नौकरी में जा सकें। मतलब एडमिशन लेना एक मजबूरी है। इसलिए पैसे लगाकर दाखिले की औपचारिकता पूरी की जाती है और जैसे-तैसे पढ़ाई के सत्र निपटाए जाते हैं। सच्चाई यह है कि देश भर के ज्यादातर विश्वविद्यालय और कॉलेज अब केवल नामांकन व परीक्षा लेने के केंद्र बन कर रह गए हैं। बच्चे दाखिला लेकर या तो कोचिंग संस्थानों का रुख कर रहे हैं या उस दौरान कोई छोटे-मोटे काम कर रहे हैं। अनेक कॉलेज क्लासों में अमूमन सन्नाटा पसरा रहता है। लेकिन अब तो इस पर भी आफत आ रही है। उनकी ट्यूशन फीस तो बढ़ ही रही है, नामांकन शुल्क, परीक्षा शुल्क में भी बढ़ोतरी जारी है। इसका खामियाजा लड़कियों को ज्यादा भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि परिवार में शिक्षा के मद में जब कटौती की बात आती है, तो लड़कियों की पढ़ाई ही रोकी जाती है, खासकर ग्रामीण इलाकों में।

दलील दी जाती है कि लड़कियां तो बगैर शिक्षा और रोजगार के भी रह सकती हैं, क्योंकि उन्हें आगे चलकर मुख्यत: घर का ही काम संभालना है। इस समय तो अनेक प्राइवेट वित्तीय संस्थान गरीब छात्रों को उच्च शिक्षा लोन भी नहीं देते। वे कुछ ही सीमित कोर्स और संस्थाओं तक अपने लोन को सीमित रखते हैं, जहां केवल एक खास वर्ग के छात्र ही महंगी फीस देकर शिक्षा हासिल करते हैं। समाज के वर्किंग क्लास और निम्न मध्यवर्ग में यह अहसास मजबूत हुआ है कि उनके बच्चे जीवन की दौड़ में तभी टिक सकते हैं जब वे शिक्षा प्राप्त करें। इसलिए यह समूह अब अपने बच्चों की शिक्षा के लिए हर तरह का संघर्ष कर रहा है। वह पेट काटकर, जमीन गिरवी रखकर, कर्ज लेकर भी बच्चों को पढ़ा रहा है। इसके कारण पिछले डेढ़-दो दशकों में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा में दाखिला बढ़ा है, लैंगिक अंतर कम हुआ है। यह एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन अगर फीस इसी तरह बढ़ती रही तो गरीब तबके को मन मारकर इस दौड़ से बाहर निकल जाना होगा। निश्चय ही उच्च शिक्षा से एक बड़े वर्ग का वंचित होना भारी सामाजिक असमानता पैदा करेगा और आर्थिक विभाजन को भी गहरा करेगा। इसे कौन रोकेगा? याद रहे कि पर्याप्त निवेश के बिना विश्वस्तरीय और समावेशी शिक्षा प्रणाली का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा।-डा. वरिंद्र भाटिया

Related Articles

Back to top button