संपादकीय

LPU में विरोध प्रदर्शन : भरोसे के संकट और सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

पंजाब के फगवाड़ा स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) में विद्यार्थियों के विरोध-प्रदर्शन की जिस तरह की तस्वीरें सामने आई हैं, वे निश्चित तौर पर भरोसे के संकट, लापरवाही और सुरक्षा में कोताही की ओर इशारा करती हैं। विरोध के पीछे कारण चाहे जो भी हो, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रदर्शन हिंसक कैसे हो गया? विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस की ओर से मामले की संवेदनशीलता के मद्देनजर विद्यार्थियों को विश्वास में लेने की गंभीरता क्यों नहीं दिखाई गई?

ऐसे दावे भी किए जा रहे हैं कि परिसर में की गई तोड़-फोड़ में बाहरी लोगों का हाथ है। हालांकि, सच्चाई गहन जांच-पड़ताल के बाद ही सामने आएगी, लेकिन इस घटना से यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है कि हर स्तर पर व्यवस्था का हाल ऐसा क्यों है कि इसमें सुधार के लिए जेन-जी को विरोध प्रदर्शन का रास्ता अपनाना पड़ता है! अगर किसी अप्रिय घटना की आशंका से उपजी नाराजगी को व्यापक विरोध में तब्दील होने दिया जाए, तो क्या इसके लिए जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय नहीं की जानी चाहिए?

गौरतलब है कि एलपीयू परिसर में किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा एक छात्रा से बलात्कार किए जाने की खबरों के बाद विद्यार्थियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था। बीते रविवार को प्रदर्शन हिंसक हो गया और परिसर में तोड़-फोड़ के साथ विद्यार्थियों की पुलिस से झड़पें भी हुर्इं। इसके बाद विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर करीब पंद्रह घटे तक यातायात अवरुद्ध रखा। विश्वविद्यालय प्रशासन शुरू से यह कहता रहा कि परिसर में बलात्कार की कोई घटना नहीं हुई है और यह सिर्फ अफवाह है।

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सच्चाई जांच के बाद ही सामने आ सकेगी, लेकिन यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि अगर किसी ने विश्वविद्यालय परिसर में अफवाह फैलाई थी, तो उसे हिंसक विरोध प्रदर्शन में तब्दील कैसे होने दिया गया? इस तरह के संवेदनशील मसले पर विश्वविद्यालय प्रबंधन और पुलिस को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत क्यों महसूस नहीं हुई? जाहिर है, अगर प्रभावी संवाद के जरिए विद्यार्थियों को भरोसे में लिया गया होता, तो विरोध की चिंगारी को सुलगने से पहले ही शांत किया जा सकता था।

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