हम चैंपियन भी, पिछड़े भी

आज खेल की कुछ बातें करते हैं। भारत की खेल-शक्ति और प्रतिभाओं में झांक कर देखते हैं। जापान में एशियाई खेल जारी हैं। रविवार तक भारत मेडल 4 स्वर्ण पदक, 17 रजत और 18 कांस्य पदकों सहित कुल 39 पदक जीत चुका है। क्रिकेट, हॉकी, तीरंदाजी, बॉक्सिंग आदि खेलों में पदक अभी प्रतीक्षित हैं, लेकिन हम आश्वस्त हैं कि पदक जीतेंगे। कबड्डी की पुरुष और महिला टीमें अपने परंपरागत प्रतिद्वंद्वी ईरान की टीमों को परास्त कर ‘स्वर्णिम उपलब्धि’ हासिल कर चुकी हैं। यह भारत की मिट्टी और ग्रामीण अंचल का खेल है, जिसके हम सनातन चैंपियन हैं। पुरुष टीम ने 9वीं बार और महिला टीम ने चौथी बार कबड्डी में ‘स्वर्णिम बादशाहत’ साबित की है। देश के बेटे-बेटियों को आसमान-जितनी बधाइयां…! क्रिकेट में भारत ‘विश्व चैंपियन’ रहा है। जापान में भी हमारी छोरियों ने एकतरफा मुकाबले में श्रीलंका की टीम को जमीन सुंघा दी और एशियाई खेलों में ‘स्वर्ण पदक’ जीतने का आगाज़ किया। वैश्विक और ओलिंपिक पदकधारी मीराबाई चानू भारोत्तोलन की ऐसी खिलाड़ी हैं, जिनकी झोली में एशियाई खेलों का पदक नहीं था। उन्होंने 49 किग्रा. भार-वर्ग में ‘रजत पदक’ हासिल किया। यह उपलब्धि 28 लंबे सालों के बाद नसीब हुई है। 1998 में कर्णम मल्लेश्वरी ने भी ‘रजत पदक’ जीता था, लेकिन उसके बाद भारोत्तोलन की जीत हमसे रूठ गई। अंतत: चानू ने उस खालीपन को भरा। इसी तरह मैराथन और ऊंची कूद में क्रमश: 44 और 56 लंबे सालों के बाद एशियाई रजत पदक भारत के हिस्से आए। स्कवैश जैसे गैर-परंपरागत खेल में भी हमारे नवयुवा अभय सिंह और अनाहत सिंह ने ‘रजत पदक’ जीत कर भारत की उपलब्धियों को समृद्ध किया है। पदकवीरा अनाहत ऐसी पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं। बीते रविवार को खेल-प्रतियोगिता के 8वें दिन भारतीय खिलाडिय़ों ने 7 पदक जीते, जिनमें 4 रजत पदक थे।
ऊंची कूद में सर्वेश कुशारे, मैराथन में रिकॉर्डधारी सावन बरवाल और लंबी कूद में ऐन्सी सोजन की ‘रजतीय’ उपलब्धियों के बाद कह सकते हैं कि ऐसे खिलाड़ी ही हमारे ‘राष्ट्रीय नायक’ हैं। भारत ने मिश्रित निशानेबाजी में भी ‘स्वर्ण पदक’ हासिल किया। भारत के पास तेजस्विन शंकर, पारुल चौधरी, अंकुश पंघाल, नरेन्द्र बेरवाल, परवीन हुड्डा सरीखे खिलाड़ी मौजूद हैं, जिनमें पदक जीत भी चुके हैं और पदक पक्का भी कर लिया गया है। बहरहाल एशियाई खेलों में भारत अपनी सफलताओं और उपलब्धियों से खुश है, गौरवान्वित महसूस करता है, लेकिन कुछ सवालों के साथ ‘असंतुष्ट’ भी है। दरअसल चीन, जापान, दक्षिण कोरिया सरीखे देश अंतरराष्ट्रीय और ओलिंपिक के स्तर पर हमसे बहुत आगे हैं। वे हमेशा हमारी तुलना में ‘विजयी’ रहे हैं, लेकिन अब उज़्बेकिस्तान, कज़ाख़स्तान, थाईलैंड, बहरीन, ईरान और उत्तर कोरिया आदि देशों ने भी भारत से अधिक ‘स्वर्ण पदक’ जीते हैं और पदक-तालिका में हमसे आगे हैं। भारत एशिया में 12वें स्थान पर है। ओलिंपिक में तो हम इक्का-दुक्का स्वर्ण पदक को तरस जाते हैं। 1970 में भीम सिंह ने आखिरी बार 2.05 मीटर ऊंची कूद लगा कर कांस्य पदक जीता था। उसके बाद अब 2026 में सर्वेश कुशारे ने 2.25 मीटर ऊंची कूद लगाई है और रजत पदक हासिल किया है। इतना फासला क्यों है? क्या 56 लंबे सालों में इस खेल का कोई सफल, पदकवीर खिलाड़ी नहीं बन पाया? चीन, जापान, कोरिया के किशोर उम्र के खिलाड़ी ‘विश्व कीर्तिमान’ स्थापित कर रहे हैं। कमोबेश वे ‘रोबोट’ नहीं हैं। बैडमिंटन में पीवी सिंधु का खेल अब थकने लगा है, लेकिन उनके विकल्प तन्वी शर्मा, उन्नति हुड्डा का खेल ‘अनिश्चित’ है। खेलों के लिए 2026-27 का बजट 4479.88 करोड़ रुपए है, जो अभी तक सबसे अधिक है। ‘खेलो इंडिया’ की 5 सालों (2026-31) की निरंतरता के मद्देनजर और विभिन्न खेल महासंघों की योजनाओं के लिए कुल 36,441 करोड़ रुपए खर्च करने का ऐतिहासिक फैसला किया गया है। लक्ष्य तय किया गया है कि 2036 के ओलिंपिक खेलों में भारत शीर्ष-10 और 2048 में शीर्ष-5 देशों में शामिल होना चाहिए। हमें तो नहीं लगता, क्योंकि भारतीय खिलाडिय़ों में शारीरिक और मानसिक रूप से ऐसी खामियां हैं कि हमारा खेल-हुनर शीर्ष देशों के खिलाडिय़ों की तुलना में कमजोर साबित होता है। यह भी संभव है कि हमारे सभी खिलाडिय़ों को शीर्ष स्तर का प्रशिक्षण भी उपलब्ध नहीं है। बहरहाल एशियाई खेलों की जीत से सबक जरूर सीखना चाहिए। हम उम्मीद करें कि आने वाला समय अच्छे परिणाम लाए।




