महाराष्ट्र में लागू होने से पहले ही हुआ धर्मांतरण-रोधी कानून का इस्तेमाल, पुलिस ने दो लोगों के खिलाफ लिया एक्शन

पुणे। पुणे पुलिस ने मंगलवार को माना कि धर्म परिवर्तन के अलग-अलग मामलों में जांच का सामना कर रहे एक ब्रिटिश-भारतीय मिशनरी और यूपी के एक व्यक्ति पर नए महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 के तहत जल्दबाजी में आरोप लगाए गए थे।
यह गलती तब सामने आई जब गिरफ्तार दोनों लोगों के वकीलों ने इस विसंगति की ओर इशारा किया। सहायक पुलिस आयुक्त (फरासखाना डिवीजन) सचिन हिरे ने कहा कि पंकज जेम्स देवन्नूर के खिलाफ मामले में नियुक्त जांच अधिकारी 9 अगस्त की एफआईआर से उन सभी प्रावधानों को हटा देंगे जो इस मामले पर लागू नहीं होते।
सीनियर इंस्पेक्टर अमोल मोरे ने कहा कि आरोपी के खिलाफ महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम के प्रावधानों को हटाने का मतलब यह नहीं है कि उस पर पॉक्सो एक्ट और बीएनएस के तहत मुकदमा नहीं चलेगा।
आरोपी के वकील ने क्या कहा?
देवन्नूर के वकील विजय थोम्ब्रे ने कहा कि अधिकारियों ने एक बड़ी चूक की है। उन्होंने 7 अगस्त (जब उनके क्लाइंट कथित तौर पर धर्म-परिवर्तन से जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे) और उस शुरुआती तारीख के बीच के 21 दिनों के अंतर पर ध्यान नहीं दिया, जब संबंधित कानून लागू किया जा सकता था।
थोम्ब्रे ने आगे कहा, “संविधान का अनुच्छेद 20(1) कहता है कि किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए तब तक सजा नहीं दी जा सकती जब तक कि उसने कथित घटना के समय लागू किसी कानून का उल्लंघन न किया हो।”
उन्होंने यह भी कहा कि उनके क्लाइंट, जिन्हें 12 अगस्त को अंतरिम अग्रिम जमानत मिली थी भारत में एक चर्च कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आए थे। इस कार्यक्रम का धर्म-परिवर्तन या ऐसी किसी गतिविधि से कोई लेना-देना नहीं था।
क्या है मामला?
जिस दूसरे व्यक्ति पर तय तारीख से पहले यह कानून लागू किया गया था उस पर एक नाबालिग लड़की के अपहरण, यौन शोषण और उसका धर्म परिवर्तन करने की कोशिश का आरोप है। इस मामले में पुणे जिले के फुरसुंगी में 5 अगस्त को एफआईआर दर्ज की गई थी। यह तारीख राज्य के गृह विभाग द्वारा नए कानून को लागू करने के लिए तय की गई तारीख से 23 दिन पहले की थी।




