इन 55 हजार मौतों की आशंका पर चर्चा तक नहीं

सवाल यही है कि क्या देश के सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों ने अलनीनो के प्रभाव से होने वाली मौतें और पेयजल तथा कृषि की चुनौतियों से निपटने के कोई इंतजाम किए हैं। दरअसल इसकी चर्चा तक किसी राजनीतिक दल ने नहीं की है। करीब 50 हजार लोगों की संभावित मौतों का यह मसला देश के नेताओं के लिए चिंता की बात नहीं है। ये मौतें अचानक नहीं होंगी। गर्मी के प्रभाव और पानी की कमी और दूषित पेयजल की मजबूरी से होने वाली मौतें धीमी मौतें होती हैं। यही वजह है कि नेताओं को इसकी चिंता नहीं है। इसका प्रमुख कारण है कि ऐसी मौतों का मसला वोट नहीं दिला सकता। इसी वजह से हर साल पर्यावरण परिवर्तन से होने वाली मौतें कभी भी राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल नहीं की जाती हैं…
देश में सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के लिए मौसम परिवर्तन के दुष्प्रभाव चिंता का विषय नहीं हैं। ऐसे परिवर्तनों की चपेट में आने वाले गरीब होते हैं। इनकी आवाज सुनने वाली देश में कोई सरकार नहीं है। सिर्फ इनकी सुनवाई के दावे किए जाते हैं, जबकि पर्यावरण के प्रभावों से बचाने के इंतजामों पर चर्चा तक नहीं होती है। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के जारी किए गए नक्शे के आंकड़े काफी डराने वाले हैं। अलनीनो के प्रभाव से उत्पन्न गर्मी से भारत में जहां 55200 लोगों की मौत होने की आशंका है। इसके बावजूद यह मुद्दा देश के सत्तारूढ़ दलों की चिंता का सबब नहीं है। अल नीनो हीट मॉर्टेलिटी ट्रैकर (अल नीनो के कारण गर्मी से होने वाली मौतों का ट्रैकर) नामक इस भयावह नक्शे के मुताबिक जून 2026 में शुरू होने वाली इस घटना से मार्च 2027 तक गर्मी के कारण 857400 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जो वैज्ञानिकों द्वारा एक महीने पहले लगाए गए अनुमान से 350000 ज्यादा हंै। इनमें से एक-तिहाई मौतें नाइजीरिया, भारत और ब्राजील में होने का अनुमान लगाया गया है।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जून के बाद से अल नीनो के कारण 484500 अतिरिक्त मौतें हुई हैं। इसके कुछ असर इस तरह दिखे हैं। इंडोनेशिया में जंगलों में आग लगना, भारत में अहम मानसूनी बारिश का न होना और मध्य अमरीका में सूखा पडऩा। अल नीनो की वजह से इन नौ महीनों की इस अवधि के अनुमान में लगाई गईं आधी से ज्यादा अतिरिक्त मौतें अगले छह महीनों के भीतर होने की आशंका है और भारत पर इसका भयावह रूप देखने को मिल सकता है। इतिहास के पन्नों में 1877-1878 के सुपर अल नीनो को सबसे विनाशकारी मौसमी घटनाओं में गिना जाता है। उस दौरान इसके प्रभाव से भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों में भयंकर सूखा पड़ा था। लगातार बारिश न होने के कारण फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई थीं। इतिहास में इसे ग्रेट फेमाइन के रूप में जाना जाता है। इस अकाल के कारण भुखमरी और बीमारियों से दुनिया भर में करोड़ों लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र की सतह के तापमान में अत्यधिक वृद्धि उस सदी के सबसे बड़े जलवायु संकट का कारण बनी थी। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में अर्थशास्त्र के मिल्टन फ्रीडमैन डिस्टिंग्विश्ड सर्विस प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा है कि सुपर अलनीनो पर हमारा शोध नई पूर्वानुमान क्षमताओं का इस्तेमाल करके हमारे सामने मौजूद सबसे जरूरी सवालों में से एक का जवाब देता है। अत्यधिक गर्मी के कारण कहां लोगों की जान जाने का खतरा है? अल नीनो एक मौसमी घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन का गर्म चरण है। यह एक प्राकृतिक मौसमी पैटर्न है जो दुनिया भर में वायुमंडलीय परिसंचरण, हवाओं के तंत्र और बारिश के वितरण को प्रभावित करता है। इंडोनेशिया में धधकती भयानक जंगलों की आग से लेकर प्रशांत महासागर में तूफानों की असामान्य सक्रियता तक अल नीनो का असर दुनिया के लगभग हर कोने में देखने को मिल रहा है।
