महाराष्ट्र

हादसे में गई आंखों की रोशनी, नहीं मानी हार… आप भी करेंगे लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश के जज्बे को सलाम

पुणे: भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल सी. द्वारकेश की कहानी साहस, संकल्प और अदम्य इच्छाशक्ति का ऐसा उदाहरण है, जो हर किसी को प्रेरित करती है। 2014 में एक सैन्य स्टेशन पर बास्केटबॉल मैच देखते समय हुए एक हादसे में उन्होंने अपनी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए खो दी। आठ महीनों तक अस्पताल में रहने के दौरान उन्होंने न केवल अपने नए जीवन को स्वीकार किया, बल्कि खुद को एक नई दिशा देने का संकल्प भी लिया। बुधवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 36 वर्षीय लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश को दिव्यांगजन सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके उस असाधारण सैन्य करियर और खेल उपलब्धियों को मान्यता देता है, जिसे पूर्ण अंधता भी रोक नहीं सकी। वे भारतीय सशस्त्र बलों के पहले पूरी तरह दृष्टिहीन अधिकारी हैं, जो आज भी सक्रिय सेवा में तैनात हैं।


दिव्यांगता से लेकर विश्व रिकॉर्ड तक का सफर
हमारे सहयोगी अखबार टीओआई से बातचीत में लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश ने कहा कि एक आर्मी ऑफिसर के तौर पर मुझे दृढ़ता, हिम्मत और कभी हार न मानने की सीख दी गई थी। लेकिन अंधापन एक ऐसी चुनौती थी, जिसकी कल्पना भी नहीं की थी। पढ़ाई, टेक्नोलॉजी और लगातार मेहनत ने मुझे फिर से खड़ा होने की ताकत दी। उन्होंने आगे बताया कि उन्होंने विभिन्न कंपटीटिव परीक्षा पास कीं, पैरा स्पोर्ट्स पर रिसर्च शुरू किया और अपनी विकलांगता को अपनी ताकत बना लिया।

पैरा खेलों में भारत का चमकता सितारा है द्वारकेश
आज द्वारकेश पैरा खेलों में भारत का चमकता सितारा हैं। वे स्विमिंग और शूटिंग दोनों में नेशनल चैंपियन हैं। 10 मीटर एयर राइफल में वह विश्व रैंकिंग में वर्तमान में तीसरे स्थान पर हैं। अक्टूबर 2024 में UAE में आयोजित विश्व कप में उन्होंने 624.6 पॉइंट बनाकर नया विश्व रिकॉर्ड कायम किया। वह भारतीय पैरा शूटिंग टीम का हिस्सा हैं और महू स्थित आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट में ट्रेनिंग लेते हैं।

एआई ने बदली जिंदगी: द्वारकेश
द्वारकेश ने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित उपकरणों और असिस्टिव टेक्नोलॉजी ने उन्हें अपनी सैन्य जिम्मेदारियों को उतनी ही कुशलता से निभाने में सक्षम बनाया है जितना कोई सामान्य अधिकारी करता है। उनके साथी भी उनकी कार्य क्षमता और अनुशासन से प्रेरित रहते हैं। 2009 में सेना में कमीशन प्राप्त करने वाले द्वारकेश ने राष्ट्रीय पुरस्कार को बेहद भावुक पल बताया। उन्होंने कहा कि मुझे याद है कि राष्ट्रपति ने ही मुझे कमीशन दिया था। 16 साल बाद उसी राष्ट्रपति से मुझे ऐसा सम्मान मिलना, जिसने मुझे नई पहचान दी, मेरे लिए अत्यंत गर्व का क्षण है।”

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