संस्कृत का भारतीय संस्कृति के लिए महत्त्व

आज भारत के विद्यालयों तथा अनेक निजी संस्थानों में संस्कृत विषय को पुनरीक्षण, सामाजिक व्यवहार, संगीत, योग आदि से भी जोड़ा जा रहा है। संस्कृत भाषा की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिए सबसे उपयुक्त भाषाओं में से एक माना जाता है। शोध से पता चला है कि संस्कृत पढऩे से स्मरण शक्ति बढ़ती है। संस्कृत भाषा के महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि ये भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में आधिकारिक भाषाओं में से एक है। इसे तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड़ और ओडिया के साथ भारत की 6 शास्त्रीय भाषाओं में से एक माना जाता है। संस्कृत दुनिया की सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक भाषा है…
तमिलनाडु के डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन ने हाल ही में भारतीय संस्कृति की शिरोमणि भाषा संस्कृत को एक मृत भाषा कहा है। उनके इस वक्तव्य को लेकर पूरे देश मे आक्रोश देखा जा रहा है। ऐसा लगता है कि स्टालिन संस्कृत के भारतीयता के लिए महत्व को लेकर कम ज्ञान रखते हैं। उनको, और भी अनेकों को विश्व की अनेक भाषाओं की जननी संस्कृत के महत्व के बारे में ज्ञान हमारा नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है। संस्कृत भारत की एक शास्त्रीय भाषा है, जिसका अर्थ ‘संस्कारित’ है। यह सबसे पुरानी भाषाओं में से एक है और हिंद-यूरोपीय भाषा परिवार की हिन्द-आर्य शाखा से संबंधित है। इसे देवभाषा भी कहते हैं और यह कई आधुनिक भारतीय भाषाओं जैसे हिंदी, मराठी, बंगाली, नेपाली आदि अनेक भाषाओं की जननी है। संस्कृत हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों की एक महत्वपूर्ण दार्शनिक और पवित्र भाषा रही है। इसका साहित्य विश्व के सबसे समृद्ध साहित्य में से एक है। महर्षि पाणिनि जैसे विद्वानों ने इसका वैज्ञानिक और सुस्पष्ट व्याकरण तैयार किया है। इसमें एकवचन और बहुवचन के साथ-साथ द्विवचन का भी प्रयोग होता है। प्राचीन काल से ही संस्कृत भाषा का प्रसार विदेशों में होता रहा है। विभिन्न सांस्कृतिक, धार्मिक, व्यापारिक और बौद्धिक आदान-प्रदान की वजह से यह भाषा विदेशों में भी पहुंची। प्राचीन भारत में जब बौद्ध और जैन धर्म का प्रसार हुआ, तो उसके साथ संस्कृत ग्रंथ भी मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, जापान, कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया (जैसे थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम) तक पहुंचे।
बौद्ध भिक्षुओं ने संस्कृत में लिखे गए सूत्रों और शास्त्रों का अनुवाद किया और इसे विदेशों में ले गए। गुप्त काल में भारत की राजकीय भाषा संस्कृत थी। अंग्रेजों के आने से पहले तक दक्षिण के विद्वान जब उत्तर भारत में आते थे तो संस्कृत भाषा में बातचीत हुआ करती थी। इसी तरह से उत्तर भारत के विद्वान जब दक्षिण भारत में जाया करते थे तो संस्कृत में बात होती थी। हमारा सारा प्राचीन इतिहास जैसे महाभारत, रामायण, वेद, ज्योतिष के ग्रन्थ, योग के ग्रन्थ, आयुर्वेद इत्यादि सब मूल रूप से संस्कृत में लिखे गए हैं, अत: शिक्षा संस्कृत में हुआ करती थी। माना जाता है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाहियान ने संस्कृत ग्रंथों को चीन में प्रचारित किया। इसके अलावा प्राचीन भारत के व्यापारी और नाविक दक्षिण-पूर्व एशिया (जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया, बाली) में गए, जिसकी वजह से उन्होंने हिंदू धर्म और संस्कृत साहित्य को इन देशों में प्रसारित किया। