किसानों को सौर ऊर्जा के बढ़ते उपयोग में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए

भारत की सौर ऊर्जा की प्रगति सराहनीय है। 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने से ठीक पहले, देश में स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता मात्र 2.82 गीगावाट थी। अगस्त 2026 तक यह बढ़कर 168.04 गीगावाट हो गई, जो कि 60 गुना वृद्धि है। इसके साथ ही चीन और अमरीका के बाद भारत सौर ऊर्जा क्षेत्र में तीसरा सबसे बड़ा खिलाड़ी बन गया। इसका अधिकांश हिस्सा (74 प्रतिशत) यूटिलिटी-स्केल परियोजनाओं का है, जिनमें अडानी ग्रीन एनर्जी, रिन्यू, एन.टी.पी.सी., जे.एस.डब्ल्यू. एनर्जी और ग्रीनको एनर्जी जैसी बड़ी कंपनियां अग्रणी हैं।टाटा पावर सोलर इंजीनियरिंग प्रोक्योरमैंट और कंस्ट्रक्शन (ई.पी.सी.) परियोजनाओं में अधिक सक्रिय है। रूफटॉप सौर ऊर्जा का हिस्सा लगभग 20 प्रतिशत है और शेष (लगभग 6 प्रतिशत) ऑफ-ग्रिड और हाइब्रिड परियोजनाओं का है।
बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा मॉडल ने त्वरित और लागत-कुशल तैनाती को संभव बनाया है। ये जमीन पर स्थापित सौर पार्क हैं, जो मुख्य रूप से सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई बंजर या अनुपयोगी भूमि पर बनाए गए हैं। इनमें से सबसे बड़ा पार्क गुजरात के कच्छ क्षेत्र में बन रहा खवड़ा सौर पार्क (30 गीगावाट) है।
प्रधानमंत्री सूर्य घर : मुफ्त बिजली योजना के तहत रूफटॉप सोलर को काफी गति मिली है, जिसका लक्ष्य 1 करोड़ घरों तक सोलर पैनल पहुंचाना है। 3 किलोवाट का सोलर सिस्टम लगवाने वाले घर को केंद्र सरकार से 78,000 रुपए की सबसिडी मिलती है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इसमें 30,000 रुपए और जोड़ते हैं, जिससे कुल सहायता राशि 1.08 लाख रुपए हो जाती है, जबकि अनुमानित लागत 1.8 लाख रुपए है। इस तरह 60 प्रतिशत सबसिडी मिलती है। दिल्ली सरकार ने तो इससे भी आगे बढ़कर मुफ्त में रूफटॉप सोलर पैनल लगवाने की पेशकश की है।
मोदी सरकार को किसानों के लाभ के लिए बनाई गई पी.एम.-कुसुम योजना में अभी तक सफलता नहीं मिली है। यह योजना शुरू में मुख्य रूप से सौर पंपों पर आधारित थी। लेकिन इसके घटक ‘ए’ के तहत किसानों को अपनी जमीन पर 2 मैगावाट तक के सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की अनुमति भी दी गई है। हालांकि, पी.एम. सूर्य घर योजना के विपरीत, इसमें कोई पूंजी सबसिडी नहीं दी जाती। पी.एम.-कुसुम के घटक ‘ए’ पर पुनॢवचार और उसमें संशोधन करने का समय आ गया है, ताकि किसानों को इसी तरह की पूंजी सबसिडी प्रदान की जा सके। साथ ही, कृषि भूमि पर स्थापित सौर परियोजनाओं पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, क्योंकि वे सीधे खाद्य उत्पादन को प्रभावित करती हैं। भारत इस तरह का समझौता नहीं कर सकता।
इसका समाधान कृषि-फोटोवोल्टिक्स (एग्री-पी.वी.) में निहित है, जिसमें सौर पैनलों को जमीन से लगभग 11 फुट ऊपर स्थापित किया जाता है और उनके बीच इतनी जगह छोड़ी जाती है कि नीचे खेती की जा सके। इससे एक ही भूमि पर भोजन और ऊर्जा दोनों का उत्पादन संभव हो सकेगा। इस प्रकार के घटक ‘ए’ को बढ़ावा देने से एक साथ 3 उद्देश्य पूरे हो सकते हैं-किसानों की आय में 8 से 10 गुना वृद्धि, सरकार के बिजली सबसिडी बिल में कमी और स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन, जो ग्रामीण क्षेत्रों के औद्योगिकीकरण में सहायक हो। इसके लिए किसानों और किसान उत्पादक कंपनियों (एफ.पी.सी.) को प्राथमिकता क्षेत्र ऋण दरों पर पूंजी उपलब्ध कराना और फीड-इन टैरिफ को वर्तमान प्रणाली के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की लागत के आधे पर निर्धारित करना आवश्यक है।
तुलनात्मक रूप से, पी.एम. सूर्य घर परियोजना का अनुमानित बजट 75,021 करोड़ रुपए है। विश्व बैंक ने इस योजना को समर्थन देने और निजी वित्तपोषण जुटाने के लिए रियायती वित्तपोषण और अनुदान सहित 820 मिलियन डॉलर का ऋण भी स्वीकृत किया है। पी.एम.-कुसुम के लिए विश्व बैंक से वित्तपोषण की ऐसी कोई समान सुविधा उपलब्ध नहीं है। अब समय आ गया है कि विश्व बैंक ऑप्रेशन फ्लड के तहत बनाई गई दुग्ध सहकारी समितियों की तर्ज पर सौर सहकारी समितियों के बारे में सोचे और एक नई ग्रामीण क्रांति लाने में मदद करे-इसे ‘पी.एम. सूर्य खेत क्रांति’ कहा जाए, जिसमें सौर ऊर्जा किसानों की ‘तीसरी फसल’ बन जाए।-अशोक गुलाटी, सुभोदीप बसु




