संपादकीय

न निलंबन, न ही रोक

सर्वोच्च अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार गुप्ता के निलंबन की मांग खारिज कर दी और उनके कामकाज, फैसले लेने पर कोई ‘अंतरिम रोक’ तक नहीं लगाई, लेकिन इतनी चेतावनी जरूर दी है कि यदि चुनाव आयोग के भीतरी फैसले अथवा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का निर्णय या अन्य महत्वपूर्ण बदलाव के फैसले ‘सर्वसम्मति’ से नहीं लिए गए होंगे, तो शीर्ष अदालत उन तमाम फैसलों को रद्द भी कर सकती है। एक संवैधानिक संस्था के कामकाज और भीतरी विसंगतियों पर सर्वोच्च अदालत की यह बेहद कठोर चेतावनी है। सर्वोच्च अदालत के ही एक अन्य न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने लाखों लाख लोगों का मताधिकार छीनने को ‘संविधान की आत्मा’ पर प्रहार माना है। संविधान नागरिकों के दो वर्गों की अनुमति नहीं देता। किसी भी नागरिक को, जो मतदाता रहा है, नोटिस दिए बिना और अंतिम फैसले से पहले मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। हमें ऐसा चुनाव आयोग नहीं चाहिए। सर्वोच्च अदालत के ही पूर्व न्यायाधीश जस्टिस नरीमन ने सवाल उठाया है कि जब करोड़ों मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से काट दिए गए और अब भी यह प्रक्रिया जारी है, तो उस दौरान सर्वोच्च न्यायालय ‘मूकदर्शक’ क्यों बना रहा? संविधान और उसके अनुच्छेदों के नाम पर यह कवायद चलती रही है, तो सर्वोच्च अदालत ने अपना ठोस फैसला क्यों नहीं दिया? अर्थात चुनाव आयोग, एसआईआर और सीईसी की भूमिकाओं और उनके मद्देनजर विरोध-प्रदर्शनों को नए आयाम मिल गए हैं। अभी तक राजनीतिक विपक्ष चुनाव आयोग और मतदाता सूचियों के कथित शुद्धिकरण को ‘वोट चोरी’ मानता रहा था और निरंतर आंदोलित है, लेकिन आयोग के ही दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बाद अब सर्वोच्च अदालत के मौजूदा और पूर्व न्यायाधीशों ने भी तीखी टिप्पणियां की हैं, तो यह मुद्दा बेहद गंभीर और संवैधानिक औचित्य का बन गया है।

रायता खूब फैलता जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी यह रही है कि जिस फॉर्म 6 के साथ ‘तकनीकी बदलाव’ के संदर्भ में चुनाव आयोग स्पष्टीकरण देता रहा था कि शीर्ष अदालत ने उसे ‘उचित’ करार दिया था, उस पर प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने साफ कह दिया कि सर्वोच्च अदालत ने किसी भी ‘तकनीकी बदलाव’ को मंजूरी नहीं दी। तो क्या चुनाव आयोग देश के सामने ‘सफेद झूठ’ बोल रहा था? क्या यह न्यायिक अवमानना का मामला नहीं बनता? बहरहाल सर्वोच्च अदालत ने सिर्फ सीईसी ज्ञानेश कुमार को ही नहीं, बल्कि दोनों चुनाव आयुक्तों-सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी-समेत आयोग के संबद्ध अधिकारियों और केंद्र सरकार को नोटिस भेजे हैं। प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने साफ कहा है कि मीडिया में छपी रपटों, खबरों के आधार पर काई निर्णायक कार्रवाई नहीं की जा सकती, लिहाजा अदालत ने आयुक्तों की बैठक के ब्यौरे, एजेंडे, मिनट्स, दस्तावेज, फॉर्म 6 और उसके साथ घोषणा-पत्र का फैसला करने वाले कागजात आदि तलब किए हैं। शीर्ष अदालत की न्यायिक पीठ तमाम रिकॉड्र्स को देख-परख कर इस निष्कर्ष तक पहुंचने का प्रयास करेगी कि आयोग में फैसले एकतरफा होते रहे हैं अथवा सर्वसम्मति से लिए जाते रहे हैं।

चूंकि अब यह मामला काफी गहराई तक पहुंच चुका है और व्यापक भी हो गया है, लिहाजा शीर्ष अदालत 2023 के उस कानून की भी समीक्षा जरूर करे, जिसके जरिए सीईसी को सेवानिवृत्ति के बाद भी ‘अभूतपूर्व, अप्रत्याशित कानूनी सुरक्षा’ दी गई है। ऐसा सुरक्षा-कवच देश के प्रधानमंत्री को भी नहीं दिया जाता। सिर्फ राष्ट्रपति को यह कानूनी छूट दी जाती है। क्या अब सीईसी भी राष्ट्रपति के समकक्ष हो गए हैं? बेशक सर्वोच्च अदालत इस छूट की वैधता की समीक्षा करेगी। चूंकि अब सर्वोच्च अदालत का चुनाव आयोग संबंधी विवादों में सीधा दखल हो गया है, तो विपक्ष को आंदोलन जरा शांत कर देना चाहिए। मंगलवार को ‘इंडी’ गठबंधन के 19 घटक दलों के सांसदों ने संसद भवन से ‘निर्वाचन सदन’ तक विरोध-मार्च निकालना तय किया था। वे चुनाव आयोग के मुख्यालय का घेराव करना चाहते थे। बेशक यह उनका संवैधानिक अधिकार है, लेकिन पुलिस और प्रशासन ने इजाजत नहीं दी है, लिहाजा टकराव की गुंजाइश बनी हुई थी। उसका विश्लेषण बाद में करेंगे। अभी तो देश के मतदाताओं को इंसाफ मिलना चाहिए। बहरहाल विपक्ष के आरोपों की जांच करके यह तय किया जाना चाहिए कि क्या कानून के विपरीत काम करके बड़ी संख्या में मतदाताओं से उनका मतदान का अधिकार छीना गया है अथवा नहीं? जब निष्पक्ष ढंग से जांच करके सत्य सामने आएगा तो जिम्मेवार अफसरों पर कार्रवाई की जानी चाहिए तथा इस मसले में न्याय होना चाहिए।

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