‘वी विल डू इट’

प्रधानमंत्री मोदी ने सार्वजनिक जीवन में निरंतर 25 साल सत्ता में रहने का एक कीर्तिमान, मील पत्थर स्थापित किया है। प्रधानमंत्री बनने से पहले वह निरंतर 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। अब देश के प्रधानमंत्री पद पर भी वह लगातार 4518 दिनों ( 8 अक्तूबर, 2026 तक) का नया इतिहास रच चुके हैं। यकीनन यह असाधारण उपलब्धि है। यह भारत के लोकतंत्र और जनमत की सशक्तता का भी प्रमाण है कि एक ही व्यक्ति को, सर्वोच्च कार्यकारी भूमिका के लिए, जनादेश दिया जा रहा है। ‘वोट चोरी’ का शोर मचा कर इसे ‘बौना’ न करें। अब इतिहास के पन्नों पर प्रधानमंत्री मोदी का भी उल्लेख होगा, लेकिन व्याख्याएं अलग-अलग की जा सकती हैं। 2024 के जनादेश के बाद भी वह 2 साल 4 माह से प्रधानमंत्री हैं। अभी उनके कार्यकाल के अढाई साल से अधिक का समय शेष है। अर्थात प्रधानमंत्री मोदी भारत के सबसे लंबे वक्त तक प्रधानमंत्री रहेंगे, यह अब तय हो गया है। इस अवसर पर उन्होंने देश को नया नारा दिया है-‘वी विल डू इट।’ यानी हम यह करके रहेंगे। यह नारा ‘अच्छे दिन आएंगे’ का नया संस्करण है। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले ‘अच्छे दिनों’ के उद्घोष और आह्वान ने नई उम्मीदों, नई आकांक्षाओं, नई अपेक्षाओं को जगाया था, नतीजतन मोदी के नेतृत्व में भाजपा को पहली बार 282 सीटों का ऐतिहासिक जनादेश मिला था। राजनीतिक इतिहास में भाजपा ने अकेले दम पर बहुमत हासिल किया था। करोड़ों भारतीयों ने ‘अच्छे दिन’ महसूस किए होंगे, लेकिन करोड़ों आज भी ‘बर्बादियों का कालखंड’ मानते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के घोर, कट्टर विरोधी और आलोचक भी मानते होंगे कि ये 12 साल 4 माह भारत के लिए ‘आर्थिक और सांस्कृतिक जनादेश’ भी साबित हुए हैं। अब भारत में दोहरे विकल्पों, भागों, आधारों की स्थिति नहीं है। यदि अंत्योदय है, तो डिजिटल इंडिया भी है। यदि आज भी गरीबी है, तो 25 करोड़ से अधिक भारतीय गरीबी से बाहर आए हैं।
यह तथ्य विश्व बैंक, आईएमएफ और अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां भी मानती हैं। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को जिस हिंदूवादी, स्वदेशी, संकरे-शोषक मानस के भारत का भय और ऐसी आशंकाएं थीं, कमोबेश प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें गलत साबित किया। भारत एकतरफा और सांप्रदायिक देश नहीं है, नतीजतन आज हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 750 अरब डॉलर से अधिक का है। अब प्रधानमंत्री मोदी नए नारे के साथ ‘2047 में विकसित भारत’ का आह्वान कर रहे हैं। फिलहाल 21 लंबे साल शेष हैं। राजनीति में यह अवधि अनिश्चित होती है। प्रधानमंत्री ने तीसरे स्थान की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग हब, अंतरिक्ष में कदम, ओलिंपिक की मेजबानी आदि के संदर्भ में हुंकार भरी और भीड़ से भरवाई है कि ‘वी विल डू इट।’ भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रह चुका है और तीसरे स्थान की हुंकारें लंबे समय से भरी जा रही हैं। चुनावों में भी प्रधानमंत्री ऐसे दावे करते रहे हैं। हकीकत यह है कि हम चौथे से लुढक़ कर छठे स्थान पर आ गए हैं। अमरीका और चीन की अर्थव्यवस्थाएं इतनी विराट और व्यापक हैं कि भारत चुनौती देने की सोच भी नहीं सकता। जर्मनी और जापान की विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी हमसे आगे हैं। प्रति व्यक्ति आय में ही कई गुना के फासले हैं। यदि भारत की जीडीपी एक ट्रिलियन डॉलर बढ़ेगी, तो जर्मनी 2 ट्रिलियन डॉलर विकसित होगी। वह आज भी एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक हमसे आगे है। वैसे भी 2030 तक भारत जर्मनी को लांघ नहीं सकता, ये आकलन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और एजेंसियों के हैं। भारत फिलहाल एशिया में भी मैन्यूफैक्चरिंग हब नहीं है। यह रुतबा चीन को हासिल है। ‘वैश्विक’ बनना तो महज ‘गालबजाई’ है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में हालिया गिरावट और भारतीय जीडीपी में उसका योगदान कम होना चिंताजनक तथ्य है। प्रधानमंत्री के कुछ आह्वानों, आयामों के बूते ही ‘वी विल डू इट’ को हासिल नहीं किया जा सकता।




