वस्त्र सैक्टर एक प्रमुख ‘रोजगार इंजन’

भारत ने 2030 तक 350 बिलियन डॉलर के कपड़ा और परिधान उद्योग का लक्ष्य रखा है। स्थायित्व धीरे-धीरे अब प्रतिस्पर्धात्मकता रणनीति के केंद्र की ओर बढ़ रहा है। फाइबर, यार्न, फैब्रिक, प्रसंस्करण, परिधान, टैक्निकल टैक्सटाइल और मेड-अप तक फैले सैक्टर के लिए स्थायित्व तेजी से प्रतिस्पर्धात्मकता, बाजार पहुंच और जिम्मेदार विकास का प्रश्न बनता जा रहा है। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि विश्व पर्यावरण और सशक्तिकरण के लिए फैशन के विजन को अपना रहा है, भारत इस संबंध में विश्व को नेतृत्व प्रदान कर सकता है, तो उन्होंने भारत के वस्त्र परिदृश्य में लगातार बढ़ते परिवर्तन की ओर इंगित किया।
वस्त्र सैक्टर एक प्रमुख रोजगार इंजन है, जो प्रत्यक्ष रूप से 49 मिलियन से अधिक आजीविका की सहायता करता है। इसके घरेलू बाजार का मूल्य लगभग 196 बिलियन डॉलर है और 2030 तक इसके 250 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। भारत ने वर्ष 2030 तक वस्त्र निर्यात में 100 बिलियन डॉलर का लक्ष्य निर्धारित किया है।
स्थायित्व प्रतिस्पर्धात्मकता का मुद्दा क्यों बन गया है : वैश्विक ब्रांड अपनी आपूर्ति शृंखलाओं के लिए तेजी से महत्वाकांक्षी स्थिरता लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं। उपभोक्ता पुन: उपयोग, मुरम्मत किए गए और पुनर्नवीनीकृत उत्पादों में अधिक रुचि दिखा रहे हैं, जबकि प्रमुख निर्यात बाजारों में नीति निर्माता पर्यावरणगत प्रदर्शन, पुनर्नवीनीकृत सामग्री, ट्रेसेबिलिटी, रसायन, पानी और ऊर्जा उपयोग जैसी आवश्यकताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएं-जिनमें 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, नवीकरणीय ऊर्जा से 50 प्रतिशत ऊर्जा आवश्यकताएं और 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन शामिल हैं, भी वस्त्र सैक्टर को निम्न कार्बन विकास पथ की ओर ले जा रही हैं। इसलिए भारतीय निर्यातकों के लिए स्थिरता एक गौण अनुपालन मुद्दे से आगे बढ़ रही है और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा का एक अभिन्न अंग बन रही है।
बड़े विनिर्माण आधार, विविध कच्चे माल, तकनीकी क्षमताओं, एक स्थापित रीसाइक्लिंग और पुन:उपयोग ईकोसिस्टम, एक बढ़ते स्टार्टअप परिदृश्य और समूहों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग संघों के एक विस्तृत नैटवर्क के साथ भारत की स्थिति मजबूत होती जा रही है। चक्रीयता भारत के लिए पूरी तरह से नई नहीं है। रफुगरी, कांथा, गोधाड़ी, चिंडी की दरियों और खेस बुनाई जैसी परंपराओं ने पीढ़ियों से समुदायों में मुरम्मत और पुन: उपयोग को शामिल किया है। भारत द्वारा वल्र्ड सर्कुलर इकोनॉमी फोरम-2026 की मेजबानी इस बड़े बदलाव को और अधिक दर्शाती है, जो विचारों को सांझेदारी और मापनीय समाधानों में बदलने के लिए सरकारों, उद्योग, नवप्रवर्तकों और विशेषज्ञों को एकजुट करती है।
