संसद में अनछपी किताब…

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा होनी थी। परंपरा रही है कि राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में सरकार की जिन नीतियों, कार्यक्रमों और प्राथमिकताओं का उल्लेख किया है, सांसद उन पर चर्चा करते हैं। आलोचना भी करते हैं। विपक्ष का एजेंडा कुछ अलग भी हो सकता है। याद करें, जब केंद्र में कांग्रेस की पीवी नरसिम्हा राव सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी नेता प्रतिपक्ष थे। तब अटल जी ने राष्ट्रपति अभिभाषण के संदर्भ में ही, बहस के दौरान, चीन का मुद्दा आक्रामक अंदाज में उठाया था और सरकार की भत्र्सना तक की थी। जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस और यूपीए सरकार थी, तब लालकृष्ण आडवाणी नेता प्रतिपक्ष थे। उन्होंने भी चीन के साथ सीमा-विवाद, सुरक्षा-विवाद और सैन्य तनावों का जिक्र करते हुए मनमोहन सरकार की तीखी आलोचना की थी। भारत-चीन संबंधों, टकरावों और विवादों पर संसद में बोलना ‘वर्जित’ नहीं है। यह सांसदों की संवैधानिक आजादी है कि वे कौनसा मुद्दा उठाते हैं। हालांकि संसद के दोनों सदन-लोकसभा और राज्यसभा-निश्चित नियमों में बंधे हैं। लोकसभा के नियम 349 (1) के तहत सांसद किसी भी किताब, पत्रिका, अखबार को उद्धृत नहीं कर सकते, जब तक वे उद्धरणों को सत्यापित नहीं करते। नियम 353 के तहत, यदि सांसद को इसी आधार पर अपनी बात कहनी है, तो वह स्पीकर और संबद्ध मंत्री को पहले नोटिस देगा। स्पीकर ओम बिरला ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के उद्धरणों के संदर्भ में इन नियमों का बार-बार हवाला दिया।
स्पीकर ने नियमानुसार अपनी व्यवस्था भी दे दी, लेकिन नेता प्रतिपक्ष जिद पर अड़े रहे। सवाल करते रहे कि आखिर सरकार डरी हुई क्यों है? सरकार उनके वक्तव्य से असहज क्यों है? दरअसल नेता प्रतिपक्ष पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे द्वारा लिखित, लेकिन अभी तक अप्रकाशित किताब के कुछ अंश संसद में पढक़र प्रधानमंत्री मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृहमंत्री अमित शाह को बेनकाब करना चाहते थे। राहुल गांधी जो वाक्य बोल पाए, उनमें डोकलाम टकराव का जिक्र सुनाई दिया, जबकि चीनी सेना के साथ तनाव, टकराव और युद्ध जैसे हालात पूर्वी लद्दाख में पैदा हुए थे। जून, 2020 को जो ‘गलवान संघर्ष’ हुआ और हमारे 20 जांबाज सैनिक ‘शहीद’ हुए, वह भी लद्दाख में हुआ था। जनरल नरवणे तब सेना प्रमुख थे और वह अप्रैल, 2022 तक इस पद पर रहे। गौरतलब है कि जनरल नरवणे की कथित आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन उसका हार्डकवर अप्रैल, 2024 से ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स पर उपलब्ध है। किताब के प्रकाशन की अनुमति देना सरकार का विशेषाधिकार है, क्योंकि पूर्व सेना प्रमुख की किताब राष्ट्रीय सुरक्षा और हमारी युद्ध रणनीति से भी जुड़ी है। हमारा दुश्मन देश उन जानकारियों का नाजायज फायदा उठा सकता है। लिहाजा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की संसद में आपत्ति और हस्तक्षेप तार्किक था। उन्होंने स्पीकर से आग्रह किया कि नेता प्रतिपक्ष को इस विषय पर न बोलने दिया जाए, क्योंकि वह देश को गुमराह कर रहे हैं। राहुल गांधी के हाथ में दिल्ली प्रेस की पत्रिका ‘कारवां’ की फोटोप्रति थी, जिसमें कुछ अंश छपे हैं। इससे पहले करीब दो साल पहले कुछ अंश ‘द प्रिंट’ पत्रिका में छप चुके हैं।
समाचार एजेंसी ‘पीटीआई’ ने कुछ अंश दिसंबर, 2023 में प्रकाशित किए थे। जाहिर है कि जनरल नरवणे की किताब के कई अंश तो सार्वजनिक हो चुके हैं। सदन में रक्षा मंत्री, गृहमंत्री और संसदीय कार्य मंत्री की जबरदस्त आपत्तियां इसलिए थीं, ताकि राहुल गांधी के जरिए कुछ विवादास्पद जानकारियां लोकसभा के रिकॉर्ड में दर्ज न हो सकें और इस तरह विकृत इतिहास न बन सके। दरअसल चीन का मुद्दा जनरल नरवणे के खुलासों तक ही सीमित नहीं है। मौजूदा संदर्भ ने सेना के पूर्व जनरलों और कर्नल सरीखे विशेषज्ञों के विरोधाभास भी बेपर्दा कर दिए। कुछ पूर्व जनरल उन भारत-चीन समझौतों पर ही सवाल उठा रहे हैं, जो 1993, 1997, 2005 से लेकर 2013 तक किए गए थे। गलवान इसीलिए संभव हो सका, क्योंकि हमारे सैनिक हथियार नहीं उठा सकते थे, गोली नहीं चला सकते थे, क्योंकि दोनों देशों के बीच समझौते हुए थे। संसद की कार्यवाही सोमवार को भी नहीं हो सकी, अब भी हंगामा जारी रहेगा, क्योंकि चीन का मुद्दा बेहद संवेदनशील है।




