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बेटियां भी होने लगीं ‘ऐसी’!

इन दिनों बहुत सी खबरें ऐसी आती हैं, आसपास की घटनाएं भी दिखाई देती हैं कि अर्से से जो बातें सुनते आ रहे हैं, उनसे विश्वास हट जाता है। लगता है कि या तो समय बहुत बदल गया है, अथवा हम चीजों को ठीक से नहीं देख पा रहे हैं। अक्सर सुनते आए हैं कि बेटों के मुकाबले बेटियां अपने माता-पिता का ज्यादा ध्यान रखती हैं। वे अधिक जिम्मेदार और इमोशनल होती हैं। हालांकि यह भी कहा जाता है कि जब ये बेटियां ही बहू बनती हैं, तो ससुराल में सास-ससुर इन्हें जरा नहीं सुहाते। एक इमोशनल लड़की बहू बनते ही इतनी कठोर कैसे हो जाती है? हालांकि किसी भी बात का जनरलाइजेशन नहीं किया जाना चाहिए। ऐसी भी बहुएं होती हैं जो ससुराल में बहुत प्यार से रहती हैं। और ऐसी सास भी होती हैं, जो अपनी बहुओं को बहुत प्यार करती हैं। हालांकि यह भी सच है कि जिसकी चल जाए, जिसके हाथ में सत्ता हो, वही दूसरे को सताता है। कभी सास, तो कभी बहू, तो कभी बेटा। विमर्श अक्सर एक ही झाड़ू से सबको सकेर देते हैं। स्त्री विमर्श ने भी इस अवधारणा को बल दिया है कि लड़कों के मुकाबले लड़कियां अपने माता-पिता की देखभाल करती हैं, जबकि उनके जन्म पर अक्सर कोई खुशी नहीं मनाई जाती। 

यूं वक्त के साथ बहुत कुछ बदल रहा है। लोग लड़कियों के जन्म पर बड़ी-बड़ी दावतें दे रहे हैं। कई-कई गांवों को न्यौत रहे हैं। कन्या के घर आने पर बैंड-बाजे बजाकर स्वागत कर  रहे हैं। तो बात हो रही है कि लड़कियां अपने घर  वालों की ज्यादा देखभाल करती हैं, उनसे अधिक जुड़ाव महसूस करती हैं लेकिन इन दिनों ऐसी खबरें भी आती रहती हैं, जिनसे इस अवधारणा के उलट बातें भी दिखाई  देती हैं। कुछ दिन पहले की खबर तो आप में से अधिकांश ने पढ़ी ही होगी। तीन बेटियों के पिता वृद्धाश्रम में रहते थे। पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। वह 
बेटियों की बाट जोहते रहते थे कि कभी तो कोई उनसे मिलने आए लेकिन कोई उनसे मिलने नहीं आता था। लड़कियां अक्सर टाइम न होने की बात कह देती थीं। फिर एक दिन इन बुजुर्ग की मृत्यु हो गई।

वृद्धाश्रम के अधिकारियों ने तीनों बेटियों से सम्पर्क किया लेकिन तीनों की तीनों ने आने से मना कर दिया। मुम्बई में रहने वाली लड़की ने अंतिम संस्कार ऑनलाइन देखा और बार-बार पूछती रही कि और कितना समय लगेगा। अस्थि चुनने के लिए भी लड़कियां नहीं आईं। इस घटना की मीडिया में बहुत चर्चा भी हुई। हाल ही में एक और घटना पढ़ी। एक  पिता की 5 बेटियां थीं। खुद अशिक्षित होते हुए भी उन्होंने बेटियों को खूब पढ़ाया-लिखाया। उनका विवाह कर दिया। फिर इन बुजुर्ग को लगा कि जीवन का पता नहीं, कितने दिन का है, इसलिए जिस मकान में रहते हैं, उसे अपनी बेटियों के नाम कर दें। उन्होंने अपनी छोटी बेटी से इस बारे में बात की। 

बेटी ने कहा कि वह सब करा देगी। पिता बिल्कुल चिंतित न हों। लड़की ने वसीयत तैयार करा दी। फिर यह कहकर पिता के साथ आकर रहने लगी कि वह उनकी देखभाल करना चाहती है। पिता ने उससे कहा कि जो वसीयत तैयार हुई है, उसे दिखा तो दे लेकिन लड़की हर बार कोई बहाना बना देती। पिता को शक हुआ, तो उन्होंने अपनी अन्य 4 बेटियों को इस बारे में बताया।  पिता ने बेटियों की मदद से वसीयत की डुप्लीकेट प्रति प्राप्त करने के लिए  आवेदन किया। वसीयत मिलने पर चारों बेटियां और पिता यह देखकर चकित रह गए कि उन्हें धोखे में रखकर, सबसे छोटी बेटी ने मकान अपने नाम करा लिया था। इसलिए अनेक बार मांगने पर भी उसने वसीयत नहीं दिखाई। यही नहीं, मकान में कोई और न रहने आ जाए, इस कारण वह खुद परिवार समेत वहां आकर रहने भी लगी। मजबूर होकर पिता ने अन्य 4 बेटियों के साथ मिलकर वसीयत खारिज कराने का दावा किया।लेकिन जैसा होता है, इस मामले में किसी न किसी कारण से देर होती गई। खैर, एक दुखी पिता की जीत हुई लेकिन मृत्यु के बाद। छोटी लड़की को मकान से फौरन बाहर करने का आदेश भी आया लेकिन न्याय मिला भी तो बुजुर्ग की मृत्यु के बाद। पिता ने नई वसीयत भी  तैयार कराई थी, जिसमें छोटी बेटी को हर अधिकार से बेदखल कर दिया गया।

इस पूरी घटना ने यही सबक तो दिया, जिसके बारे में बुजुर्ग पहले से ही कहते आए हैं कि लालच का न कोई रिश्ता होता है, न कोई धर्म। बल्कि लालची व्यक्ति की आंखों पर ऐसी पट्टी बंध जाती है, जो उसे सही-गलत नहीं देखने देती। ऐसे में न मां मां है, न पिता पिता, न ही कोई भाई-बहन, नाते, रिश्तेदार सगा है। इसीलिए कई बार जमीन, जायदाद, रुपए, पैसे के मामलों में अपने ही अपनों को मारकर रिश्तों को खत्म कर देते हैं। अब तो यह भी है कि अपराध करने के बाद अपराधी बेखौफ होकर कहते हैं कि उन्हें कोई दुख नहीं। कोई पछतावा नहीं। जो किया सो ठीक किया। यह सोचना भी कितना भयावह है कि नजदीक से नजदीक रिश्तों पर इन दिनों यकीन नहीं किया जा सकता। कब कौन दगा दे जाए, पता नहीं।-क्षमा शर्मा

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