यूपीआई ने बदली अर्थव्यवस्था की दिशा

यदि सात वर्ष पहले किसी ने यह कहा होता कि गांव के कोने में बैठा किसान भी बिना नकद के व्यापार करेगा, तो यह कल्पना जैसी लगती। परंतु आज यह वास्तविकता है। यह उपलब्धि एक संस्था या सरकार की नहीं…
भारतीय अर्थव्यवस्था ने जिस तीव्र गति से डिजिटल युग में कदम रखा है, उसका सबसे बड़ा प्रतीक आज एकीकृत भुगतान अंतरफलक (यूपीआई) बन चुका है। यह केवल एक भुगतान प्रणाली नहीं, बल्कि आम नागरिक की आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक है। हाल ही में दीपावली से एक दिन पहले देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा जारी बयान में बताया गया कि एक ही दिन में यूपीआई के माध्यम से हुए भुगतान का आंकड़ा अभूतपूर्व रहा। करोड़ों लेन-देन ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत अब नकदरहित अर्थव्यवस्था की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। इसके अतिरिक्त, मंत्री ने उल्लेख किया कि इस बार दिवाली से पहले कुल लेन-देन का 99.8 प्रतिशत यूपीआई के माध्यम से हुआ और जीएसटी में इस बार भारी कटौती के कारण खरीददारी में भी उछाल आया। यह केवल एक सांख्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल भारत के स्वप्न की ठोस पूर्ति का प्रतीक है। वर्ष 2016 में जब राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने भारतीय रिजर्व बैंक के सहयोग से यूपीआई की शुरुआत की, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह प्रणाली भारत की आर्थिक रीढ़ बन जाएगी। परंतु सात वर्षों में ही इसने न केवल शहरों, बल्कि गांवों तक अपनी गहरी पहुंच बना ली।
जिस देश में कभी बैंक तक पहुंचना कठिन माना जाता था, वहां आज मोबाइल फोन से भुगतान करना सामान्य बात हो गई है। यह परिवर्तन योजनाबद्ध दृष्टिकोण, तकनीकी नवाचार और सरकारी प्रतिबद्धता का परिणाम है। यूपीआई ने भारतीय समाज में आर्थिक व्यवहार की सोच को ही बदल दिया। अब कोई छोटा दुकानदार, सब्जी विक्रेता, ऑटो चालक या किसान भी अपने मोबाइल पर क्यूआर कोड लगाकर भुगतान स्वीकार करता है। इससे न केवल लेन-देन की प्रक्रिया सरल हुई है, बल्कि विश्वास और पारदर्शिता भी बढ़ी है। नकदी पर निर्भरता घटने से भ्रष्टाचार और काले धन की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यूपीआई ने ‘एक राष्ट्र, एक भुगतान प्रणाली’ की भावना को साकार कर दिखाया है। वित्त मंत्री के हालिया वक्तव्य में यह भी उल्लेखनीय रहा कि इस दीपावली से पहले के सप्ताह में यूपीआई के माध्यम से जितने भुगतान हुए, वे पिछले वर्ष की तुलना में कहीं अधिक रहे। इसका अर्थ यह है कि अब त्योहारों पर लोगों की खरीददारी का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यम से हो रहा है। यह विश्वास का संकेत है- विश्वास तकनीक पर, बैंकिंग तंत्र पर और सबसे बढक़र देश की नीति पर। इस उपलब्धि को केवल एक तकनीकी सुधार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारतीय समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता को कम करने वाला एक औजार भी है। आज कोई भी व्यक्ति, चाहे उसके पास डेबिट कार्ड हो या नहीं, केवल एक मोबाइल और बैंक खाते से देश के किसी भी कोने में भुगतान कर सकता है। यह सुविधा विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक समावेशन का मार्ग खोल रही है। यूपीआई का प्रभाव केवल लेन-देन तक सीमित नहीं है। इसने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के लिए भी नई संभावनाएं उत्पन्न की हैं। छोटे उद्योग अब भुगतान के लिए बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहे। त्वरित भुगतान ने उनकी कार्यशील पूंजी को गति दी है और उत्पादन चक्र को सरल बनाया है। इससे रोजगार सृजन में भी वृद्धि हुई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की इस पहल की सराहना हो रही है। भारत ने सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, नेपाल, भूटान, फ्रांस और कतर जैसे देशों के साथ समझौते कर यूपीआई को वहां स्वीकार्य बनाया है।
अब भारतीय पर्यटक विदेशों में भी अपने देश के डिजिटल तंत्र के माध्यम से भुगतान कर सकते हैं। यह वैश्विक स्तर पर भारत की तकनीकी नेतृत्व क्षमता का परिचायक है। दूसरे देशों के अनुभवों की तुलना में भारत का मॉडल अधिक समावेशी और जनोन्मुख है। ब्राजील का पिक्स या इंग्लैंड की फास्टर पेमेंट्स प्रणाली भी उल्लेखनीय है, परंतु इनका प्रसार सीमित वर्गों तक है। भारत का यूपीआई इसलिए विशेष है क्योंकि यह ग्रामीण किसान से लेकर बड़े उद्योगपति तक, सभी को समान रूप से जोड़ता है। फिर भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं- साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी और व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता के क्षेत्र में निरंतर सतर्कता की आवश्यकता है। सरकार और आरबीआई इस दिशा में लगातार प्रयासरत हैं, परंतु नागरिकों को भी जागरूक रहना होगा। डिजिटल भारत केवल सरकार का नहीं, नागरिकों का भी साझा संकल्प है। प्रधानमंत्री मोदी की दृष्टि रही है कि तकनीक केवल सुविधा नहीं, सशक्तिकरण का माध्यम बने। यूपीआई ने इस विचार को साकार किया है। यह आज केवल भुगतान का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की धडक़न है। दीपावली से पहले जिस प्रकार करोड़ों भारतीयों ने डिजिटल माध्यम से खरीददारी की, वह संकेत है कि हम नए युग में प्रवेश कर चुके हैं- ऐसा युग जहां आर्थिक शक्ति हमारे हाथों के छोटे से उपकरण, मोबाइल में निहित है।
यदि सात वर्ष पहले किसी ने यह कहा होता कि गांव के कोने में बैठा किसान भी बिना नकद के व्यापार करेगा, तो यह कल्पना जैसी लगती। परंतु आज यह वास्तविकता है। यह उपलब्धि किसी एक संस्था या सरकार की नहीं, पूरे देश की साझी सफलता है। परंतु यह भी सत्य है कि इस परिवर्तन की गति को दिशा देने का कार्य मोदी सरकार की नीतियों ने ही किया। डिजिटल भुगतान, जन-धन खाते, आधार और मोबाइल- इन तीन स्तंभों पर खड़ा यह ढांचा भारत की नई आर्थिक आत्मनिर्भरता का आधार बन चुका है। दीपावली का पर्व प्रकाश का प्रतीक है, अंधकार से उजाले की यात्रा का संकेत। इसी प्रकार यूपीआई ने आर्थिक व्यवस्था में पारदर्शिता, सुविधा और समानता का प्रकाश फैलाया है। यह भारत की वह उपलब्धि है जिस पर हर नागरिक गर्व कर सकता है। और जब वित्त मंत्री दीपावली के बाद यह घोषणा करती हैं कि करोड़ों भारतीयों ने एक ही दिन में डिजिटल माध्यम से लेन-देन किया, तो यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उस उजाले की गवाही है जिसने भारत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है। यूपीआई की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि जब तकनीकी नवाचार और जनसहभागिता साथ चलें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता।-सिकंदर बंसल




