बदलते युद्ध में वायु शक्ति की भूमिका

‘नभ: स्पृशं दीप्तम’ का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा जब भारत अपने आकाश को केवल साहस के भरोसे नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक, पर्याप्त संख्या में लड़ाकू विमानों, मजबूत वायु रक्षा, विश्वसनीय हथियार प्रणालियों से सुरक्षित रखे…
‘नभ: स्पृशं दीप्तम’ अर्थात ‘गौरव के साथ आकाश को छूना’। भारतीय वायुसेना का यह ध्येय वाक्य केवल शब्द नहीं, बल्कि उस अदम्य संकल्प का प्रतीक है जिसमें साहस, शौर्य, तकनीकी दक्षता और राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति सर्वोच्च समर्पण निहित है। इसकी प्रेरणा श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय के उस प्रसंग से जुड़ी है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप का वर्णन करते हुए उनके तेजोमय स्वरूप के आकाश को स्पर्श करने का उल्लेख मिलता है। यही भाव भारतीय वायुयोद्धाओं के साहस और कर्तव्यनिष्ठा में दिखाई देता है, जो हर परिस्थिति में देश के आकाश की सुरक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। 8 अक्टूबर 1932 को अस्तित्व में आई भारतीय वायुसेना वर्ष 2026 में अपनी 94वीं वर्षगांठ मना रही है। छह अधिकारियों और 19 एयरमैन से शुरू हुई इसकी यात्रा आज आधुनिक लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों, परिवहन विमानों, रडार, मिसाइलों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों और नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता से लैस एक महत्वपूर्ण सामरिक शक्ति में बदल चुकी है। आज भारतीय वायुसेना में 1.40 लाख से अधिक सक्रिय सैन्यकर्मी हैं। वायुसेना दिवस आत्ममंथन का भी दिन है कि बदलते युद्ध के दौर में हमारी वायुशक्ति कितनी तैयार है और आने वाली चुनौतियों के लिए हमें क्या करना होगा। भारतीय वायुसेना की उपलब्धियों का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है।
1947-48, 1965 और 1971 के युद्धों से लेकर कारगिल संघर्ष तक वायुसेना ने अपनी भूमिका साबित की है। समय के साथ युद्ध का स्वरूप बदला है और अब केवल पायलट की वीरता या विमान की गति निर्णायक नहीं होती। आधुनिक युद्ध में रडार, उपग्रह, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, लंबी दूरी की मिसाइलें, सुरक्षित संचार और रियल टाइम सूचना भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई हैं। इसलिए आज वायुशक्ति का अर्थ केवल लड़ाकू विमानों की संख्या नहीं, बल्कि एक संपूर्ण और परस्पर जुड़ी हुई युद्ध प्रणाली है। इसलिए भविष्य की भारतीय वायुशक्ति में लड़ाकू विमानों के साथ एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम, हवा में ईंधन भरने वाले विमान, ड्रोन, मिसाइल और मजबूत एयर डिफेंस नेटवर्क की भूमिका बढऩे वाली है। इसी के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा की दीर्घकालिक मजबूती के लिए अग्निवीर वायुसैनिकों के स्थान पर पर्याप्त नियमित वायुसैनिकों की भर्ती अपरिहार्य है। भारतीय वायुसेना की वास्तविक चुनौती यहीं से शुरू होती है। स्वीकृत 42 लड़ाकू स्क्वाड्रनों के मुकाबले सक्रिय स्क्वाड्रनों की संख्या तीन दर्जन से भी कम रहने की रिपोर्टें सामने आती रही हैं और 2026 में यह संख्या लगभग 29 तक बताई गई है। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दूसरी ओर पुराने मिग-21 के विदा होने के साथ जगुआर, मिराज-2000 और मिग-29 जैसे अपेक्षाकृत पुराने बेड़ों के आधुनिकीकरण अथवा भविष्य में चरणबद्ध सेवानिवृत्ति की चुनौती भी सामने है। समस्या केवल विमानों की कमी की नहीं है, बल्कि पुराने विमानों के हटने और नए विमानों के शामिल होने के बीच पैदा होने वाले अंतर की है। वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी इस चुनौती को कई बार रेखांकित कर चुके हैं। फरवरी 2025 में उन्होंने कहा था कि देश को हर वर्ष लगभग 35 से 40 लड़ाकू विमानों का उत्पादन करने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी उत्पादन क्षमता रातोंरात तैयार नहीं हो सकती। यह टिप्पणी बताती है कि भारत के सामने चुनौती केवल विमान खरीदने की नहीं, बल्कि एक ऐसी स्थायी औद्योगिक क्षमता तैयार करने की है जो संकट के समय लगातार विमानों और उनके कलपुर्जों की आपूर्ति कर सके। इस दिशा में तेजस कार्यक्रम उम्मीद की महत्वपूर्ण किरण है।
सितंबर 2025 में रक्षा मंत्रालय ने एचएएल के साथ 97 तेजस एमके-1ए विमानों के लिए 62370 करोड़ रुपए से अधिक का अनुबंध किया। इनमें 68 लड़ाकू विमान और 29 ट्विन-सीटर शामिल हैं। इनकी आपूर्ति 2027-28 से शुरू होकर छह वर्षों में पूरी होनी है। इन विमानों में 64 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री रखने तथा उत्तम एईएसए रडार और अन्य स्वदेशी प्रणालियों को शामिल करने की योजना है। सितंबर 2026 में एचएएल द्वारा तेजस एफओसी ट्विन-सीटर प्रशिक्षक विमानों की वायुसेना को सुपुर्दगी भी स्वदेशी एयरोस्पेस क्षमता के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही है। लेकिन केवल तेजस पर निर्भर रहकर तत्काल कमी पूरी नहीं की जा सकती। इसी कारण 114 बहुउद्देशीय लड़ाकू विमानों की संभावित खरीद भी महत्वपूर्ण है। 2026 में फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन ने भारत के साथ 114 राफेल विमानों की संभावित बड़ी डील पर बातचीत जारी रहने की पुष्टि की है, जिसमें भारत में विमानों के निर्माण की संभावना भी शामिल है। भारतीय वायुसेना के सामने चुनौतियां गंभीर अवश्य हैं, लेकिन सामथ्र्य की कमी नहीं है। हमारे पास अनुभवी और साहसी वायुयोद्धा, राफेल और सुखोई-30 एमकेआई जैसे आधुनिक लड़ाकू विमान, तेजस जैसी स्वदेशी पहल, मजबूत मिसाइल क्षमता और तेजी से विकसित होता रक्षा उद्योग है। जरूरत इस बात की है कि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में गति, उत्पादन में निरंतरता और स्वदेशी तकनीक में निवेश को समान प्राथमिकता मिले। ‘नभ: स्पृशं दीप्तम’ का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा जब भारत अपने आकाश को केवल साहस के भरोसे नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक, पर्याप्त संख्या में लड़ाकू विमानों, मजबूत वायु रक्षा, विश्वसनीय हथियार प्रणालियों, प्रशिक्षित मानव संसाधन और आत्मनिर्भर औद्योगिक क्षमता से सुरक्षित रखे। आकाश को छूना गौरव की बात है, लेकिन उस विशाल आकाश की सुरक्षा के लिए हर समय तैयार रहना उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी है।
भारतीय वायुसेना के 94वें स्थापना दिवस पर देश के वीर वायुयोद्धाओं को नमन करते हुए यही संकल्प होना चाहिए कि बदलती युद्ध तकनीक और नई सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत की वायुशक्ति न केवल सक्षम रहे, बल्कि भविष्य की जरूरतों के अनुरूप निरंतर मजबूत होती रहे। वायुसेना दिवस पर सशस्त्र सेनाओं के अधिकारियों/सैनिकों को हार्दिक बधाइयां, जयहिंद! आओ, वायु सेना की मजबूती का संकल्प लें।
अनुज आचार्य