इस असामान्य मौसमी गतिविधि के कारण आने वाले समय में दुनिया भर में अलग-अलग क्षेत्रों में अत्यधिक तापमान और अनिश्चित बारिश और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा काफी बढ़ गया है। दिसंबर में अल नीनो अपने चरम पर पहुंच सकता है, जिसके प्रभाव से नवंबर से जनवरी के बीच भारत में सामान्य से कम सर्दी पडऩे की संभावना है। हालांकि उत्तरी हिस्से में ठंड की तीव्रता पश्चिमी विक्षोभ, पहाड़ों पर बर्फबारी और उत्तर-पश्चिमी हवाओं पर निर्भर करती है। इस दौरान दिल्ली समेत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं बिहार में कभी-कभी शीतलहर की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। मैदानों में तापमान कुछ समय के लिए गिर सकता है। फिर भी मौसम विज्ञानियों का मानना है कि इस बार लंबे समय तक कड़ाके की ठंड पडऩे की आशंका काफी कमजोर है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार नवंबर से जनवरी के दौरान प्रशांत महासागर में अलनीनो की स्थिति और मजबूत हो सकती है। कई जलवायु माडल संकेत दे रहे हैं कि दिसंबर में यह चरम पर पहुंच सकता है। समुद्र की सतह के तापमान में परिवर्तन का असर मौसम पर पड़ता है। हालांकि इसका असर देश के सभी हिस्सों में एक समान नहीं होगा। भारत में मानसून के दौरान 13 प्रतिशत कम बारिश होने के बाद, अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह मौसमी घटना सर्दियों में तापमान बढ़ाएगी, क्या ये बारिश के पैटर्न को बिगाड़ेगी और क्या कृषि पर दबाव बढ़ाएगी? भारत के मामले में अल नीनो पर कड़ी नजर रखी जाती है, क्योंकि आमतौर पर इसके कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने का खतरा बढ़ जाता है। बीते मानसूनी सीजन में भारत के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का असमान वितरण देखने को मिला।
मध्य भारत में तो लगभग सामान्य बारिश हुई, लेकिन पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 26 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई जिसे असाधारण सूखा माना जा सकता है। वहीं दक्षिणी राज्यों में भी औसत से 24 प्रतिशत कम बारिश हुई। अल नीनो के और मजबूत होने से भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से ज्यादा गर्मी हो सकती है, जिससे जल संसाधनों और कृषि पर दबाव बढ़ सकता है। आने वाले महीनों में अल नीनो का बढ़ता असर भारत के जल संसाधनों, कृषि पैदावार और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है। सरकार और कृषि विभागों को किसानों के लिए समय पर एडवाइजरी जारी करने, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने और जलाशयों में पानी के सही प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि संभावित खाद्य संकट से बचा जा सके। सवाल यही है कि क्या देश के सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों ने अलनीनो के प्रभाव से होने वाली मौतें और पेयजल तथा कृषि की चुनौतियों से निपटने के कोई इंतजाम किए हैं। दरअसल इसकी चर्चा तक किसी राजनीतिक दल ने नहीं की है। करीब 50 हजार लोगों की संभावित मौतों का यह मसला देश के नेताओं के लिए चिंता की बात नहीं है। ये मौतें अचानक नहीं होंगी। गर्मी के प्रभाव और पानी की कमी और दूषित पेयजल की मजबूरी से होने वाली मौतें धीमी मौतें होती हैं। यही वजह है कि नेताओं को इसकी चिंता नहीं है। इसका प्रमुख कारण है कि ऐसी मौतों का मसला वोट नहीं दिला सकता। इसी वजह से हर साल पर्यावरण परिवर्तन से होने वाली मौतें कभी भी राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल नहीं की जाती हैं। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह बात ठीक नहीं है।-योगेंद्र योगी




