गुजरात के बेन किंग्सले और महात्मा की छवि से मुक्ति के प्रयास

महात्मा गांधी की हत्या से व्यथित होकर स्थायी रूप से इंग्लैंड में बस जाने का फैसला करने के बाद मोतीलाल कोठारी ने 1951 में लुई फिशर की लिखी जीवनी पढ़कर इस संभावना पर काम किया कि क्या गांधीजी की स्मृति को स्थायी दृश्य रूप दिया जा सकता है. फिर 9 साल बाद 1960 में उन्होंने उस इंडो-ब्रिटिश फिल्म्स की स्थापना की, जिसमें रिचर्ड एटनबरो भागीदार बने. अब यह फिल्म कंपनी एटनबरो परिवार के हाथ में है.
शिद्दत इतनी थी कि स्विट्जरलैंड लौट चुकीं बापू की मानसपुत्री मीराबेन से मदद लेने पहुंच गए और उन्होंने की भी. महात्मा गांधी की 100वीं वर्षगांठ पर 1969 में फिल्म रिलीज का सपना देखते-देखते 1970 में जब कोठारी गुजर गए, तब तक बेन किंगस्ले दूर-दूर तक कहीं ख्याल में नहीं थे.
संयोग ही था कि 1980 में जिस दिन गांधीजी के गुजरात के बेन किंग्सले को लंदन के एल्डविच थिएटर में चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास ‘द लाइफ एंड एडवेंचर्स ऑफ निकोलस निकल्बी’ की रिहर्सल के दौरान फोन आया, वे महात्मा गांधी की सचित्र जीवनी पढ़ रहे थे. दस दिन बाद नाटक के लंदन प्रीमियर के इंटरवल में उन्हें एटनबरो ने फोन करके बताया कि वे मुख्य भूमिका के लिए चुने गए 5 अभिनेताओं में हैं.
अगले ही दिन मुलाकात के बाद दो स्क्रीन टेस्ट करके एटनबरो को वह अभिनेता मिल गया, जिसका वे पिछले 18 वर्षों से इंतजार कर रहे थे. एटनबरो ने सूचना दी, तो बेन ने कहा, ‘‘मैं सेवक की तरह यह काम करूंगा.’’
यह असमानता का योग है कि दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के जिस दंश से ‘महात्मा’ बने, वही उनसे बेन किंग्सले को जोड़ता है. अंग्रेजों के देश में पैदा होने के बावजूद कृष्ण पंडित भानजी को 1965 से 67 के बीच थिएटर में काम पाने के लिए नाम बदलना पड़ा. नया नाम पिता के ‘भानजी’ और दादा की उपाधि ‘किंग ऑफ क्लोव’ से मिलकर बना. वे 2002 में गजब की अभिनय यात्रा के लिए नाइटहुड से नवाजे गए, तो ‘सर’ कहे जाने पर विवाद हो गया.
स्पेनी अभिनेत्री पेनेलोप क्रूज जब ‘एल्गी’ की शूटिंग के दौरान उन्हें ‘सर बेन’ कहतीं, तो लोग पीठ पीछे बातें करते और आखिरकर ‘गोरों की सर्वोच्चता’ की मानसिकता ने इस विवाद को प्रेस तक पहुंचा दिया.
उनका अभिनय इतना स्वाभाविक था कि एक पूरी पीढ़ी ‘गांधी’ को देखकर बेन किंगस्ले को ही महात्मा का प्रतिरूप समझती रही और किरदार की यह छवि तोड़ने में उन्हें सालों मेहनत करनी पड़ी. 1994 में छपे संस्मरण ‘एक्टिंग एज गांधी’ में उन्होंने बताया कि बापू की भूमिका को उन्होंने किस तरह समझा और निभाया. तकरीबन 5 घंटे के दस्तावेजी फिल्म फुटेज देखने के बाद एहसास हुआ कि गांधी की उपस्थिति को केवल मेकअप या शारीरिक समानता से हासिल नहीं किया जा सकता.
असाधारण ऊर्जा से भरपूर गांधीजी शारीरिक रूप से कमजोर दिखते हों, पर उनका तेज समझने के लिए किंगस्ले को उनके जैसा होना था.