चक्रीयता को व्यवहार में लाने के लिए सबसे स्पष्ट क्षेत्रों में से एक वस्त्र अपशिष्ट है। 2026 में मंत्रालय द्वारा किए गए एक अध्ययन में15 राज्यों और 250से अधिक हितधारकों की परस्पर बातचीत को शामिल किया गया है। इसमें 70.73 लाख टन वार्षिक वस्त्र अपशिष्ट उत्पादन का अनुमान लगाया गया है। 70 प्रतिशत से अधिक को पहले ही पुनप्र्राप्ति हो चुकी है और 95 प्रतिशत से अधिक पूर्व-उपभोक्ता वस्त्र अपशिष्ट की प्राप्ति के साथ इसे रीसाइक्लिंग, डाऊनसाइक्लिंग या अपसाइक्लिंग के लिए भेज दिया गया है। एक बड़ा अंतराल उपभोक्ता-पश्चात अपशिष्ट का है, जहां संग्रह, पृथक्करण और आॢथक रूप से व्यवहार्य प्राप्ति की प्रणाली कम विकसित है। अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि भारत का वस्त्र रीसाइकिं्लग बाजार 2030 तक लगभग 3.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
पायलट से लेकर परिमाण तक-नीति, प्रौद्योगिकी और एम.एस.एम.ई. : स्थिरता को मुख्यधारा बनने के लिए, पायलट कार्यक्रमों को कारखानों और क्लस्टरों तक पहुंचना होगा। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वस्त्र ईकोसिस्टम के एक बड़े हिस्से में एम.एस.एम.ई. शामिल हैं, जिन्हें प्रौद्योगिकी, वित्त, डाटा और तकनीकी विशेषज्ञता तक पहुंचने में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। मंत्रालय ने जुलाई 2023 में एक ई.एस.जी. टास्क फोर्स का गठन किया, जिसमें सरकारी निकायों, उद्योग संघों, चैंबरों, बहुपक्षीय एजैंसियों, नवप्रवर्तकों, ब्रांडों और शिक्षाविदों को एक साथ लाया गया। इसका काम सामंजस्यपूर्ण प्रमाणन, क्लस्टरों को प्राथमिक सहायता, जागरूकता और क्षमता निर्माण, टिकाऊ फैशन प्रौद्योगिकी और डाटा तथा ट्रेसेबिलिटी के लिए कृत्रिम बुद्धिमता और डिजिटलीकरण के उपयोग पर केंद्रित है।
ई.एस.जी. टास्क फोर्स ने जी.आई.जैड. के माध्यम से लागू ई.यू.-इंडिया रिसोर्स एफिशिएंसी एंड सर्कुलर इकोनॉमी इनिशिएटिव की सहायता की है। इसमें वस्त्र अपशिष्ट का राष्ट्रीय मूल्यांकन, तमिलनाडु के लिए सर्कुलर इकोनॉमी रोडमैप, पानीपत के लिए एम.एस.एम.ई. टूलकिट और टैक्सटाइल रिकवरी सुविधाओं के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया शामिल है।
अगला अध्याय : भारत की वस्त्र स्थायित्व यात्रा एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर रही है, जिसमें अब मजबूत उपभोक्ता-पश्चात संग्रह, रीसाइक्लिंग बुनियादी ढांचे, संसाधन-कुशल विनिर्माण, हरित प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण, विश्वसनीय माप और ट्रेसेबिलिटी और पुनर्नवीनीकरण एवं पुनर्चक्रित उत्पादों के लिए मजबूत बाजारों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। एक प्रस्तावित स्थायित्व गठबंधन इन प्राथमिकताओं के आसपास सरकार, संयुक्त राष्ट्र एजैंसियों, वित्तीय संस्थानों, उद्योग, एम.एस.एम.ई. और शिक्षाविदों को एक साथ लाएगा। दिशा तेजी से स्पष्ट होती जा रही है-स्थायित्व को एक कारखाने के मालिक के लिए उतना ही काम करना चाहिए, जितना कि पर्यावरण के लिए, एक निर्यातक के लिए उतना ही, जितना कि उपभोक्ता के लिए और एक बड़े एकीकृत पार्क के लिए उतना ही, जितना कि एक छोटे उद्यम के लिए। यह संसाधन उत्पादकता में सुधार कर सकता है, मांग वाले वैश्विक बाजारों तक पहुंच में सुविधा प्रदान कर सकता है, रीसाइक्लिंग और हरित प्रौद्योगिकियों के आसपास नए व्यवसायों को बढ़ावा दे सकता है और रोजगार सृजित कर सकता है।-गिरिराज सिंह
(वस्त्र मंत्री, भारत सरकार)




