संपादकीय

आपकी एजैंसी बनाम मेरी पुलिस

पुराने केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो और आज के प्रवर्तन निदेशालय में ऐसा क्या है कि ये सबकी आंखों की किरकिरी बने हुए हैं? क्या ये राजनीतिक लीपापोती, क्लीन चिट, कानून का प्रवर्तन करने वालों को कानून तोडऩे वाले बनाने का साधन है? जिसके चलते इन्हें चुनावी ढकोसला उपनाम दिया जा रहा है। पिछले सप्ताह पश्चिम बंगाल में चला नाटक इस सब पर प्रकाश डालता है, जब प्रवर्तन निदेशालय ने राजनीतिक परामर्शदाता फर्म इंडियन पालिटिकल कमेटी (आई.पी.सी.) और इसके प्रमुख प्रतीक जैन के कोलकाता और दिल्ली स्थित अनेक ठिकानों पर छापा मारा। यह छापा अवैध कोल खनन और तस्करी से जुड़े 2742.32 करोड़ रुपए के मनी लांङ्क्षड्रग के मामले में मारा गया, जिससे उन्हें 20 करोड़ रुपयों से अधिक की राशि प्राप्त हुई।

इस छापे में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके मुख्य सचिव, राज्य के पुलिस महानिदेशक, कोलकाता पुलिस कमिश्नर ने बाधा डाली। यही नहीं, उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों से महत्वपूर्ण फाइलों, इलैक्ट्रॉनिक साक्ष्यों, सी.सी.टी.वी. कैमरे आदि को छीना, जिससे ममता बनर्जी पर आरोप लगाया गया कि जब भी उनके विरुद्ध, उनके मंत्रियों के विरुद्ध, उनके पार्टी कार्यकत्र्ताओं या राज्य के अधिकारियों के विरुद्ध किसी भी अपराध में कोई जांच की जाती है, तो वह कानून अपने हाथ में ले लेती हैं और राज्य पुलिस का दुरुपयोग करती हैं। यह बात सर्वविदित है कि राज्य सरकार और केन्द्रीय एजैंसियों के बीच लंबे समय से टकराव है। वर्ष 2019 में शारदा और रोज वैली घोटालों में कोलकाता के पुलिस आयुक्त से सी.बी.आई. द्वारा पूछताछ के बारे में विवाद पैदा हुआ था और ममता बनर्जी धरने पर बैठ गईं थी। 

इसके अलावा प्रवर्तन निदेशालय पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह अपने राजनीतिक माई बाप भाजपा के इशारों पर कार्य कर रहा है और विरोधियों के विरुद्ध चुन-चुन कर कार्रवाई कर रहा है। राज्य में चुनावों से पूर्व वह पार्टी के नेताओं को धमकाने के लिए मामले दर्ज कर रहा है और इसमें उनका सहयोगी आयकर विभाग भी है। यही कार्य कांग्रेस ने वर्ष 2004 से 2014 के बीच यू.पी.ए. सरकार के दौरान भी किया था, जब भाजपा ने उस पर आरोप लगाया था कि वह सी.बी.आई. का इस्तेमाल एक पिंजरे के तोते की तरह कर रही है और विरोधियों के विरुद्ध मामले दर्ज करवा रही है। 

जरा सोचिए, पिछले 10 वर्षों में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा दर्ज मामलों में दोष सिद्धि की दर 1 प्रतिशत से कम रही है, फिर भी यह एजैंसी दंड की प्रक्रिया जारी रख रही है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, जिन राजनेताओं की एजैंसी द्वारा जांच की गई, उनमें से 95 प्रतिशत विपक्षी दलों के हैं।  सरकार का उत्तर होता है कि हमने धन शोधन निवारण अधिनियम या प्रवर्तन निदेशालय नहीं बनाया है। ये पहले से बने हुए हैं। विरोधी नेताओं के विरुद्ध प्रवर्तन निदेशालय का दुरुपयोग करने के आरोप गलत हैं। कांग्रेस शासन के दौरान प्रवर्तन निदेशालय ने केवल 44.36 लाख रुपए की राशि जब्त की। तब हम विपक्ष में थे किंतु जब से राजग सत्ता में आई है, प्रवर्तन निदेशालय ने 2200 करोड़ रुपए की राशि जब्त कर ली है। वे प्रवर्तन निदेशालय को कैसे बदनाम कर सकते हैं? प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार, उसने धन शोधन निवारण अधिनियम के अंतर्गत पिछले वर्ष 775 मामले दर्ज किए, जिनमें से 333 मामलों में अभियोजन दर्ज किया गया है। 1773 मामले विचाराधीन हैं और 34 मामलों मे दोष सिद्धि हुई है। निदेशालय ने 30036 करोड़ रुपए मूल्य की 461 संपत्तियों की जब्ती के आदेश दिए हैं। पुलिस भी सक्रिय है। वह अपने राजनेताओं को खुश कर रही है। वह सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा अपने एजैंडे को पूरा करने के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल हो रही है। मुख्य मामलों में धीमी गति से बढ़ती है, जांच में गड़बड़ करती है या जांच को आधी-अधूरी छोड़ देती है या बिल्कुल नहीं करती।  

साथ ही ममता के कदम उनके मामले और उनके उद्देश्यों को कमजोर करते हैं क्योंकि वह मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर हैं। वह केवल तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष नहीं हैं। वह कानून की प्रक्रिया की उपेक्षा नहीं कर सकतीं और इस मामले को ‘आपकी एजैंसी, बनाम मेरी पुलिस’ का मुद्दा नहीं बना सकतीं।  एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार दोषसिद्धि की दर कम है क्योकि प्रवर्तन निदेशालय दंड की प्रक्रिया का इस्तेमाल करता है जिससे प्रवर्तन निदेशालय और पुलिस की प्रतिष्ठा खराब होती है और अपेक्षित साक्ष्यों के साथ आरोपों को साबित करने में वे विफल रहते हैं।

भ्रष्टाचार के लिए जवाबदेही निर्धारित नहीं की जाती। इसलिए उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए किंतु हमारी राजनीतिक और पाखंडी संस्कृति को ध्यान में रखते हुए हम इस तरह के शोर-शराबे सुनते रहेंगे या कुछ दिखावटी उपाय किए जाते रहेंगे।  
समय आ गया है कि प्रवर्तन निदेशालय अपने आका की आवाज बनना और सत्ता का दुरुपयोग करना बंद करे। इसके लिए आवश्यक है कि एजैंसी को यस मैन से मुक्त करना होगा और बैक डोर निर्देशों पर ध्यान नहीं देना होगा। देश की वित्तीय अपराध की जांच करने वाली प्रमुख एजैंसी के रूप में प्रवर्तन निदेशालय के पास बड़ी जिम्मेदारी है और उसे यह जिम्मेदारी बिना किसी भय या पक्षपात के निभानी चाहिए।

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