चलना, मुस्कुराना, भीड़ को संबोधित करना, सिर हिलाना, बैठना, हाथों की मुद्रा, चश्मे का अंदाज और चरखे से सूत कातना… सबकुछ करके देखना था. ध्यान से देखा, तो वजन कम किया, सिर मुंडवाया, शाकाहारी भोजन अपनाया, रोजाना 80 मिनट योगाभ्यास किया, चरखा चलाना सीखा. किताबें ही नहीं पढ़ीं, बल्कि जीवनपद्धित अपनाने के लिए दैनंदिन जीवनक्रम भी पढ़ा.
चूंकि नकल के बजाय वे बापू की उपस्थिति महसूस करवाना चाहते थे. महज राजनीतिक नेता के बजाय उनके असाधारण मानवीय चरित्र, कमजोरियां तथा ताकत, विनम्रता किंतु दृढ़ता, गंभीरता के साथ विनोद, सार्वजनिक व निजी जीवन को अपनाने की कोशिश में जुटे रहे. यह सब अक्तूबर 1980 से मई 1981 तक चला.
यानी बेटे समेत भारत आने और दिल्ली, मुंबई, पुणे, पटना, पोरबंदर, उदयपुर में शूटिंग पूरी होने तक. एक दिन बेटे को लेकर वे कस्तूरबा का किरदार निभा रहीं रोहिणी हट्टंगड़ी के साथ चुपचाप मुंबई के मणिभवन गए और ‘सत्य के प्रयोग’ खरीद लाए. दोनों शूटिंग के दौरान साथ-साथ उसे पढ़ते रहे.
किरदार को जीने की दृष्टि उन्हें रंगमंच ने बख्शी है. 1967 में रॉयल शेक्सपियर थिएटर के रंगमंच से शेक्सपियर की हर कृति के किरदारों को निभाना… 1975 में हैमलेट और 1986 में ओथेलो तक. शेक्सपियर के साहित्य ने उन्हें सिर्फ रंगकर्म का मौका नहीं दिया, बल्कि इंसानी बरताव, महत्वाकांक्षा, भाषा, भय, ताकत के साथ कमजोरियों को भी नए नजरिये से देखना सिखाया. बापू को ईमानदारी से समझने की राह भी यहीं से बनी.
शायद महात्मा की सादगी ही थी कि बेन ऑस्कर की चमक-दमक छोड़ तीन दिन बाद ही लंदन में 548 सीटों वाले थिएटर में लौट आए थे, ताकि ‘एडमंड कीन’ को रंगमंच पर उतार पाएं. पारिश्रमिक था सिर्फ 225 डॉलर प्रति सप्ताह. ‘एडमंड कीन’ की तरह ‘गांधी’ की शोहरत और सफलता के नशे में धुत होने के बजाय वे बुनियाद की ओर लौटे.
चुनौती और भी बड़ी थी क्योंकि ‘गांधी’ के विराट किरदार से टाइपकास्ट होने का खतरा था. लिहाजा, जानबूझकर ऐसी भूमिकाएं चुनीं, जो ‘महात्मा’ के जीवन से बिल्कुल उलट थीं. 1983 की ‘बेट्रेयल’ और 1985 की ‘टर्टल डायरी’ जैसी कहानियां.
‘बग्सी’ में मायर लैंस्की, ‘शिंडलर्स लिस्ट’ में यित्जाक स्टर्न, ‘डेथ एंड द मेडन’ में डॉ. रॉबर्टो मिरांडा और ‘सेक्सी बीस्ट’ में डॉन लोगन के रूप में इस भय को तोड़ा. यह साहस शायद गांधीजी से ही आया. 2009 में भारत यात्रा पर आए, तो बेन ने कहा, ‘‘मुझे लोग अब भी महात्मा गांधी की भूमिका के लिए याद करते हैं. मैं इसे सम्मान के रूप में स्वीकार करता हूं. मेरा नाम दुनिया के महानतम लोगों में से एक से जुड़ा हुआ है. यह सम्मान की बात है.’’
एटनबरो की ‘इन द सर्च ऑफ गांधी’ तो प्रकाशित हो गई, पर मोतीलाल कोठारी की संघर्षकथा अब भी अप्रकाशित है, जिसे उनके बेटे राज ने लिखा था. कोठारी की पत्नी डोरोथी, बेटे राज और बेटियां रजनी व शांता इंग्लैंड के डोर्सेट के ब्रिजपोर्ट में ही बसे रहे. ‘गांधी’ के सहायक संपादक राज कोठारी 2017 में चल बसे, पर वे जिस श्मिड 16 एमएम एडिटिंग मशीन का इस्तेमाल करते थे, उसकी चर्चा अब तक होती है.




