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त्यौहारी सीजन और बढ़ती महंगाई

भारत में त्यौहार सिर्फ उत्सव भर नहीं हैं, वे महत्वपूर्ण परंपराएं हैं। इस दौरान परिवार अक्सर नए कपड़ों, मिठाइयों, सजावट और उपहारों पर काफी खर्च करते हैं। हालांकि, बढ़ती कीमतें और मुद्रास्फीति उपभोक्ताओं को अपने बजट और खरीदारी की आदतों को समायोजित करने के लिए मजबूर कर रही हैं। कई परिवार छोटे पैमाने पर त्यौहार मनाने का विकल्प चुन रहे हैं और छूट व सौदों की तलाश में हैं। मौसम के अनियमित मिजाज के कारण प्याज, लहसुन और अदरक जैसी प्रमुख खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल आया है।
इसके अलावा, वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और भारतीय रुपया कमजोर हो रहा है। इससे परिवहन और खनिज तेल की लागत बढ़ गई है, जहां थोक खनिज तेल की कीमतें पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक हैं।

कोर मुद्रास्फीति बढ़कर 4.6 प्रतिशत हो गई है, जिससे खाद्य पदार्थों, ईंधन, सेवाओं और वस्तुओं की कीमतें प्रभावित हो रही हैं। मुद्रास्फीति से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए केवल मौद्रिक नीति ही पर्याप्त नहीं, इसके लिए तरलता प्रबंधन, करों के समायोजन और कृषि व आपूर्ति शृंखलाओं में सुधार सहित समन्वित राजकोषीय उपायों की भी आवश्यकता है। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने रेपो दर में 25 आधार अंकों की वृद्धि कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया है। यह लगभग 4 वर्षों में पहली ब्याज दर वृद्धि है। ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ से ‘न्यूट्रल’ की ओर रुख यह दर्शाता है कि निकट भविष्य में दरों में कटौती की संभावना कम है। पश्चिम एशिया के संघर्ष और कमजोर मानसून के कारण बढ़ती खाद्य कीमतों ने मुद्रास्फीति की चिंताओं को बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप, अगले एक वर्ष में 100 से अधिक आधार अंकों की अतिरिक्त दर वृद्धि की उम्मीद की जा रही है। सितम्बर में, थोक मुद्रास्फीति अगस्त के 9.92 प्रतिशत से बढ़कर 11.39 प्रतिशत हो गई, जो मुख्य रूप से तेल की कीमतों में 57.32 प्रतिशत की वृद्धि से प्रेरित थी।

आर.बी.आई. प्रमुख संजय मल्होत्रा ने कहा कि भविष्य में दरों में बढ़ौतरी आॢथक वृद्धि और मुद्रास्फीति के रुझानों पर निर्भर करेगी। एक प्रमुख सवाल यह बना हुआ है कि सितम्बर में आपूर्तिकत्र्ताओं द्वारा स्वीकार की गई कीमतों में बढ़ौतरी का कितना असर उपभोक्ता कीमतों और बिजली के बिलों पर पड़ेगा। त्यौहारी सीजन के दौरान आॢथक चुनौतियां बिक्री पर निर्भर छोटे व्यवसायों को प्रभावित कर सकती हैं। बढ़ती कीमतें लाभ मार्जिन को कम कर सकती हैं लेकिन वे हस्तनिर्मित वस्तुओं के मूल्य को भी रेखांकित करती हैं। अनूठे और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की पेशकश करके स्थानीय विक्रेता प्रामाणिकता चाहने वाले उपभोक्ताओं को आकर्षित कर सकते हैं।

वैश्विक आपूॢत शृंखला की समस्याओं और घरेलू नीतियों ने भारत में मुद्रास्फीति को काफी प्रभावित किया है। सितम्बर 2023 में, भारतीय रिजर्व बैंक ने 6.2 प्रतिशत की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सी.पी.आई.) मुद्रास्फीति दर दर्ज की, जो उसके 2-6 प्रतिशत के लक्ष्य दायरे से अधिक थी। यह वृद्धि मुख्य रूप से खाद्य, ईंधन और आवश्यक वस्तुओं की ऊंची कीमतों के कारण हुई, जिसमें खाद्य मुद्रास्फीति लगभग 7.8 प्रतिशत थी। हालिया पहलों में रसोई गैस और अनाज जैसी आवश्यक वस्तुओं पर कर कटौती और सबसिडी शामिल रही है। त्यौहारी सीजन से पहले स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए भारतीय खाद्य निगम (एफ.सी.आई.) ने खरीद प्रयासों को तेज कर दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) ने 2026-27 के लिए 7.1 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान लगाया है, जिसमें खुदरा मुद्रास्फीति 5.2 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। हालांकि, अक्तूबर से दिसम्बर तक वर्ष की अंतिम तिमाही में मुद्रास्फीति बढ़कर 6 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। आर.बी.आई. प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि अर्थव्यवस्था मजबूत होने के बावजूद बढ़ती मुद्रास्फीति चिंता का विषय बनी हुई है।

खुदरा विक्रेता बंडल्ड डील्स और आवश्यक वस्तुओं पर छूट के माध्यम से पैसे के सही मूल्य (वैल्यू फॉर मनी) पर जोर देकर इन आॢथक रुझानों के अनुकूल ढल रहे हैं। इस दृष्टिकोण ने मध्यम श्रेणी के उत्पादों की बिक्री में 15 प्रतिशत की वृद्धि की है, जबकि विलासिता की वस्तुओं की मांग में गिरावट आई है। स्थानीय बाजार और कारीगर इन आॢथक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, जहां त्यौहारी सीजन उनके वाॢषक राजस्व का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा होता है। इंस्टाग्राम और पिंटरेस्ट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे सुझावों से भरे पड़े हैं जो इस दौरान रचनात्मकता और साधन संपन्नता को बढ़ावा देते हैं। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने उपभोक्ताओं को मूल्य प्रवृत्तियों के बारे में जागरूक करने और खरीदारी संबंधी दिशा-निर्देश प्रदान करने के लिए अभियान शुरू किए हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि आॢथक चुनौतियां उत्सवों के रंग में खलल न डालें।

शिपिंग में व्यवधान, उर्वरक की ऊंची लागत और अल नीनो के प्रभावों के कारण 2027 तक वैश्विक खाद्य मुद्रास्फीति बढऩे की आशंका है। इंडोनेशियाई चावल और भारतीय चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं और मिस्र की रोटी की कीमतों में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। घटते भंडार और बढ़ते आयात से कीमतों में और बढ़ौतरी होने का अनुमान है। अपनी नवीनतम रिपोर्ट में, आर.बी.आई. ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच मुद्रास्फीति दरों में अंतर को रेखांकित किया, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च मुद्रास्फीति देखी गई। इन समस्याओं के समाधान के लिए सब्जियों जैसी खराब होने वाली वस्तुओं के भंडारण, प्रसंस्करण और वितरण बुनियादी ढांचे में सुधार करना अनिवार्य है। इसके अलावा, घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाकर खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करना महत्वपूर्ण है। कृषि, लॉजिस्टिक्स और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों की बाधाओं को दूर करना आवश्यक है। औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुंच का विस्तार करने से अनौपचारिक क्षेत्र में कीमतों की अस्थिरता को कम करने में भी मदद मिल सकती है। इन चुनौतियों के बीच, उपभोक्ता और व्यवसाय त्यौहारी सीजन के दौरान अपने लचीलेपन और रचनात्मकता का प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं?-कल्याणी शंकर

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