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ पूरी दुनिया को प्रभावित करते हैं। ये मूल रूप से संस्कृत में ही थे, जिन्हें दुनियाभर में मान्यता मिली। जैसे इंडोनेशिया में काकाविन रामायण और खमेर साम्राज्य (कंबोडिया) में अंगकोर वाट जैसे मंदिरों में संस्कृत शिलालेख मिलते हैं। तिब्बत में बौद्ध धर्म के साथ संस्कृत ग्रंथों का तिब्बती भाषा में अनुवाद हुआ। इसके अलावा श्रीलंका, नेपाल, भूटान और तिब्बत में संस्कृत का प्रसार धार्मिक और साहित्यिक आदान-प्रदान के माध्यम से हुआ। प्राचीन काल में नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्र पढऩे आते थे। इन छात्रों के माध्यम से भी संस्कृत भाषा विदेशों में पहुंची। उदाहरण के लिए, चीनी यात्री यी-जिंग ने नालंदा में संस्कृत सीखी। संस्कृत भाषा विशेष रूप से जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, दक्षिण-पूर्व एशिया, जापान, चीन, भूटान, इजरायल, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन और स्विट्जरलैंड में पढ़ाई जाती है। संस्कृत का प्राचीन इतिहास हमें लगभग 3500 वर्ष पूर्व तक ले जाता है।
वैदिक सभ्यता के निर्माण काल में इसकी ध्वनि गूंजती थी। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक, स्मृति, पुराण, महाकाव्य, नाटक, अलंकार, इन सबका मूल आधार संस्कृत ही रही है। संस्कृत की उच्च स्थिति केवल भारत तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि यह प्राचीन काल में दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया के अभिजात्य वर्ग, शासन, दर्शन और साहित्य की भी भाषा बनी। संस्कृत के बिना भारत का दर्शन, काव्य, तंत्र, विज्ञान, चिकित्सा, गणित, नीतिशास्त्र, व्याकरण- सभी शून्य हो जाता। संस्कृत भाषाई विकास की जननी मानी जाती है, जिससे देश की अनेक बोलियों, भाषाओं ने जन्म लिया। संस्कृत, जो कभी केवल मंदिरों, यज्ञों या विद्वानों तक सीमित थी, आज फिर से भारतीय और वैश्विक मंचों पर नई पहचान बना रही है। कर्नाटक के मत्तूर, होसाहल्ली, झिरी (राजस्थान), सासन, गनोड़ा (गुजरात), पथरी (मध्य प्रदेश), कोशावल्ली (कर्नाटक) और देश के अन्य गांवों में संस्कृत जीवन का अंग है। मत्तूर और होसाहल्ली जैसे गांवों में तो दैनिक व्यवहार, शिक्षा, पूजा-पाठ, यहां तक कि छोटे व्यापार भी संस्कृत में होते हैं। इसके परे, जर्मनी, अमेरिका, रूस, स्विट्जरलैंड आदि देशों के विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जा रही है। अमेरिका में संस्कृत हेतु विश्वविद्यालय भी स्थापित है और विश्वभर में संस्कृत से जुड़े शोध, जागरण व प्रशिक्षण कार्यक्रम चल रहे हैं। संस्कृत की वैज्ञानिक संरचना इसे कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), मशीन लर्निंग, भाषा विज्ञान, मनोविज्ञान, संगणक विज्ञान, मशीनी अनुवाद जैसे क्षेत्रों में भी उपयुक्त बना रही है।
नासा, अमेरिकी विश्वविद्यालय तथा भारत के कम्प्यूटर वैज्ञानिक संस्कृत आधारित डेटा प्रोसेसिंग और कृत्रिम मेधा के लिए इसकी व्याकरणिक संरचना पर शोध कर रहे हैं। आज भारत के विद्यालयों तथा अनेक निजी संस्थानों में संस्कृत विषय को पुनरीक्षण, सामाजिक व्यवहार, संगीत, योग आदि से भी जोड़ा जा रहा है। संस्कृत भाषा की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिए सबसे उपयुक्त भाषाओं में से एक माना जाता है। शोध से पता चला है कि संस्कृत पढऩे से स्मरण शक्ति बढ़ती है। संस्कृत भाषा के महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि ये भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में आधिकारिक भाषाओं में से एक है। इसे तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड़ और ओडिया के साथ भारत की 6 शास्त्रीय भाषाओं में से एक माना जाता है। संस्कृत दुनिया की सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक भाषा है। तमिल भी प्राचीन भाषाओं में से एक है। हमें दोनों भारतीय भाषाओं पर और सभी भारतीय भाषाओं पर गर्व है। स्टालिन को संस्कृत के विकास के लिए किए जा रहे प्रयत्नों को लेकर ईष्र्यालु होना ठीक नहीं है। रही बात संस्कृत के मृत भाषा होने की तो सनद रहे कि जब तक सूर्य चमकता रहेगा, जब तक तारे टिमटिमाते रहेंगे, तब तक संस्कृत का हमारी संस्कृति के लिए महत्व रहेगा।-डा. वरिंद्र भाटिया




